जिसके रोने ने मुस्कुराने की वजह दे दी

यादों की बारात , नई दिल्ली, शनिवार , 05-08-2017


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उपेंद्र चौधरी

साल 1929, कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास कर दिया गया था। यह प्रस्ताव गांधी की नज़रों में जल्दबाज़ी में उठाया गया क़दम था, लेकिन नौजवानों की अंगड़ाई लेती कांग्रेस अंग्रेज़ी हुक़ूमत के विरोध की ऊर्जा से स्वतंत्रता के आकाश को छूने को बेताब दिख रही थी। कांग्रेस पर उन नौजवानों का भी बढ़ता हुआ दबाव था, जिनके सीने में एक नये भारत के लिए नई सोच की लय धड़क रही थी। बनी-बनायी हर क्लैसकैलिटी के ख़िलाफ़ एक विद्रोह। भगत सिंह और उनके साथी इस सोच की नुमाइंदगी कर रहे थे। उम्र छोटी थी, मगर सोच बड़ी और तर्कों के साथ हर बात को आगे ले जाने की अद्भुत क्षमता। इस नौजवान टोली को गोली की भाषा मालूम थी, लेकिन वह सही अर्थों में हिंसा नहीं बल्कि विरोध के हमजोली थे, इनके भीतर बदलाव की छटपटाहट थी, एक नये युग की आहट थी। इसी साल यानी 1929 में ही एक ऐसी शख़्सियत का भी जन्म हुआ, जिसके स्वर की अदा सही अर्थों में बनी बनायी लीक से टकराती थी और नयी लीक रच दी थी। उसके समकक्ष समझ ही नहीं पा रहे थे कि उसके स्वर के सिरे कहां से शुरू होते हैं और कहां ख़त्म, हालांकि उसका स्वर न तो उलझा हुआ था और न ही जटिल बनावट वाला था। मगर उसके स्वर की सजावट इतनी प्राकृतिक थी मानो स्वयं प्रकृति ही उसके स्वर की व्याख्या उसके स्वरों से कर रही हो।

