यह ड्रामा नहीं पेट की आग है सरकार! न किसान झूठे हैं न उनका आंदोलन

आंदोलन , , रविवार , 23-04-2017


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जनचौक ब्यूरो

अपडेट

तमिलनाडु के किसानों का जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन जारी है। कर्ज़ में घिरकर आत्महत्या कर चुके अपने परिजनों के नरमुंडों की प्रतीकात्मक माला के साथ शुरू हुआ उनका आंदोलन पीएमओ पर निर्वस्त्र प्रदर्शन तक पहुंचा और सड़क पर दाल-भात खाने से लेकर अब मल-मूत्र खाने तक पहुंच गया है लेकिन केंद्र सरकार की नींद नहीं टूटी है, उसकी मानवता नहीं जागी है।

तमिलनाडु के किसानों के समर्थन में अन्य लोग व संगठन भी सामने आ रहे हैं।

अन्य लोग समर्थन में आए

सरकार किसानों की मांगों के प्रति उदासीन बनी हुई है लेकिन जनता में इन किसानों का समर्थन बढ़ता जा रहा है और शायद इसी से घबराकर अब इन किसानों के खिलाफ सोशल मीडिया पर मुहिम शुरू कर दी गई है, जिसका मकसद है इन किसानों को बदनाम कर इनके आंदोलन को कमज़ोर करना।

बदनाम करने की कोशिश

सरकार की ओर से कोई पूछ रहा है कि इन किसानों के पीछे कौन है? तो कोई बता रहा है कि यह सारा आंदोलन एक ड्रामा है, प्रायोजित है।

सरकार समर्थक कह रहे हैं कि इन लोगों को विरोधी पक्ष से फंड मिल रहा है, कोई बता रहा है कि इन्हें वामपंथी लाए हैं तो कोई बता रहा है इनके लिए फाइव स्टार होटल से खाना आ रहा है।

ऐसा कहने वाले लगभग वही लोग हैं जो दिन रात देश के नाम पर सैनिकों का गुणगान करते हैं लेकिन जब एक सैनिक सेना के भ्रष्टाचार को उजागर करता है, जवानों को दिए जाने वाले खाने में भेदभाव को सबके सामने लाता है तो वह भी उनके लिए देशद्रोही बन जाता है।

पक्ष में भी मुहिम

वैसे किसानों के पक्ष में भी सोशल मीडिया पर मुहिम है और लोग इस आंदोलन की आंखों देखी सच्चाई बयान कर रहे हैं।

जंतर-मंतर पर किसानों का हाल जानने पहुंचे सागर पुंडीर फेसबुक पर लिखते हैं कि-

ये बात सही है कि तमिलनाडु से आये किसान मिनरल वाटर पी रहे हैं बात ये भी सही है की इनको होटल का खाना दिया जा रहा है। मगर ये बात गलत है की ये धरना फर्जी है।

आंदोलनरत किसानों के लिए खाने-पीने का सामान लेकर आए हरियाणा के किसान

मैं खुद जंतर-मंतर ये हकीकत आज देखने आया हूं। किसानों के खाने पीने का खर्च कहां से आ रहा है? इसके मुझे दो जरिये दिखाई दिए।
पहला- जो दूसरे लोग किसानों को समर्थन देने पहुँच रहे हैं। वो लोग सहानुभूति के लिए मिनरल वाटर और खाने आदि का सामान गाड़ी भर-भर कर ला रहे हैं। आज मेरे सामने हरियाणा से किसान आये। वो एक जिप्सी भरके मिनरल वाटर लेके आये हैं। साथ मे खाने का भी सामान है।
दूसरा- तीन ऐसे साउथ इंडियन होटल यहां हैं जहाँ से किसानों का खाना आता है। और इस खाने को जो दर्शक वहाँ पहुँचा रहे हैं। वो भी खा रहे हैं। 
मगर इसमें बुरा क्या है? 
किसान तो यहां तक कह रहे हैं कि जो छोटा किसान है। तुम उसका कर्ज माफ करो। बड़ा खुद देख लेगा।

पुंडीर बताते हैं कि बहुत लोगों ने किसानों को पैसा देने की भी पेशकश की लेकिन इन किसानों ने पैसा लेने से इंकार कर दिया।

इस सबसे साफ है कि यह किसान न फर्जी हैं न इनका आंदोलन फर्जी है, बल्कि सच यह है कि अब इनके आंदोलन से सरकार को परेशानी महसूस होने लगी है, यही वजह है कि वह चाहती है कि यह आंदोलन किसी भी तरह जल्द से जल्द खत्म हो जाए। 

क्या है किसानों की मांग?

तमिलनाडु से लगभग 21सौ किमी दूर दिल्ली के जंतर-मंतर आए इन किसानों की मांग कोई बहुत बड़ी नहीं है। ये किसान अपने खाली पेट के लिए दाना और सूखे खेत के लिए पानी की मांग कर रहे हैं। इन किसानों ने अपने ज्ञापन में 6 मांगों का मुख्य तौर पर उल्लेख किया है।

1. कृषि ऋण को सरकार माफ करे

2. तमिलनाडु को रेगिस्तान बनने से रोके

3. कावेरी नदी को सूखने से बचाया जाए

4. कावेरी नदी के लिए प्रबंधन समिति का गठन किया जाए

5.  इंजीनियर एसी कामराज की स्मार्ट जलमार्ग परियोजना द्वारा सभी नदियों को आपस में जोड़ा जाए

6. कृषि उत्पादों के लिए उचित और लाभदायक मूल्य का निर्धारण किया जाए

इनमें से किसी भी मांग पर सरकार ने अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया है, बल्कि इन किसानों पर ही सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया है, जबकि यह किसान 14 मार्च से जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं।






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