सहारनपुर: ‘एसपी देहात ने अपने सामने आग लगवाई’

बहस-मुबाहिसा , , बुधवार , 17-05-2017


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कंवल भारती

मुरादाबाद। कामरेड के आते ही वे तीनों लोग उठकर खड़े हो गए, और रमेश से विदा लेकर चले गए। अस्पताल के वार्ड में मरीज के पास ज्यादा भीड़ वैसे भी नहीं रहनी चाहिए। इसलिए उन्हें रमेश ने भी रोकने का प्रयास नहीं किया।

कामरेड ब्रह्मस्वरूप जी को रमेश जानते थे, क्योंकि वह रामपुर में अधिकारी रह चुके थे। वह अब नौकरी से रिटायर्ड हैं और कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय हैं। जब वह नौकरी में थे, तो उन्होंने अपने विचारों से बहुत से लोगों को बदला था। मेरे भीतर भी उन्हीं के संपर्क में रहकर समाजवादी विचारधारा का विकास हुआ था। कबीर के शब्दों में इसे ‘बिगड़ना’ और ‘निबरना’ कहते हैं— ‘संतन के संग कबिरा बिगरयो, सो कबीर राम ह्वै निबरयो’। सो उनके साथ बैठना जरूरी था। 

मैंने रमेश से कहा, ‘आपके ये दोस्त बुरा मान गए।’ उसने मुझे आंखों के इशारे से समझाया, जाने दो। 

कामरेड ने रमेश का हालचाल जाना, और एक्सीडेंट पर अफ़सोस जताया। फिर मुझसे बोले, ‘ऐसी क्या जल्दी है, रामपुर दूर है कोई?’

मैंने कहा, ‘दूर तो नहीं है। कल बाहर जाना है, इसलिए....

‘कौन दोस्त नाराज हो गए थे? क्या बहस चल रही थी?

मैंने कहा, ‘शब्बीरपुर की घटना पर बात चल रही थी। खैर छोड़िये। आप बताइए, ‘क्या चल रहा है? क्या घर से ही आ रहे हैं?’

बोले, ‘घर से तो नहीं आ रहा हूं। हमारा एक प्रतिनिधि मंडल सहारनपुर से आज लौटा है। उन्हीं के पास से आ रहा हूं।’

मैंने कहा, ‘यह तो आपने बहुत अच्छा काम किया। कुछ बताइए, क्या रिपोर्ट है? कितने लोग गए थे?’

नंगी आंखों से सहारनपुर का सच

उन्होंने चार लोगों के नाम बताए, थान सिंह, विक्रम सिंह एडवोकेट, विकास नेगी और शरीफ अहमद। ये चारों जने मुरादाबाद में सक्रिय वामपंथी कार्यकर्त्ता हैं। इनमें थान सिंह दलित समुदाय से आते हैं, विक्रम सिंह ओबीसी से हैं, विकास नेगी ठाकुर हैं और शरीफ अहमद जैसा कि नाम से ज़ाहिर होता है, मुसलमान हैं। उन्होंने बताया, ‘हमारे प्रतिनिधियों ने गांव में जले हुए घरों को देखा, अस्पताल में जाकर घायलों को देखा और गांधी पार्क जाकर भीम आर्मी और अन्य संगठनों के लोगों से भी मुलाकात की

आगे का हाल उन्हीं की जबानी—

‘गांव में जब वे गए, तो सारे घर जले हुए थे। अखबार वाले लिख रहे हैं, 25 घर जले हैं, पर वे झूठ बोल रहे हैं। जले हुए घरों की संख्या पचास से भी ऊपर है। उनके घरों के सामान के साथ-साथ उनके जानवर, भूसा, भिठोरा और गाडियां सब जल कर ख़ाक हो गए हैं। कुछ नहीं बचा है। कुछ बूढ़े गांव में लौट आये हैं, पर उनके सामने जो बड़ी समस्या है, वह यह है कि वे खाएं क्या और सोये कहां? जिले के हमारे कुछ नेताओं ने उन्हें खाने-पीने का सामान और जानवरों के लिए भूसा भेजा था। उसे पुलिस ने नहीं जाने दिया। गांव वालों ने बताया कि एसपी देहात ने अपने सामने आग लगवाई है। जब सारे घर जल गए, तो एसपी ने उन लोगों से कहा कि अब तो सब कुछ जल गया, अब तो जाओ। उसके बाद ही हमलावर भागे थे।