गायक किशोर कुमार।

जब वह चार साल का नन्हा था, तब चोट की वजह से उसके पांव में सूजन आ गयी। दर्द के मारे वह लागातार चौबीसों घंटे दो-तीन दिनों तक चीख़ता रहा। उसकी आवाज़ बदल गयी। रोने से पहले की आवाज़ और तीन दिन तक लगातार रोने के बाद की आवाज़ में एक अजीब फ़र्क़ आ गया था। घर वाले हैरत में थे, लेकिन यह हैरत अच्छी वाली थी, सुरीली हैरत थी। लेकिन जब वह बड़ा हुआ, तो उसे अपनी आवाज़ से कहीं ज़्यादा अपनी नक़ल क्षमता पर भरोसा था। इसी कॉपी करने की कला के बूते और बहुत हद तक अपने रिश्तेदारों के बूते उसने तब के बॉम्बे की राह पकड़ी। मंज़िल थी; बॉलीवुड में एक्टिंग। 1946 में उसे पहला ब्रेक भी मिल गया। “शिकारी” नाम की उस फ़िल्म में मुख्य भूमिका तब के महानायक अशोक कुमार की थी। देवानंद की फ़िल्म ज़िद्दी में उसे गाने का मौक़ा मिला, मगर बेहद सफल रही इस फ़िल्म से देवानंद जहां स्थापित हो गये, वहीं उसकी आवाज़ को कोई पहचान नहीं मिली। यह वह दौर था, जिसमें कुन्दललाल सहगल की आवाज़ के जादू से बच पाना किसी भी वोकल आर्टिस्ट के लिए मुमकिन नहीं था। लिहाज़ा वह भी सहगल शैली में ही गाता रहा, मगर सिर्फ़ देवानंद के लिए और अपने लिए। किसी दूसरे अभिनेता को उसने अपनी आवाज़ नहीं दी। 1951 में फणी मजूमदार की फ़िल्म में बतौर अभिनेता काम किया, मगर फ़िल्म पिट गयी। तीन साल बाद 1954 में मशहूर फ़िल्म निर्माता-निर्देशक बिमल रॉय के साथ फ़िल्म ‘नौकरी’ में एक संवेदनशील बेरोज़गार की भूमिका मिली, जिसमें उसने अपनी ग़ज़ब की अभिनय प्रतिभा की छाप छोड़ी, मगर इसके दम पर फ़िल्में नहीं मिलीं। इस फ़िल्म के संगीत निर्देशक सलिल चौधरी थे। सलिल चौधरी से किशोर कुमार ने मिन्नतें की कि उनसे गाना गवाया जाय। लेकिन सलिल चौधरी ने उन्हें यह कहते हुए झिड़क दिया कि गाने का न शऊर है और न ही संस्कार, सिर्फ़ नक़ल कर लेने से गाने नहीं मिलते। किशोर कुमार ने फिर बिमल रॉय के सामने अपनी बात रखी। एक्सपेरीमेंट के माहिर बिमल रॉय ने सलिल चौधरी से बात की। सलिल चौधरी ने कहा, ‘दादा, इसे गाने-वाने तो आते नहीं, फिर इससे गाने कैसे गवाऊं?’ सलिल चौधरी ऐसा कहते हुए शायद भूल रहे थे कि लाख विरोध के बावजूद बिमल रॉय ने किस तरह से उन्हें एक स्क्रिप्ट राइटर से संगीतकार में बदल दिया था। एक्सपेरीमेंट के जुनूनी बिमल रॉय के कहने पर ‘नौकर’ फ़िल्म में एक गाना गवाया। गाने का बोल था-‘छोटा सा घर होगा, बादलों की छांव में’। उनकी आवाज़ को पहचान तो मिली। लेकिन जमे हुए गायक रफ़ी और मुकेश के मुक़ाबले कोई ख़ास पहचान नहीं मिली। 

किशोर कुमार और देवानंद

बॉलीवुड के माहौल और वहां की रवायत ने किशोर कुमार पर ऐसा दबाव डाला कि उन्हें भी महसूस हुआ कि उनकी आवाज़ में कोई ऐसा असर नहीं कि वो दूसरे अभिनेता के लिए गा सकें। 1946 से लेकर 1968 तक यानी बॉलीवुड में बिताये गये अपने शुरुआती 22 सालों तक किशोर कुमार ने देवानंद और ख़ुद के अलावा किसी और के लिए नहीं गाया। अपनी आवाज़ को लेकर वो इतना अंडर कॉन्फ़िडेंन्ट बना दिये गये थे कि अपने अभिनय वाली फ़िल्मों में भी उन्होंने अपने ऊपर फिल्माये गये गानों में रफ़ी की आवाज़ ली। ऐसी ही दो फ़िल्में ‘रागिनी’ और ‘शरारत’ थीं। हालांकि इस बीच वो मिमिक्री, हुड़दंगई, बेपरवाह, बावड़ा और संवेदनशील अभिनय भी किये और गाने भी गाये। यह सहज जिज्ञासा पैदा होती है कि आख़िर इन बाइस सालों में किशोर कुमार ने ख़ुद के अलावा देवानंद के लिए ही गाने क्यों गाये। असल में देवानंद की पहली फ़िल्म, ‘ज़िद्दी’ जब बन रही थी, उसी समय देवानंद और किशोर कुमार के बीच एक दोस्ताना क़रार हुआ था कि अगर देवानंद इस फ़िल्म में सफल हुए, तो किशोर कुमार उनकी फ़िल्मों के लिए गाने गायेंगे। मगर 1968 का साल ! किशोर कुमार की फ़िल्में एक-एक कर फ़्लॉप हो रही थीं, उन्हें अपने सामान तक बेचने पड़े थे। अपनी तंगहाली से लड़ने के लिए उनके पास आख़िरी हथियार उनकी आवाज़ ही थी। उन्होंने इस हथियार का इस्तेमाल करना शुरू किया। जगह-जगह पर्फॉर्मेंस देने लगे। खुरच-खुरचकर पैसे तो जुटने लगे, लेकिन वो नाकाफ़ी थे।

