“किसानों के पास क्या विकल्प छोड़ा है अंबानी-अडानी की सरकार ने?”

आंदोलन , , बृहस्पतिवार , 08-06-2017


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रविंद्र पटवाल

किसानों की मौत के बाद एक राज्य सरकार नींद से जागी है। उसके ही किसान संगठन से अलग हुआ गुट इस आंदोलन की अगुआई कर रहा था। (राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ) जिसे ये अब तक कांग्रेस का संगठन बता रहे थे। लगातार कह रहे थे कि हम genuine (असली) किसानों से ही बात करेंगे।

 

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान।

अब किसान कह रहे हैं कि हम एक करोड़ की जगह 2 करोड़ का मुआवज़ा देते हैं हमें सीएम दे दो।

5 किसानों का दाह संस्कार किसान तब करेंगे जब शिवराज किसानों के पास आएँगे। पर वे ख़ुद न आकर मुआवज़ा, नौकरी और दाल सरकारी ख़रीद पर, मोलभाव कर रहे हैं, पर हिम्मत नहीं कर रहे 15 साल तक प्रदेश को चलाने वाले सीएम।

उल्टा दिल्ली से नायडू 1100 दंगा निरोधक दस्ता और 600 रैपिड ऐक्शन फ़ोर्स भिजवा रहे हैं।

मध्य प्रदेश में किसानों के हाथों में भी पत्थर हैं। पता नहीं कब इन पत्थरबाजों पर जनरल बिपिन रावत की गर्जना हो और परेश रावल किसानों को जीप में बाँधकर घुमाने की पेशकश ट्वीट करें।

ये सब हुआ है उन जुमलों के कारण जिन्हें 2014 में मोदी जी ने विकास के पैदा करने की गारण्टी लेकर कहा था।

कृषि उपज की लागत अगर 100 रुपये किलो है तो उसे 150 रुपये किलो करने की दुहाई से मोदी जी को भारी बहुमत से विकास पुरुष, चौड़ी छाती, बिना थके 22 घंटे काम करने वाले, जिनके आगे पीछे कोई नहीं है, जिसके पास सिर्फ़ झोला है और बिना किसी मोह माया के कभी भी वो राजनीति छोड़ हिमालय की गुफ़ाओं में घुस जाएँगे, कहकर देश को बुरी तरह छला गया।

देश आज जान गया कि मनमोहन सरकार ने शुरू-शुरू में कॉरपोरेट के लिए जो काम किये बाद में ढिलाई करने लगे। कॉरपोरेट को देश लूटने के लिए ज़मीन चाहिए थी किसानों की, आदिवासियों की। अडानी को सस्ता दाल सरसों चाहिए किसानों से।

किसानों ने लागत न मिलने पर अपने फल-सब्जी सड़कों पर फेंक दिए। फोटो साभार : गूगल

सभी शहरी उद्योगों को सस्ता अनाज और सब्ज़ी फल चाहिए जिससे मज़दूर और मध्यवर्ग को तनख़्वाह कम देना पड़े, मुनाफ़ा क़ायम रहे।

अगर ऐसा बना हुआ है तो इसका बोझ इस देश के 70 करोड़ किसान नहीं भुगतेंगे तो कौन भुगतेगा?

प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री डॉक्टर देवेंद्र शर्मा एक दशक से चीख़ कर थक गये कि एक आम किसान की मासिक आय 1600 रुपये से अधिक नहीं है। 

एक मज़दूर की मासिक आय 18000 करने की घोषणा सरकार ने की है।

आज़ादी के 70 साल बाद एक किसान के अनाज की क़ीमत 30 गुना तो एक अध्यापक का वेतन 300 गुना बढ़ा है महँगाई दर से। 

किसान आज मरो या मारो नहीं करेगा तो उसके पास क्या विकल्प छोड़ा है इस अम्बानी अडानी की सरकार ने?

(यह टिप्पणी रविंद्र पटवाल की फेसबुक वॉल से ली गई है। यह लेखक के निजी विचार हैं। 'जनचौक' का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)






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