“किसानों की मोटी तोंद किन्हें दिखी?”

आंदोलन , , सोमवार , 24-04-2017


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जनचौक ब्यूरो

दिल्ली के जंतर-मंतर पर 14 मार्च से धरना दे रहे तमिलनाडु के किसानों ने एक महीने के लिए अपना धरना आंदोलन स्थगित कर दिया है। रविवार, 24 अप्रैल की शाम तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानासामी के आश्वासन पर किसानों ने अपना आंदोलन स्थगित किया।

किसानों ने ऐलान किया है कि अगर उनकी मांगें न मानी गईं तो वह 25 मई से फिर जंतर-मंतर आकर धरना देंगे। यह किसान फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य, कर्ज़ माफी और स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू करने जैसी मांगें कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर किसानों के आंदोलन को लेकर काफी हलचल दिखाई दी और अब धरना खत्म होने पर भी काफी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं।   

हमें क्या मतलब! 

तमिल किसान जा चुके हैं जंतर मंतर से. तमिलनाडु के सीएम ने पीएम से आश्वासन लिया है. 

एक महीने तक तमिलनाडु के किसान सीएम और पीएम का इंतज़ार करेंगे.
अगर माँगे नहीं मानी तो 25 मई को दोबारा आएँगे.
कुछ शक्तियाँ अब इस आंदोलन को बदनाम करने के लिए ख़ूब सारे भ्रामक लिंक दे रही हैं, जिससे देश के लोग कृषि संकट पर समर्थन में न आ जायें और देश के 55 करोड़ किसानों का सवाल राष्ट्रीय पटल पर न आ जाये.
आज मुद्दा क्या है देश का? जिसे राष्ट्रीय मीडिया एक हफ़्ते से बेच रहा है.
सोनू निगम को नींद में ख़लल पड़ता है अजान से.
क्या सोनू निगम की नींद इस देश की पहली ज़रूरत है? जो हर आदमी की चिंता का पहला सबब बनी है?
एक तेज बहादुर ने अपने खाने में पानी वाली दाल का ज़िक्र किया. देश की रक्षा करने के लिए सरकार ने उनका राशन कोटा तय किया है. जब ख़राब और कम पौष्टिक भोज जवान खाएँगे तो दुश्मन से ख़ाक लड़ेंगे?
पर 30 लाख सैनिकों के खाने पर डाका कौन और क्यों डाल रहा है आपकी बहस का मुद्दा नहीं है?
क्यों?
दूध से मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया तेज़ बहादुर को. किसी मीडिया ने ख़बर बनाई?
आपने फ़ेसबुक पर कुछ लिखा?

मध्य प्रदेश में सरकारी प्राथमिक शिक्षा देने वाले 30 हज़ार स्कूल बंद हो गये.
उन 30 लाख बच्चों का क्या हुआ?
वो क्या इंग्लैंड या अमेरिका के बच्चे हैं जो आपकी क़लम चल नहीं रही?
पूरे देश में अधूरी ही सही उच्च शिक्षण संस्थानों से पिछले 67 साल में करोड़ों लोग पास हुये. 80 के दशक में हम जैसे निम्न मध्यम वर्ग के छात्र 300 रुपये सालाना फ़ीस देकर इलाहाबाद बनारस JNU से पढ़कर निकले.
आज वही फ़ीस 10 हज़ार से बढ़ाकर डेढ़ लाख सालाना कर दी गई है, आपको एक शब्द लिखने में शर्म आ रही होगी?
ऐसे लोगों को नमक हराम कहा जाता है. जो ख़ुद तो तरक़्क़ी की सीढ़ियाँ चढ़ गये. अपने बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूल और इंजीनियरिंग कॉलेज की मोटी फ़ीस का जुगाड़ कर लिये, पर देश के किसान आदिवासी और दलित-मुस्लिम के बच्चे अगर सस्ती शिक्षा पा गये तो आपके बच्चे के लिए पहले से कम अवसर में से जगह रहेगी या नहीं आप क़लम नहीं उठाते.
मत उठाओ. 
उस आदमी के लिए उठाना जिसने रात-रात भर माता का जगराता किया और गाया है. सिर्फ़ सुबह जाकर उठते थे ये साहब. पर वो तो इनकी भक्ति की शक्ति थी.
आप भी लगे रहो, क्योंकि आपकी सुबह की नींद का सवाल है. 
(किसान आत्महत्या क्यों कर रहा? शहर से मज़दूर ग़ायब क्यों है? हर घण्टे 14 लड़कियाँ अगवा होकर किधर गई?
104 रुपये किलो दाल ख़रीदने वाली सरकार आज किसान के बम्पर दाल उगाने पर 40 रुपये किलो में क्यों ले रही है, जबकि लागत 60 रूपये है? इस सब से हमें क्या लेना, ये उनकी क़िस्मत!रविंद्र पटवाल


आंदोलन की चीरफाड़!

