‘बहुसंख्यकों की निगाह में अल्पसंख्यक उनकी बहू’

बहस-मुबाहिसा , , बुधवार , 19-04-2017


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सर्वप्रिय सांगवान

बात हिन्दू या मुसलमान की नहीं होती, ना ईसाईयों और यहूदियों की होती है। बात होती है बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों की। बहुसंख्यक किसी भी धर्म का हो, उसकी एक साइकोलॉजी होती है। वो अल्पसंख्यक के साथ वैसे ही बर्ताव करता है जैसे अपने घर की बहू के साथ। मतलब अल्पसंख्यक रहे तो हमारे हिसाब से। अपनी ताक़त का बार-बार प्रदर्शन कर वो शायद अपनी असभ्यता और संकीर्णता दिखा रहा होता है या अंदर से असुरक्षित होता है कि अगर किसी दिन ये सत्ता अल्पसंख्यक के हाथ आ गयी तो क्या होगा। ये साइकोलॉजी आप मुस्लिम प्रधान देश, ईसाई प्रधान देश या हिन्दू प्रधान देश...सब जगह पाएंगे।

'मैं मेरे देश के मुस्लिमों के साथ'

मैं मेरे देश के मुस्लिमों के साथ इसलिए हूँ क्योंकि वो अल्पसंख्यक हैं और इसलिए बहुत मायनों में उनके साथ अन्याय होता है। लोगों की ज़िन्दगी बर्बाद होते देखी है सिर्फ इसलिए क्योंकि वो मुस्लिम थे, अल्पसंख्यक थे। मैं उनके साथ उनके धर्म की वजह से नहीं हूँ और ना मैं किसी धर्म को महान मानती हूँ। मैं दोहरा रही हूँ कि महान कुछ भी नहीं होता। आप जिस दिन खुद के जाति-धर्म की पहचानों पर गर्व करना बंद कर देंगे, उस दिन अपनी जाति-धर्म के लोगों के किये गए गलत कामों पर शर्म भी आनी बंद हो जायेगी।

ढोंग को समझने की जरूरत

करोड़ों लोग कथा सुनने जाते हैं, प्रवचन सुनने जाते हैं। उनका मन बदला होता तो क्या देश की हालत ऐसी होती? किसी का दिल दुखाने से पहले वो एक मिनट नहीं सोचते। कई औरतों को तो मैंने देखा है कि बाबा जी की बड़ी भक्तन लेकिन घर आकर बहू को पीट भी देती है। आदमी भगवान का पाठ करके आता है या नमाज़ करके आता है और घर की औरतों के साथ अन्याय कर रहा होता है या देख रहा होता है। मेरे पड़ोसी इतना ऊंचा मंत्र का जाप करते हैं कि लाउडस्पीकर की ज़रुरत नहीं लेकिन रिश्वत को वो जायज़ ठहराते हैं।

अंधविश्ववास की हद तक जाना उचित नहीं

क्यों हम अपने ईश्वर के साथ इंसानों जैसा बर्ताव करते हैं। इंसानों जैसी शक्ल बना देते हैं, खाना खिलाते हैं। लेकिन भूल जाते हैं कि कुदरत ही तो ईश्वर है जिसे हमने पूरी तरह उजाड़ दिया है। हमें पानी देने वाली नदियां सूख रही हैं। धूप अब खतरनाक हो गयी है। जंगल ख़त्म हो रहे हैं। जब बाढ़, सुनामी, भूकंप आता है तो आपके व्रत उसको रोक नहीं सकते। जिस दिन सांस लेना और दूभर हो जायेगा, उस दिन भी गाय, क़ुरान, बाइबल आपको सांस नहीं दे पाएंगी। ईश्वर की कुदरत हमारे सामने है और हम उसी को अनदेखा कर रहे हैं। कुदरत तो एक जैसा ही बर्ताव करती है हर व्यक्ति के साथ। यहीं ये हिंट लो कि सब एक ही हैं। धर्म तो बस बिज़नस है।

सबके साथ समान व्यवहार की दरकार

मैं लिबरल हूँ, इसलिए सब धर्मों की इज़्ज़त भी करना आता है और उनकी आलोचना भी। अगर मुझे लाउडस्पीकर सुनना है तो सभी धर्मों का सुनना है वरना किसी का नहीं सुनना है। साधारण बात है। व्यक्तिगत तौर पर मुझे सब सुनना पसंद है और अगर वो किसी दूसरे के लिए खलल है तो सब कुछ सुनना नापसंद है। मैं शाकाहारी हूँ और किसी भी जानवर के कटते हुए नहीं देख सकती। लेकिन मुझे किसी व्यक्ति से कोई दिक्कत नहीं है कि वो क्या खाये। सारी दुनिया में अगर सब शाकाहारी हो गए या मांसाहारी हो गए तो पूरी साइकिल ख़राब हो जायेगी। ये सब ढकोसला है कि ये जानवर नहीं खाना या इन दिनों में नहीं खाना।

लाउडस्पीकर पर बैन लगना ही चाहिए। सबसे पहले इस देश के राजनितिक दलों के लाउडस्पीकर पर जो अभी दिल्ली में भी बेतुके से गाने बजाते घूम रहे हैं, साथ में असल गाना ही हमारे लिए बर्बाद कर रहे हैं कि कभी सुनने का मन ना करे। फिर लगाइये जगराते वाले लाउडस्पीकर पर बैन। क्योंकि वो फ़िल्मी धुनों पर बने इतने फूहड़ और बेसुरे गाने होते हैं कि माता इन्हें नष्ट करने के लिए नया अवतार ले लेंगी और शायद शिव अपना तीसरा नेत्र खोल दें।

श्रेष्ठता बोध ने कहीं का नहीं छोड़ा

इतने देवी देवता और ईश्वर बना लिए हैं हमने। ऐसा क्या किया था उन्होंने। किसी इंसान ने ही किताबों में उनके बारे में लिखा और हमने मान लिया। हमारे आस-पास इंसानों ने जादुई कारनामे किये हैं, खोज की हैं। किसी ने ब्रह्मांड खोजा, किसी ने ई-मेल बनाया, फ़ोन बनाया। क्या हमने उनको भगवान माना? हमने दरअसल उन लोगों को जूते मारे जिन्होंने पहली बार कहा कि धरती सूरज के चारों तरफ चक्कर लगाती है। इतना ही लेवल है धार्मिक अंधभक्तों का। बस, सबका जीना हराम करो और बोलो कि हमारा धर्म सबसे बढ़िया। क्योंकि ये करना आसान है। इंसानियत के लिए मुश्किल काम करने वालों को जूते मारना भी आसान है।

सबसे ज़रूरी बात - धर्म सबसे बड़ा हथियार है राजनीति का सदियों से। पहले मंदिर मस्जिद इसलिए ही तोड़े जाते थे क्योंकि सत्ता वहीँ से चलती थी। मूर्ख मत बनिए।

                                           (सर्वप्रिय सांगवान के फेसबुक पेज से साभार )

 






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