‘उन्होंने अस्पताल में जाकर घायलों को देखा, तो वहां कितने ही लोग दर्द से तड़प रहे थे, किसी का हाथ कटा हुआ था, तो किसी का पांव। बहुत बुरी दशा है। प्रशासन का रवैया भी उनके साथ उपेक्षा का है, क्योंकि वह उन्हीं को कसूरवार ठहरा रहा है। 

हर कदम पर पुलिस का रवैया दलित विरोधी

‘अस्पताल से वे गांधी पार्क में गए। वहां बड़ी संख्या में भीम आर्मी के नौजवान इकट्ठा थे। वहां काफी लोगों से मुलाक़ात की। उन्होंने बताया कि हमारे लड़कों को पुलिस ने बुरी तरह मारा है, और पचास लोगों को जेल में डाल दिया है। वे रविदास छात्रावास पर मीटिंग करना चाहते थे, पर पुलिस ने होने नहीं दी। उन्होंने पुलिस से अपील कि वे शांतिपूर्वक बैठकर बात करेंगे और सिर्फ शासन को देने के लिए मांगपत्र तैयार करेंगे, इसके सिवा कुछ नहीं करेंगे। लेकिन पुलिस नहीं मानी। पुलिस ने कहा, ऐसे कामों के लिए गांधी पार्क है, वहां चले जाओ फिर जब वे गांधी पार्क में आये, तो वहां भी पुलिस ने उन्हें मीटिंग नहीं करने दी। जब लड़कों ने वहां से उठने से मना कर दिया, तो पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज कर दिया, और पचास को उठाकर ले गयी। इसके बाद लड़के जोश में आ गए, उन्होंने सड़क पर जाम लगा दिया। कुछ ने तोड़फोड़ भी की, और पुलिस के एक वाहन में आग लगा दी।’ 

‘मतलब, पुलिस को दलितों का विरोध भी पसंद नहीं है। पुलिस और सवर्ण मिलकर सारे जुल्म करें, दलित विरोध भी न करें।’ मैंने कहा कि ‘अब आगे क्या प्रोग्राम है आपका?’

वे बोले, ‘मुरादाबाद में धरना देने पर विचार कर रहे हैं।’

मैंने पूछा, भीम आर्मी के बारे में क्या ख्याल है?’

उन्होंने जवाब दिया, ‘अच्छा ख्याल है। मायावती और दलित नेता कुछ नहीं कर रहे हैं, तो प्रतिरोध कौन करेगा? भीम आर्मी की इस माहौल में जरूरत है। उसको हम सहयोग करेंगे।’

कम्यूनिस्ट पार्टी भीम आर्मी के साथ

मैंने कहा, ‘यह सुनकर अच्छा लगा कि कम्युनिस्ट पार्टी उनके साथ है और सहयोग कर रही है। पर गम्भीर सवाल यह है कि इसका हल क्या है?’

वे बोले, ‘चलो हल भी बताते हैं। पहले यहां से चलो।’

मुझे वास्तव देर हो रही थी। इधर रमेश के परिवार से कुछ महिलाएं आ गयीं थीं। सो हमें उठना ही था। मैंने जेब से लिफाफा निकाला और रमेश के बेटे को देते हुए कहा, ‘कुछ थोड़ी मदद है। रख लो।’ और हम दोनों रमेश से विदा लेकर बाहर आ गए।

कामरेड अपनी गाड़ी से थे। बोले, ‘चलो, मैं आपको स्टेशन छोड़ता हुआ निकल जाऊंगा।’

मैंने गाड़ी में बैठकर अपना सवाल दुहराया। कामरेड बोले, ‘जातिवाद में तो इस समस्या का हल नहीं है।’

‘फिर?’

‘हल तो वर्ग संघर्ष में ही है।’

इसका मतलब है कि हम वर्ग बनने का इंतज़ार करें, और तब तक मार खाते रहें।’