लीजिये अब शुरू हो गई किसानों के आंदोलन की चीरफाड़। उनका कुल-गोत्र सब तलाशा जाने लगा। एमसीडी चुनाव और किसान आंदोलन के अन्तर्सम्बन्ध पर तो बाक़ायदा शोध हो गए। अख़लाक़ और यूपी इलेक्शन पर चुप्पी के बाद ये शोध मज़ेदार हैं। अगर सचमुच कोई पार्टी किसानों के मुद्दे लाकर चुनाव जीतना चाहती है तो हम उसे साधुवाद देना चाहेंगे, चाहे वह जो हो - यह जानते हुए कि उस दिल्ली में इसका कोई असर नहीं होने वाला जहां अपनी एसी और सोसायटी के पार मध्यवर्ग को न कुछ दीखता है न सूझता।

ख़ैर सिर्फ़ थोड़ी सी बातें

■ 35 दिन वे झुलसती गर्मी में जंतर-मंतर पर कर्जमाफी और न्यूनतम समर्थन मूल्यों में अभिवृद्धि के लिए स्वामीनाथन कमेटी की अनुशंसा लागू करने की मांग कर रहे थे।

स्वामीनाथन कमेटी कहती है कि किसानों को उनकी फसलों का लागत से डेढ़ गुना मूल्य दिया जाना चाहिए। सरकार के पास ये मांगें पेंडिंग हैं।

दोनों मांगें जेनुइन हैं तो हमने उनका समर्थन किया, यथासंभव सहयोग किया जो नैतिक और आर्थिक सहयोग से ज़्यादा कुछ नहीं था और इस रूप में प्रतीकात्मक ही था। हम शर्मिंदा हैं कि इतनी हिम्मत न जुटा सके कि उनके प्रतिरोध में सक्रिय रूप से शामिल होते।

इस प्रतिरोध के नेता आयकन्नू आर एस एस के पूर्व कार्यकर्ता रहे हैं, इन किसानों के साथ कई लोग नौकरी छोड़कर आये थे, कुछ लोग वाम या अम्बेडकरवाद से जुड़े हुए थे और कुछ आम किसान भी। हमने उनके ऑडियोलॉजिकल सर्टिफिकेट नहीं चेक किये। उनके मुद्दे सही थे हमारे लिए बस यही बहुत था आगे बढ़ने को।

हम भक्त नहीं जो भगवान की विष्ठा को सुगन्धित और दूसरों के इत्र को दुर्गंध से भरा बताते हैं। हम नागरिक हैं और इस देश के किसान, मज़दूर, दलित, आदिवासी, महिला सहित सबके नागरिक अधिकारों के पक्ष में हैं।

इस तरह हमारी निष्पक्षता जनता के पक्ष में है। आगे भी ऐसा आंदोलन होगा तो हम यथासंभव साथ आएंगे।

आंदोलन हमारा नहीं उनका था। उसे ख़त्म करना भी शुरू करने की तरह उनका ही अधिकार था। सहमति असहमति कर आगे हम उनके निर्णय का सम्मान करते हैं और उम्मीद करते हैं कि इन जेनुइन मुद्दों पर उनका संघर्ष जारी रहेगा। हमारा समर्थन सशर्त नहीं था। इसलिए वह है और रहेगा।

बाक़ी माल्या के कैलेंडर देखकर कला और गिरिराज सिंह के भाषण सुनकर भाषा सीखने वाले भक्तों को उनकी अमानवीयता मुबारक़। वे किसानों, मज़दूरों, दलितों, महिलाओं को वैसे भी गाली ही दे सकते हैं। क्या करेंगे.. यह उनके जीन में है। - मनोज सिंह

किसानों की मोटी तोंद किन्हें दिखी? 

1. जिन पत्रकारों को कभी वेज बोर्ड और श्रमजीवी कानून का लाभ नहीं मिला, न कभी इत्मीनान की नौकरी, न खुलकर लिखने की आजादी।
2. उन शिक्षकों को, जिन्हें गेस्ट फैकेल्टी के नाम पर 75 रूपये घंटे पढ़ाकर जीवन गुजारना पड़ा।

3. उन व्यवसायियों को, जो तरह-तरह के टैक्स से दबे, अफसरों की घुड़कियाँ सुनते रहे।

4. उन बेरोजगारों को, जिनका विवाह इस लिए नहीं हो पा रहा कि निठल्ले का क्या भरोसा।

5. उन नागरिकों को, जिनके बच्चों को ढंग की शिक्षा नहीं मिलती और जो अपने माँ-बाप का इलाज तक नहीं करा पाते।
6.
उन सरकारी बाबुओं को, जिनकी जिंदगी असमय तबादलों और बेतरतीब फाइलों में नष्ट हो गई।
(
दूसरों के दर्द से बेगाने समाज के इन चेहरों को पहचानें। जब कभी ये अपना दर्द रोएं तब किसानों की याद दिला दें।) 
विष्णु राजगढ़िया






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