क्या आप भी पाकिस्तान का ‘हल’ आज़माना चाहते हैं?

खरी बात , सोशल मीडिया, बृहस्पतिवार , 17-08-2017


lesson-of-pakistan

आशुतोष कुमार

यह तो सभी जानते और मानते हैं कि पाकिस्तान से धार्मिक अल्पसंख्यकों का लगभग उन्मूलन हो गया। वे जितने भी वहां बचे हैं, जान की ख़ैर मनाते हैं। इज़्ज़त और अधिकार के बारे में थोड़ी बहुत गुन-सुन अब जाकर शुरू हुई है।
यह भी उस कथित मुश्किल को हल करने का एक तरीका है, जिसे अल्पसंख्यक समस्या कहते हैं। न अल्पसंख्यक होंगे, न कोई समस्या होगी। कुछ लोग भारत में भी इसे गम्भीरता से आजमाने के पक्ष में हैं।

तो क्या पाकिस्तान ने अपनी अल्पसंख्यक समस्या हल कर ली है?

अल्पसंख्यक समस्या मतलब आतंकवाद

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल 

अब देखिए तो पाकिस्तान भारत की तुलना में बहुत छोटा सा देश है। मगर वहां आतंकवादी घटनाओं में मौतें भारत से कई गुना ज्यादा होतीं हैं। शहरों से लेकर कस्बों तक विस्फोट होते रहते हैं। मस्जिदों, खानकाहों और स्कूलों पर हमले होते रहते हैं। बच्चे और जवान भारी तादाद में मारे जाते हैं। कराची में लंबे समय से गृहयुद्ध जारी है। पंजाब छोड़कर बाकी सभी राज्यों में कमोबेश यही हालात हैं।

मान लीजिए एक दिन वे अपने सभी मुहाजिरों, बलूचियों, पठानों, अहमदियों और शियाओं को मार डालें, तब भी क्या शांति स्थापित हो जाएगी
बिल्कुल नहीं होगी, क्योंकि शांति समुदायों के सफाए से नहीं, लोकतंत्र से स्थापित होती है। जहां लोकतंत्र कमजोर होता है, वहां अपने वजूद और इज़्ज़त की देखभाल के लिए सिर्फ़ बंदूक का सहारा रह जाता है। और बंदूक केवल बंदूक को स्थापित करती है, शांति नहीं।

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल 

भारत में दुनिया की सबसे विराट 'अल्पसंख्यक' आबादियाँ बसती हैं, फिर भी यहां घरेलू आतंकवाद नहीं है। गृहयुद्ध नहीं है। क्यों? सिर्फ़ इसलिए कि यहाँ जैसा भी हो, मगर लोकतंत्र है।

फिर भी आप पाकिस्तान के हल को आजमाना चाहते हैं? बचे खुचे लोकतंत्र को भी मिटाकर यहां भी धार्मिक सैन्यतंत्र कायम करना चाहते हैं? पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सीरिया के रास्ते पर जाना चाहते हैं? जाइए, कौन रोक रहा है। हम जैसे चंद नीम पागल लोग भी कब तक बकते रहेंगे।

लेकिन पाकिस्तान अब बदल रहा है। मज़हबी फौज़ी निज़ाम ने उसका भुरकुस निकाल दिया है। अब वह भारत के रास्ते पर लौटने को बेताब है। यही वज़ह है कि पाकिस्तान की फ़ौज पहले की तरह लपक कर क्रू नहीं करने लगती। 

यह भी अच्छा है। वे इधर आएं। हम उधर चलें। शुभ यात्रा।

(आशुतोष कुमार हिन्दी के वरिष्ठ लेखक, आलोचक हैं।)






Leave your comment