दलित राष्ट्रपति : महज़ संकेतों की राजनीति

खरी बात , , बृहस्पतिवार , 22-06-2017


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अश्वनि कुमार श्रीवास्तव

दलित राष्ट्रपति बनाना अच्छा कदम है। लेकिन सांकेतिक तौर पर अपने साथ जोड़ने की बजाय कहीं बेहतर होता कि सभी तथाकथित सवर्ण मिलकर जाति प्रथा ही ध्वस्त कर दें। वरना दलित को राष्ट्रपति बनाना श्री राम द्वारा शबरी के बेर खाने जैसा ही सांकेतिक कदम माना जाएगा, जिसका मकसद शबरी को बराबरी देना नहीं बल्कि राम की श्रेष्ठता को स्थापित करना ही है। 

सवर्ण श्रेष्ठता की चालाकियां!

यहां भी दलित राष्ट्रपति बनाकर भाजपा हिन्दू राज और सवर्ण श्रेष्ठता को ही स्थापित करना चाहती है। जबकि ग्रास रूट यानी गांव-देहात, कस्बों में दलित आज भी सवर्ण भाजपाइयों के लिए हिकारत और घृणा के पात्र हैं, जिन्हें वे न तो बराबरी देना चाहते हैं और न ही उन्हें किसी और संसाधन में हिस्सा देने को तैयार हैं।

सांकेतिक तस्वीर।

जातिप्रथा को ध्वस्त करने के लिए धर्म और धार्मिक ग्रंथों में वर्णव्यवस्था को उसी तरह से अछूत, शूद्र और म्लेच्छ घोषित करवाने के लिए सवर्णों को एकजुट होना होगा, जैसे कि कभी खुद को ऊंचा और दूसरों को नीचा, शूद्र और म्लेच्छ घोषित करवाने के लिए इनके पूर्वज एकजुट हुए थे। रोटी, बेटी और बराबरी का संबंध जिस दिन सभी हिंदुओं में बन जाएगा, नाम से जाति, गोत्र आदि की नस्लीय पहचान मिट जाएगी, धर्मग्रंथों में जातिवाद के चैप्टर, श्लोक या किसी भी तरह के जिक्र को हमेशा हमेशा के लिए मिटा दिया जाएगा, जातिवाद खुद-ब-खुद ध्वस्त हो जाएगा। 

ईसाइयों या मुस्लिमों में जातिवाद क्यों नहीं रहा? क्योंकि उनके धर्मग्रंथ सभी ईसाई या मुसलमान को एक बराबर मानते हैं। बस यही संदेश हमारे धर्मग्रंथ दे दें...बात ही खत्म हो जाएगी।

सवर्णता के साथ मनुष्यता संभव नहीं

सवर्णता के साथ मनुष्यता? यह संभव नहीं है। सवर्ण होने के बाद कोई मनुष्य कैसे हो सकता है? मनुष्यों के बीच किसी मनुष्य द्वारा ही बाकियों से जन्मजात श्रेष्ठता की भावना रखना ही ग़ैर मनुष्यता के लक्षण हैं। 

किसी कथित निम्न जाति को जन्म के आधार पर अयोग्य माना गया, यह सच नहीं है। कथित निम्न जातियों को योग्यता या अयोग्यता साबित करने का मौका ही देने से इनकार कर दिया गया है। दरअसल, सवर्ण बिरादरी अपने देश में ही फेयर कॉम्पटीशन नहीं चाहती और न ही करती है। इसलिए भारत के नाम पर अभी जो भी सेना, खेल टीम या कुछ भी दिख रहा है, वह सवर्ण भारत ही है। सवर्ण भारत की यह व्यवस्था आरक्षण से आई है, बिना किसी प्रतिस्पर्धा के...जन्म के आरक्षण से।

(पत्रकार अश्वनि कुमार श्रीवास्तव की यह टिप्पणी उनकी फेसबुक वॉल से ली गई है। यह लेखक के निजी विचार हैं। 'जनचौक' का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)






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