तलाक़ तलाक़ तलाक़ : चिंता, सरोकार और राजनीति

बहस-मुबाहिसा , , सोमवार , 17-04-2017


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जनचौक ब्यूरो

तीन तलाक़ का मुद्दा लगातार सुर्खियों में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ज़ोर देकर इस मुद्दे पर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं।

बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की भुवनेश्वर में हुई बैठक में मोदी ने तीन तलाक़ के मसले को सामाजिक न्याय का मुद्दा बताया।

बड़े लेखक, बुद्धिजीवियों से लेकर आम आदमी तक और प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक इस मुद्दे पर लगातार लिखा और बोला जा रहा है।

तीन तलाक़ के मामले में इस बार अच्छी बात यह है कि मुस्लिम समाज के भीतर से ही इसके विरोध में आवाज़ें मुखर हो रहीं हैं और न सिर्फ़ मुस्लिम औरतें यह सवाल उठा रही हैं बल्कि मुस्लिम मर्द भी उनके समर्थन में आगे आ रहे हैं।

इसके अलावा यह भी ख़ास है कि सभी उदारवादी और प्रगतिशील हिन्दू-मुस्लिम औरत-मर्द इस मुद्दे के सांप्रदायिक करण से भी बचने की सलाह दे रहे हैं और खुद को टटोलते हुए उन लोगों की भी पोल खोल रहे हैं जो इस मसले पर सिर्फ राजनीति करना चाहते हैं।
 

कथाकार असगर वज़ाहत ने इसी विरोधाभास को रेखांकित करते हुए इस विषय पर लघुकथा लिखी है-

तीन तलाक़

- मैं तीन तलाक़ और बुर्के का विरोधी हूं।

- मैं भी हूं। पर आप तीन तलाक़ और बुर्के के क्यों विरोधी हैं?
-
इसलिए विरोधी हूं कि मैं मुस्लिम महिलाओं का भला चाहता हूं। तीन तलाक़ और पर्दा मुस्लिम महिलाओं का शोषण है। उनके लिए अमानवीय है ।
-
आप मुस्लिम महिलाओं के प्रति बहुत संवेदनशील हैं।
-
हां हूं। इसमें क्या बुराई है?
-
बड़ी अच्छी बात है। यह बताइए आदिवासी और दलित महिलाओं के प्रति भी आपके मन में संवेदना है, सहानुभूति है?
-
हां है।
-
तो आप उनके लिए क्या करते हैं?
-
जब तक वे बुर्का नहीं पहनने लगेंगी और उनके समाज में तीन तलाक़ नहीं होने लगेगा तब तक मैं क्या कर सकता हूं?


तीन तलाक़ वाले 'राक्षस' और हम!

"कई साल पहले की बात है कि रमेश और निशा ओपीडी में आये और बताया कि 3 साल शादी को हो गए मगर अभी कोई बच्चा नहीं है। रमेश के टेस्ट करवाये तो उसमें शुक्राणु नहीं बनते थे। बताया Ivf इसका जवाब है।

चूंकि रमेश मेरे गांव के पास के गांव से था इसलिए थोड़ी जानकारी बढ़ गई। तीन चार बार आये।
एक दिन पता लगा कि उनके घर एक लड़के ने जन्म दिया है। मुझे खुशी हुई।
मगर 10 दिन के बाद ही रमेश मेरे पास वार्ड में आया और बताया कि निशा ने ज़हर खा लिया और वह कैजुअलिटी में है। मैं गया। हालत गम्भीर थी मगर होश में थी। पुलिस को उसने यही बयान दिया था कि दवाई की जगह गलती से ज़हर पी लिया। 
मैंने पूछा, " ऐसी क्या बात हो गई थी ?
निशा ने बाकी लोगों को दूर रहने का इशारा किया और बोली-

" Ivf फेल हो गया तो मेरे पर दबाव बनाया, मार-पिटाई की कि मैं अपने ससुर के साथ...
दो दिन मौत से जूझते हुए वह चल बसी।

उसके परिवार में सब खुश थे कि वंश तो चलवा गई।"

धीरेश सैनी की मार्फत डॉ. रनबीर सिंह दाहिया की वॉल से

 

कुरीतियों पर कौन बोलेगा? 