वे बोले, ‘वर्ग तो बन रहे हैं। पर उनका बोध नहीं हो रहा है, वर्ग की पहचान नहीं हो पा रही है। इसका कारण यह है कि पूंजीवाद पूरी तरह नहीं आ रहा है, इसलिए सामंतवाद और ब्राह्मणवाद समाप्त नहीं हो रहा है। यह लड़ाई मालिक और गुलाम की है। ठाकुर बहुमत में सामंती चरित्र के हैं, अपने को मालिक समझते हैं, और दलित बहुसंख्या में सर्वहारा वर्ग है। सर्वहारा जब ऊपर उठना चाहता है, और मालिक की बराबरी करने लगता है, तो मालिक वर्ग उसे बर्दाश्त नहीं करता, उसे कुचल देता है। अगर पूंजीवाद का विकास पूरी तरह हो जाये, तो फिर शोषक और शोषित, अमीर और गरीब ये ही दो वर्ग रह जायेंगे, जातियां खत्म हो जाएंगी, और तब लड़ाई आसान हो जायेगी। अब लड़ाई जाति, धर्म और राष्ट्र में उलझी हुई है, इसलिए वर्गीय संघर्ष नहीं हो पा रहा है। आप देखिये, मुसलमान मारे जा रहे हैं, आदिवासी कुचले जा रहे हैं, दलितों पर हमले हो रहे हैं। इनका प्रतिरोध तो हो रहा है, पर समस्या का हल कहां निकल रहा है?’

पहचान बनाम जाति बनाम वर्ग

‘फिर क्या किया जाए? जाति तो भारतीय जीवन में बहुत बड़ा फैक्टर है। वामपंथी भी धर्म और जाति से चिपटे हुए हैं। वे क्या आदर्श छोड़ रहे हैं? मैंने कहा।

उन्होंने कहा, ‘बिल्कुल, जाति बहुत बड़ा फैक्टर है और इसी की वजह से पहचान की राजनीति चल रही है। तब वर्ग की पहचान कैसे हो सकती है?’ 

मैंने कहा, ‘मैं आपकी बात से सहमत हूं। पहचान की राजनीति भी तो अपने बल पर आगे नहीं बढ़ती। कोई भी दलित नेता सिर्फ दलितों के वोट से विजयी नहीं होता, उसे जीतने के लिए सवर्णों का वोट चाहिए ही। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के सारे दलित विधायक और सांसद, यहां तक कि बहिन मायावती भी दलित-उत्पीड़न की घटनाओं पर आन्दोलित नहीं हैं। क्योंकि, अगर वे बोलेंगे, आन्दोलन करेंगे, तो उनका सारा चुनावी खेल बिगड़ जायेगा। इसलिए बड़ा सवाल यह है कि दलित राजनीति को दलितों के प्रति उत्तरदायी कैसे बनाया जाए?’

‘कैसे बनाएंगे?’ कामरेड ने पूछा।

भीम आर्मी का हाल पेंथर वाला न हो

मैने कहा, ‘वह मुझे मालूम है। पर वह बहुत लम्बी राजनीतिक लड़ाई है। भीम आर्मी को लेकर मैं ज्यादा निश्चिन्त नहीं हूं। क्योंकि, दलित पेंथर भी इन्हीं परिस्थितियों में पैदा हुआ था, जिसके एक कवि ने कहा था कि ऐसी आज़ादी को, क्या मैं अपने पिछवाड़े में डालूं, जो हमें गुलाम बनाकर रखना चाहती है? लेकिन उसका क्या हश्र हुआ? आज वह कहां है? अगर भीम आर्मी भी दलित पेंथर के रास्ते पर चली, तो वह बहुत जल्दी इतिहास भी बन जायेगी।’

‘उसे क्या करना चाहिए?’

‘उसे किसी भी दलित राजनेता की न आलोचना करनी चाहिए, और न उसे अपना नेतृत्व देना चाहिए।’

‘और राजनीतिक एजेंडा?’

‘वह तो पहचान का ही एजेंडा होगा। तब सवर्णों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। आखिर दलित किसे वोट दें? भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा, ये चार ही विकल्प तो हैं। इन चारों को वह आजमा चुका है। इसलिए राजनीति से दूरी बनाकर ही भीम आर्मी कामयाब हो सकती है। हां, अगर वह राजनीतिक रूप से कुछ कर सकती है, तो उसे दलितों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग करनी चाहिए।’ मैंने कहा।

उन्होंने कहा, ‘यह तो जातिवाद की ओर लौटना होगा’।

मैंने कहा, ‘हां, पर दलित राजनीति को उत्तरदायी बनाने के लिए यह जरूरी है।’

कामरेड सहमत नहीं थे। पर, वो बोले कुछ नहीं। स्टेशन आ गया था। मैं गाड़ी से उतरा, और धन्यवाद के साथ मैंने उनसे विदा ली।

 

 

 

 






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