“प्रार्थना के लिए एकान्त की ज़रूरत"

बहस-मुबाहिसा , , सोमवार , 17-04-2017


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जनचौक ब्यूरो

धर्म बहुत ध्वनि विस्तार करता है, जबकि प्रार्थना के लिए एकान्त की ज़रूरत होती है। गायक सोनू निगम के विवाद पर यह कहना है साहित्यकार अरुण देव का।
 

थोपी हुई धार्मिकता- सोनू निगम

दरअसल सोमवार सुबह बॉलीवुड गायक सोनू निगम ने ट्वीट कर मस्जिदों में होने वाली अज़ान पर सवाल उठाया। उन्होंने लिखा- भगवान सबका ख़्याल रखे। मैं मुसलमान नहीं हूं लेकिन मुझे अज़ान की आवाज़ से उठना पड़ता है। ये थोपी हुई धार्मिकता भारत में कब ख़त्म होगी।

सोनू निगम के ट्वीट

हालांकि उन्होंने दूसरे ट्वीट में यह भी साफ किया कि उन्हें मंदिरों और गुरुद्वारों द्वारा भी तेज आवाज में गाने बजाकर लोगों को उठाना पसंद नहीं है। 

सोनू निगम ने एक के बाद एक चार ट्वीट किए. इन ट्वीट्स के बाद विवाद शुरू हो गया और सोशल मीडिया पर उनके समर्थन और विरोध में लोग खड़े हो गए। कुछ ने इसे सोनू का पब्लिसिटी स्टंट बताया। कुछ ने तो यहां तक कहा कि सोनू शायद मोदी सरकार की नज़रे इनायत चाहते हैं।

कुछ ने इस बहाने कबीर को कोट किया

कांकर- पाथर जोड़ कर मस्जिद दी बनाय
ता चढ़ मुल्ला बांग दें क्या बहरा हुआ खुदाय

कई फेसबुक और ट्विटर यूजर्स ने कहा कि सोनू निगम दूसरे बाबुल सुप्रियो बनना चाहते हैं। गायक बाबुल सुप्रियो पश्चिम बंगाल से बीजेपी के सांसद और केंद्र में मंत्री हैं।   

 

मैं साईं भक्तों से परेशान

पत्रकार हिमांशु मिश्रा अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं- सोनू निगम अज़ान से परेशान हैं और मैं साईं भक्तों से। मेरे घर के ठीक सामने हिंडन हरित पट्टी की ज़मीन को कब्ज़ा कर साई का दरबार सजाया गया है। सुबह, दोपहर, शाम नियम से साउंड सिस्टम पर भजन का कार्यक्रम चलता है। नींद खोने वाले कई लोगों ने आपत्ति कि लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। रोज सुबह शाम भक्तों की लंबी -लंबी गाड़ियां लगती हैं। यकीनन ये डिग्रीधारी नौकरीपेशा वाले लोग या कारोबारी होंगे जो आस्था में अंधे होकर सरकारी जमीन कब्ज़ा कर बनाई गई मंदिर को फलने-फूलने में प्रोत्साहित कर रहे हैं। आप इधर कभी आएं तो देख सकते हैं कि किस तरह 2 किलोमीटर के दायरे में पूरी हरित पट्टी मंदिर मार्ग में तब्दील हो चुकी है। सबने लाउडस्पीकर लगा रखे हैं। इस पर लगाम लगाने का साहस किसी को नहीं क्योंकि ये धर्म का मामला है।
सोनू निगम के बहाने ही सही थोपी गयी आस्था पर बहस ज़रूरी है। धर्म का ये कारोबार बंद होना चाहिए।


ईश्वर की ऐसी ही मर्ज़ी!

ईश्वर जानता है कि कितनी आवाज आपके कानो को मुफीद है इसलिए उसने अपनी उत्पादों मे उतनी ही आवाज करने की योग्यता रखी है जितनी वह स्वयं सुन सकते है
यदि वह चाहता, तो ऐसे यंत्रों को आपके अंदर ही फिट कर देता जिससे आपकी आवाज तेज और बहुत तेज हो जाती इसलिए (लाउड स्पीकर) ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग न तो किसी प्रार्थना मे उचित है न अजान में न देवी जागरण में न ही अन्य किसी धार्मिक गतिविधि मे, अब इस बात को मानना न मानना आपकी मर्जी है। गिरीश मालवीय

एडजस्ट करने की आदत

हम भारतीयों को एडजस्ट करने की आदत है। लेकिन यह कमजोरी नहीं, हमारी ताकत है। इसी की वजह से हमारा वजूद बचा हुआ है। हमारे पास इतने मसले हैं कि एडजस्ट न करें तो लड़ते-लड़ते मर जायें। जब-जब लोगों ने यह सोचा कि किसी के साथ एडजस्ट नहीं करना है, तो टूट-फूट ही सामने आयी। देश में लाखों लोग रेल लाइनों के किनारे रहते हैं। कुछ तो इतने करीब कि हर बार रेल गुजरने के साथ पूरा मकान थर्रा उठता है। मैंने एक बार आगरा के पास सिकंदरा में पूरी रात अधसोई हालत में गुजारी। हर कुछ मिनट पर 100 से ऊपर की रफ़्तार से गुजरनेवाली ट्रेनों के कारण। मैंने सुबह अपनी तकलीफ़ बतायी, तो लोगों ने कहा कि हमें तो आदत हो गयी है। JNU के पास ही दिल्ली का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। कुछ-कुछ देर पर गरजते हुए विमान सर के ऊपर से आते-जाते रहते हैं। सबको ऐसी आदत पड़ गयी है कि जैसे ही विमान ऊपर आता है लोग कुछ लम्हों के लिए खामोश हो जाते हैं और उसके गुजरते ही फिर बतकही शुरू हो जाती है। फिल्म शो या नाटक, विमान गुजरते समय सब कुछ फ्रीज हो जाता है। इसी तरह करोड़ों लोग राजमार्गों के किनारे रह रहे हैं। श्रद्धा हो या न हो, मोहल्लों में मंदिरों का हनुमान चालीसा और अज़ान सुन रहे हैं। सबने अपनी- अपनी तरह से एडजस्ट कर लिया है। नि:शब्द, नीरव, शांत वातावरण भारत में या तो विलासिता है या फिर मजबूरी।

सत्य प्रकाश चौधरी

सताते हैं फूहड़ गाने

गुरूवाणी मुझे अच्छी लगती है पर फ़िल्मी धुन पर फ़ुहड पूजा गाने मुझे eritate करतें है आपको? 
मोहम्मद शहबाज़ मलिक

"नींद में खलल छोटा मुद्दा नहीं"

संगीता सिंह कहती हैं कि नींद में खलल को आप छोटा मुद्दा मान रहे हैं। इसी नींद के लिए तो आदमी कितनी मेहनत करता है कि सुकून की नींद ले सके। उसमें भी कभी कीतर्न के घंटों, कभी मंदिर की प्राथनाओं और कभी अजान के नाम पर टॉर्चर करना बंद करें।

ध्वनि प्रदूषण अधिनियम-2000

नितिन ठाकुर अपनी फेसबुक वॉल पर याद दिलाते हैं कि वैसे noise pollution (regulation and control) rule 2000 के मुताबिक बिना अनुमति लाउडस्पीकर का इस्तेमाल कानून के खिलाफ है. डीएसपी से नीचे की रैंक का अधिकारी खास मौकों तक पर लाउडस्पीकर लगाने की इजाजत नहीं दे सकता है. पूरे साल भर में ऐसे खास मौके भी 15 दिन से ज़्यादा नहीं हो सकते.







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