तीन तलाक का सिद्धांत मुझे मंजूर नहीं है और यह ज़रूर मुस्लिमों की एक बड़ी समस्या है जिस पर मुस्लिम धर्म गुरुओं-बुद्धीजीवियों को सोचना चाहिए।

पर हिंदू समाज में व्याप्त दहेज दानव... दहेज हत्या... स्व स्त्री त्यागकर पर स्त्री से संबंध... जैसी प्रथाओं पर कौन बोलेगा... कौन आगे आएगा?

आकाश वर्धन

 

मर्दवाद का क़िला दरकने लगा

आ गए ना अपनी औक़ात पर 

एक औरत ने तीन तलाक़ पर सवाल उठाया 

और तुम्हारा मज़हब पड़ गया ख़तरे में 
मर्दवाद का क़िला दरकने लगा और तुम दौड़ पड़े उसे बचाने 
देने लगे उसे गालियां 
करने लगे उसका चरित्रहनन 
क्या ग़लत कहा उसने ?
तीन तलाक़ औरत के साथ अन्याय है, एकतरफ़ा है, ग़ैरबराबरी है 
और हलाला प्रथा एक घटिया घिनौनी प्रथा है 
बेगुनाह औरत को ज़लील करने का गुनाह है, कोई सभ्य इंसानी समाज इसे क़ुबूल नही कर सकता। 
अपनी क़ौम की आधी आबादी को शर्मसार करके दरकिनार करके आप कभी तरक़्क़ी नहीं कर सकते। 
उनकी आवाज़ सुनो और अपने समाज के भीतर की कुरीतियां ख़त्म करो। 
मैं उन सभी औरतों को सलाम करता हूं जो इस लड़ाई में हिस्सेदार हैं और उनके साथ खड़ा हूं 
शकील खान

 

बीवी नहीं बहन-बेटी की नज़र से देखिए 

तीन तलाक़ पर आपमें और मुझमें सिर्फ़ इतना फर्क है कि आप इसे बीवी की नज़र से देखते हैं और मैं अपनी बहन या बेटी की नजर से। क्या आपको अच्छा लगेगा कि आपके घर की लड़की को कोई झटके से तीन लफ्ज़ बोल कर आपके घर भेज दे?

ख़ालिद अलवी


तलाक़ अच्छा भी, बुरा भी

चलिये, एक बार में तीन तलाक़ मुस्लिम महिलाओं पर बहुत बड़ा जुल्म है। इसे ख़त्म कर देना अब ज़रूरी है, और जिस समाज में तलाक़ जैसा कुछ भी नहीं, उन महिलाओं को पति बिन बोले छोड़ कर चल देता है उसका क्या होगा ?
नोट -: दुनिया को इस्लाम ने रास्ता दिखाया है जब पति-पत्नी एक साथ मिलकर नहीं रह सकते तो तलाक़ एकमात्र आख़िरी रास्ता अपना सकते हैं।

इश्तियाक अहमद


क्या शरियत सिर्फ़ तीन तलाक़ है?

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि देश के ज़्यादातर मुसलमान पर्सनल लॉ में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं चाहते हैं। इससे क्या समझा जाए कि बदलाव हो सकता है लेकिन लोग नहीं चाहते इसलिए बदलाव नहीं कर रहे हैं। बोर्ड ने ये भी कहा कि वो तीन तलाक की पाबंदी के ख़िलाफ़ है। डेढ़ साल का झुनझुना अब कोई ना बजाए। ख़ैर ढाक के तीन पात होना ही था।

शरियत में सिर्फ़ तीन तलाक़ ही है क्या, शरियत क्या सिर्फ़ तीन तलाक़ पर टिकी है क्या, तीन तलाक़ रोकने से शरियत में बदलाव क्या हो जाएगा? बदलाव को कह कौन रहा है। अगर किसी नियम या कानून या तरीके से नुकसान हो रहा है तो उसको बंद किया जा सकता है। बदलाव की बात कहां से आई।

निदा रहमान






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Ganesh Kumar :: - 04-17-2017
ग़लत को ग़लत स्वीकार करने में धर्म के ठेकेदारों को पसीने छूटते हैं और ऐसा हो क्यों न इनकी दुकानदारी जो बंद हो जाती है. हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई कुरीतियाँ हर जगह हैं इनका विरोध होना ही चाहिए.