सहारनपुर हिंसा : दलितों को मुसलमानों से लड़ाने की साजिश!

विवाद , , शनिवार , 22-04-2017


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जनचौक ब्यूरो

सहारनपुर की घटना ने सबको चौंका दिया है। वजह है कि तमाम जलसों-जुलूसों को लेकर तो यूपी में झगड़े होते रहते हैं लेकिन अब अंबेडकर के नाम पर भी यह सब...!

बीजपी कठघरे में!

यह झगड़ा दो समुदायों में हुआ टकराव था या एक वर्ग विशेष की सोची समझी साजिश, इसका जवाब तो पुलिस प्रशासन ही देगा, लेकिन सहारनपुर से जो ख़बरें मिल रही हैं उनमें से ज़्यादातर बीजेपी की ओर ही उंगुली उठा रही हैं।

कहा जा रहा है कि बीजेपी ने ही अपने राजनीतिक हित के लिए दलितों को उकसाकर यह सब बवाल कराया।

यहां पिछले कई सालों से अंबेडकर जयंती पर शोभायात्रा नहीं निकाली गई है, लेकिन इस बार सरकार बदलने पर नयी परंपरा शुरू करने कोशिश की गई। इस बार भी प्रशासन ने यहां शोभायात्रा के लिए अनुमति नहीं दी थी।

बताया जाता है कि बाद में सांसद के आग्रह पर गांव से बाहर शोभायात्रा निकालने की मौखिक अनुमति दी गई लेकिन इस जुलूस को जानबूझकर गांव के भीतर ले जाया गया जिससे यह टकराव हुआ।

गुजरात मॉडल!

कुछ लोगों ने इसे गुजरात मॉडल भी बताया। इन लोगों का कहना है कि गुजरात में भी इसी तरह समाज में बंटवारा कर दिया गया, खासकर दलितों को मुसलमानों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया।

भाई को मेयर बनाना है?

यह भी कहा जा रहा है कि बीजेपी सांसद राघव लखनपाल यह सब अपने भाई को आगे लाने के लिए कर रहे हैं। दरअसल यूपी में अब जल्द ही नगर निगम के चुनाव होने वाले हैं और कहा जा रहा है कि सांसद महोदय अपने छोटे भाई को सहारनपुर से मेयर बनाना चाहते हैं। सांसद ने अपने भाई को विधानसभा का टिकट भी दिलाना चाहा था, लेकिन इसमें वह कामयाब नहीं हो सके।

जनचौक इन दावों और ख़बरों की स्वतंत्र तौर पर पुष्टि नहीं करता है। लेकिन यह तथ्य भी ध्यान रखने योग्य है कि यूपी में इतनी बड़ी जीत हासिल करने वाली बीजेपी सहारनपुर नहीं जीत पाई। सहारनपुर की सात सीटों में बीजेपी के हिस्से देवबंद समेत चार सीटें तो आईं लेकिन बेहट के अलावा सहारनपुर नगर और देहात सीट वह नहीं जीत सकी।

यह गांव सड़क दूधली जहां यह सारा विवाद हुआ वह सहारनपुर देहात सीट के अंतर्गत आता है। यहां से कांग्रेस के मसूद अख़्तर जीते हैं, जबकि बीजेपी यहां तीसरे स्थान पर रही। सहारनपुर नगर से समाजवादी पार्टी विजयी हुई, जबकि बेहट सीट भी कांग्रेस के हिस्से में आई।

जहां बीजेपी कमज़ोर वहां सांप्रदायिक तनाव!

यह तथ्य इसलिए भी गौर करने लायक है क्योंकि इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी जहां-जहां कमज़ोर रही वहां इस समय तेज़ी से सांप्रदायिक उभार हो रहा है। मेरठ भी इसका उदाहरण है। मेरठ सदर में समाजवादी पार्टी के रफीक अंसारी ने बीजेपी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी को पराजित किया।

आप देख सकते हैं कि मेरठ में इन दिनों वह चाहे नगर निगम में वंदेमातरम गाने की अनिवार्यता का सवाल हो या फिर कश्मीरी छात्रों को निकालने के होर्डिंग, कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर हो रहा है कि जिससे सांप्रदायिकता भड़के। हालांकि मेरठ और सहारनपुर पहले से ही काफी संवेदनशील रहे हैं।  

सोशल मीडिया पर भी सहारनपुर की घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं और चिंताएं जाहिर की गई हैं।

अंबेडकर दंगों का आधार बने!

दलित बुद्धिजीवी और लेखक कंवल भारती लिखते हैं-

लेखक और चिंतक कंवल भारती

उत्तर प्रदेश में दलितों को मुसलमानों से लड़ाने की शुरुआत हो गयी है। ताज़ा घटना सहारनपुर के एक मुस्लिम बहुल गांव की है, जहां एक भाजपाई सांसद ने दलितों को उकसाकर प्रशासन की अनुमति के बिना ही आंबेडकर जयंती का जुलूस निकलवाया, जो गांव में एक नयी परम्परा  डाले जाने की राजनीति थी। परिणाम स्वरूप जुलूस पर पथराव हुआ, दलितों की खूब पिटाई हुई।  पुलिस ने दोनों तरफ के लोगों को दंगा करने के जुर्म में  गिरफ्तार किया है। भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साध लिए--
1-दलितों और मुसलमानों के बीच खाई पैदा करा  दी
2-मुसलमानों को दलितों का दुश्मन बनाने का काम हो गया ,
3-दलितों को भाजपा की ओर खींच लिया.
4-आंबेडकर को भी दंगों का आधार बना दिया.
आगे आगे देखिये, होता है क्या? पर दलितों को कभी अक्ल नहीं आएगी। 

लेखक और चिंतक एस आर दारापुरी

एक अन्य चिंतक एस आर दारापुरी लिखते हैं कि-

दलित बनाम मुस्लिम दंगा : उत्तर प्रदेश में अम्बेडकर के नाम पर भाजपा की नई शुरुआत
उपलब्ध सूचना के अनुसार सहारनपुर में अम्बेडकर जुलूस बिना प्रशासन की अनुमति तथा पूर्व परंपरा के विपरीत निकाला  गया था, जिस कारण झगड़ा हुआ। इसमें दलितों को भाजपा के सांसद द्वारा  उकसाया गया था। यह भाजपा की दलितों को मुसलमानों से भिड़ा कर दलित वोटों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने का प्रयास है। अगर दलित सावधान नहीं रहे तो भाजपा का मोहरा बन कर बुरी तरह से पिट जाएंगे।
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अप्रैल को जौनपुर में भी इसी प्रकार जुलूस को गलत रास्ते पर ले जा कर बवाल करवाया गया था।

एक अन्य फेसबुक यूज़र तन्वी कहती हैं कि

जब बाबा साहेब ने 22 में से अपनी दूसरी प्रतिज्ञा में कहा था कि मैं राम में आस्था नहीं रखूँगा और न ही उनकी पूजा करूँगा, तो सहारनपुर में बीजेपी की अंबेडकर शोभा यात्रा में जयश्री राम के नारे क्यों लगाए गए। वह भी प्रशासन द्वारा प्रतिबंधित मार्ग पर।

इस जुलूस का अंबेडकरवादियों से क्या लेना देना। यह बीजेपी सांसद शर्मा जी का शक्ति प्रदर्शन था। इसलिए उन पर मुकदमा हुआ है।






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