जाओ भाई, अब इस शहर में भी तुम्हारा कोई काम नहीं...

सोशल मीडिया , फेसबुक से, बृहस्पतिवार , 20-07-2017


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रविंद्र पटवाल

पहले किसान थे। खेतिहर मजदूर थे। गांव में गुजारा मुश्किल था। विदेश वाले चाचा मामा ने बोला- आ जाओ, शहर में मजूरी मिलेगा, खाने और पहनने को नया कपड़ा मिलेगा। खेत में 16 घंटा खटने से ज्यादा कमाई होगी। 
शहर आ गए। बड़ी-बड़ी बिल्डिंग बनाई। धूल-मिट्टी में खुद भी सने और बीवी भी और बच्चा भी रेता बजरी और सीमेंट में खेलता रहा। 5-6 साल में आलीशान मकान बन गया। लोगबाग सफेदपोश आ गए। फिर उन्हें काम वाली बाई और सफाई वाला भी चाहिए था। 2-3 जगह काम पर 12-15 हजार मिलने लगे, जो मजदूरी से ज्यादा था। झुग्गी पास में बना दी। अब टूट गई। 
जाओ भाई, अब इस शहर में भी तुम्हारा कोई काम नहीं।

नोएडा में महागुन सोसायटी विवाद के बाद उसके पास की झुग्गी बस्ती हटा दी गई है। फोटो साभार : गूगल

धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का।
तुम इस भारत देश के थोड़े हो?
तुम तो विकास में सबसे बड़े बाधक हो।
तुम एक ऐसे अदृश्य रोबोट की तरह रह सको तो रहो जिसे जब जो आदेश दें हिलो और रफू चक्कर हो जाओ।
पता भी नहीं चलना चाहिए कि कभी थे भी आस-पास। 
यह देश एक साथ कई देश हैं। एक की चीख दूसरे को बिल्कुल सुनाई नहीं देती। अरे इस नोएडा-दिल्ली में नहीं सुनाई देती, आंख के सामने। बस्तर, कालाहांडी और असम के बाढ़ की क्या ख़ाक सुनाई देगी।
आखिर देश की असली तरक्की तो यही लोग कर रहे हैं लोन लेकर घर, गाड़ी लेने वाले।
आखिर इनके ही बल पर तो कार, बिल्डर, कामर्शियल माल बन रहे हैं। आईटी सेक्टर का जब दिवाला पिट जाये तो इनके लिए बिल्कुल मत रोना। ये संभाल लेंगे। ट्रम्प को मना लेंगे, आस्ट्रेलिया को मना लेंगे। विदेशों में इण्डिया-इण्डिया का नारा लगाएंगे। विश्व गुरू ये ही बनाएंगे। 

(नोएडा में महागुन सोसायटी के पास की झुग्गी बस्ती उजाड़ दी गई है। रविंद्र पटवाल ने इसी घटना से दुखी होकर व्यंग्यात्मक शैली में यह टिप्पणी की है।)






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