एक आवाज जो कुचल दी गयी: रवीश कुमार

विवाद , नई दल्ली, बुधवार , 19-07-2017


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रवीश कुमार

परॉन्जॉय गुहा ठाकुरता ने अदानी पावर लिमिटेड को लेकर EPW में दो रिपोर्ट छापी। एक रिपोर्ट थी कि कैसे एक हज़ार करोड़ की कर वंचना की गई है और दूसरी कि कैसे सरकार ने 500 करोड़ का फायदा पहुँचाया। अदानी ग्रुप ने मानहानि का नोटिस भेज दिया और कहा कि दोनों रिपोर्ट हटा दें। EPW को संचालित करने वाले समीक्षा ट्रस्ट ने कहा कि दोनों रिपोर्ट हटा दें। परॉन्जॉय गुहा ठाकुरता ने मना कर दिया और इस्तीफ़ा दे दिया। The Wire पर दोनों स्टोरी है और वायर का कहना है कि नहीं हटायेंगे। 

आप दोनों रिपोर्ट को पढ़ें और ज़ोर ज़ोर से गायें- गोदी में खेलती हैं इसकी हज़ारों मीडिया। 

गोदी मीडिया ही आप पाठकों की नियति है। जनता सत्ता कारपोरेट कुटुंब चुनती रहेगी। अकेला पत्रकार जोखिम उठाता रहेगा। मारा जाता रहेगा। बहस चलती रहेगी। ये सूचना हिन्दी में इसलिए दी कि हिन्दी के अख़बारों की अब औकात नहीं रही। वे आहत ज़रूर हो जायेंगे और गिनाने लगेंगे कि हमने ये किया वो किया। जबकि ये वो के अलावा यही किया कि रोज़ छपते रहे और आप पैसे देते रहे। अखबारों को भी पता है कि गोदी मीडिया ही सच्चाई है। यह जानकर आप पर क्या फर्क पड़ेगा, हम नहीं जानते। द वायर की स्टोरी का लिंक दे रहा हूँ। वायर हिन्दी में भी है। 

नोटिस भेजकर डराने का चलन ज़्यादा हो गया है। मानहानि की आड़ में ताक़तवर खेल खेल रहे हैं। कोई इन खूंखार वकीलों के आगे कैसे टिकेगा। केस मुक़दमा लड़ने के लिए कहाँ से पैसे लायेगा। इस डर के कारण ही कोई कारपोरेट पर सवाल नहीं उठाता है। ठाकुरता उन विरले पत्रकारों से हैं जो कारपोरेट और सरकार के जटिल खेल को समझते थे और भांडाफोड़ कर देते थे। अब वे भी हटा दिये गए। भारत की आम जनता तक तो ये पोस्ट पहुँचेगा नहीं। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि एक आवाज़ कुचल दी गई। 

सवाल ठाकुरता का नहीं है। आपका ही है। जो युवा नौकरी और तमाम सवालों को लेकर मीडिया हाउस के बाहर घूम रहे हैं, उन्हें अब किसी वकील के पास जाना चाहिए। पूछना चाहिए कि आपके पास कोई नोटिस है जिसे भेज कर मीडिया हाउस से कह सकें कि ये ख़बर आपने क्यों नहीं छापी? पत्रकारिता को दब्बू बनाने में जनता क्यों साथ दे रही है? वो क्यों चुप है? क्या वो मरना ही चाहती है? 

जनता को परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। हिन्दू मुस्लिम विवाद के नए नए संस्करण लाँच होते रहेंगे। वो उसमें उलझ कर मौज करे। जब जनता ही पत्रकारों का साथ नहीं देगी तो पत्रकार क्या करे। 

Satyagrah, newslaundry, scroll, wire और altnews की साइट पर जाते रहिए। पता नहीं ये भी कब तक रहेंगे। कोई केस मुक़दमा या संपादकों पत्रकारों पर छेड़खानी का आरोप लगाकर फिक्स करने की योजना बन ही गई होगी। फिर इनकी ख़बरों से आप हिन्दी अख़बारों के स्तर को मिलाते भी रहिए। काफी कुछ सीखेंगे। चैनल तो कूड़ा बन ही गए हैं। 

जय हिन्द ।  जय भारत। जय गोदी मीडिया । ये नारा लगाते हुए ज़मीन पर साँप की तरह लोटिए। मुक्ति मिलेगी।

(लेखक रवीश कुमार एनडीटीवी में एंकर हैं।) (रवीश कुमार के फेसबुक से साभार।)






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