किशोर औऱ आरडी बर्मन।

किशोर कुमार की आर्थिक नैया बीच भंवर में गुड़गुड़ करने लगी थी। इसी बीच एक टैलेन्ट कम्पटीशन से चुने गये ताज़ा तरीन चेहरे वाले हीरो राजेश खन्ना की फ़िल्म इंडस्ट्री में एंट्री हुई। 1968-69 में उनकी फ़िल्म “अराधना” आयी। एसडी बर्मन इस फ़िल्म के सारे गाने मोहम्मद रफ़ी से गवाना चाहते थे, लेकिन इसी बीच वो बीमार पड़ गये और फ़िल्म में संगीतबद्ध करने की ज़िम्मेदारी उनके बेटे “पंचम” यानी आरडी बर्मन पर आ गयी। आरडी बर्मन ने किशोर कुमार को याद किया। किशोर कुमार ने पहली बार देवानंद और ख़ुद के अलावा किसी तीसरे शख़्स के लिए अपनी आवाज़ दी। बॉलीवुड में इस फ़िल्म के गानों ने खलबली मचा दी। फ़िल्म भी सुपर डूपर हिट रही और किशोर के गाये सभी गानों ने भी लोगों की ज़ुबान पर चढ़कर किशोर के हाथ में सफलता की घुड़सवारी की बागडोर सौंप दी। किशोर की सफलता इतनी सरपट दौड़ी कि फ़िल्म इंडस्ट्री के तमाम निर्माता-निर्देशक को सिर्फ़ एक आवाज़ चाहिए थी-किशोर कुमार की आवाज़। किशोर कुमार की जो उडलिंग वाली शैली कभी उन्हें क्लैसकैलिटी के ख़िलाफ़ खड़ा करती थी, वही उनके चाहने वालों की मांग बन गयी। जिन लोगों ने उन्हें बॉलीवुड के लिए अनफ़िट क़रार दिया था, वो भी उनके पीछे भाग रहे थे। मगर किशोर कुमार अपनी उस टीस और उदासी को भला कैसे भूल सकते थे, जिन्होंने उनकी आवाज़ में उतरती भावनाओं को असीमित रेंज दिये थे। 

किशोर और राजेश खन्ना

ऐसे ही किसी निर्माता ने अपने फ़िल्म में उनसे गवाने के लिए बहुत हिम्मत बांधते हुए कहा था- ‘आप मेरे फ़िल्म के लिए गा दीजिए’। किशोर कुमार ने एक शर्त रखी- ‘आपको दो बोट लाने होंगे, उसे समंदर में उतारने होंगे, एक पर मैं होऊंगा, दूसरे पर आप होंगे, ऐसा करते हुए हम दोनों के माथे पर लाल रंग का तिलक ज़रूर होगा, मगर उस तिलक पर चावल नहीं लगे होंगे, तभी मैं आपके लिए गा पाऊंगा’। निर्माता इस मेटाफ़रिक अंदाज़ में किये गये इन्कार को समझते हुए बैरंग लौट गया था। किशोर कुमार बिना एक्टिंग के गा नहीं पाते थे। वो अपने नज़दीकी लोगों से हर बात गाकर ही बताते थे। जब वो किसी कंसर्ट पर होते और अपना परिचय देना होता, तो किसी साधारण वाक्य को भी वो लय में बांधकर ही अपना परिचय देते। इन सबके लिए उन्हें कई बार सनकी तक कहा गया, लेकिन वो हमेशा कहा करते, ‘दुनिया कहती मुझको पागल, मैं दुनिया को कहता पागल’। वह उस शख्स का ‘राजनीतिक पागलपन’ ही था कि जब 1975 के आपातकाल में किशोर कुमार से किसी सरकारी समारोह में गाने के लिए कहा, तो उन्होंने आपातकाल का विरोध करते हुए गाने से मना कर दिया। नजीता यह हुआ कि तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने आकाशवाणी को निर्देश दिया कि आकाशवाणी से किशोर कुमार के गाने नहीं बजने चाहिए और आकाशवाणी ने इसे तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया। मगर किशोर कुमार अटल रहे, परिणाम भुगतने के रूप में उनके घर पर आयकर के छापे पड़े और ऐसी कई फ़िल्में ज़ब्त कर ली गयीं, जिन्हें लेकर आज भी किसी को कोई जानकारी नहीं है और अगर है,तो वो अब तक सामने नहीं आयी हैं।

किशोर औऱ मोहम्मद रफी।

किशोर कुमार एक साथ गायक, अभिनेता, गीतकार, संगीतकार और निर्माता-निर्देशक सब कुछ थे। इस बहुआयामी व्यक्तित्व वाले किशोर कुमार की शख्सियत बहुत संवेदनशील और गहरी थी। एक बार किसी फ़िल्मी मैग़जीन के ‘लेटर टू एडिटर’ वाले कॉलम में मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार को लेकर बहस छिड़ गयी थी कि इन दोनों में से बड़ा गायक कौन ? दोनों के अपने-अपने फैन थे। दोनों तरफ़ के फैन अपने-अपने पसंदीदा गायक के पक्ष में दलीलें दे रहे थे। कई दिनों तक चलने वाली इस बहस से ऊबकर किशोर कुमार ने उस पत्रिका के संपादक को पत्र लिखा कि इसे बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने अपने पत्र में लिखा, “मोहम्मद रफ़ी ने जो गाने गाये हैं, उसे मेरे जैसा गायक बिल्कुल नहीं गा सकता”। अपनी इस बात के पक्ष में उन्होंने गाने के कुछ लिस्ट भी भेजे, ऐसे ही गानों में “मधुबन में राधिका नाचे रे” जैसे गाने भी थे। लेकिन किशोर का यह बड़प्पन था, क्योंकि आरडी बर्मन के शब्दों में, “अभिव्यक्ति के इतने रेंज किसी आवाज़ में नहीं”। इसी रेंज के बूते किशोर उन गानों में भरपूर उभरकर आते हैं, जिन्हें उन्होंने ख़ुद गाये हैं और उसी गाने को किसी और गायक-गायिका ने भी आवाज़ दी है। मसलन; तुम बिन जाऊं कहां, दुनिया में आके;  हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते; मेरे नैना सावन भादो, फिर भी मेरा मन प्यासा आदि। इन गानों को बहुत हद तक किशोर कुमार की आवाज़ में ही लोग याद रखे हुए हैं, ये गाने रेडियो-टेलीविज़न पर भी ज़्यादातर किशोर कुमार की आवाज़ में ही बजाये-दिखाये जाते हैं।

किशोर, राजेश खन्ना और आरडी बर्मन।

यह बहुत ही आम जानकारी है कि किशोर कुमार ने संगीत की औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी। मगर उनकी आवाज़ में पहाड़ों सी विराटता थी, समुद्र सी गहरायी थी, हवा का बवंडर था, मचलती हुई तरंगें और लहरें थीं, चिड़ियों सी चहक थी, फूलों सी महक थी, यानी प्रकृति ने उन्हें अपने ही तरह से समृद्ध किया था कि हर तरह की भावनायें उनकी आवाज़ में उतरकर तर-बतर हो जाती थीं। वो असल में आम लोगों के गायक थे। 

किशोर कुमार का नाम उनकी जीवन शैली का प्रतिबिम्ब था।और उनकी आवाज़ में शामिल इना मीना डीका और उडलिंग की जुंबिश, संगीत की दीवानी ऑल्ट्रा मॉडर्न पीढ़ी की भावनाओं के साथ आगे भी थिरकती रहेगी। 

 






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