समाज के नैतिक पतन का सबूत है एके रॉय पर हमला

कानून-व्यवस्था , धनबाद, बुधवार , 18-10-2017


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सचिन झा शेखर

जाने माने मार्क्सवादी चिंतक दर्जनों पुस्तकों के लेखक 1977,1980 और 1989 में भारतीय लोकसभा के सदस्य रह चुके 82 वर्ष के एके रॉय के साथ धनबाद में उनके निवास स्थान पर घुसकर मारपीट की गयी है। रॉय पिछले 5 वर्ष से सक्रिय राजनीति से दूर हैं और बीमार हालत में अपने एक पार्टी कार्यकर्ता की देखरेख में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं।

 

एके रॉय ने कोलकाता विश्वविद्यालय से केमिकल इंजीनियरींग में एम टेक तक की पढ़ाई की और 1962 में बतौर चीफ इंजीनियर सिंदरी खाद कारखाना में नौकरी की शुरूआत की, मजदूरों की मांग के समर्थन में उन्होनें अपने पद से त्यागपत्र  दे दिया और लगातार 3 बार विधायक के रूप में सिंदरी से चुने गए। आपातकाल में जेल से ही चुनाव लड़ने वाले रॉय के विरुद्ध चुनाव प्रचार में आयीं इंदिरा गांधी ने कहा था कि जो एके रॉय को पराजित करेगा मैं उसे मंत्री परिषद में जगह दूंगी, लेकिन फिर भी एके रॉय चुनाव जीत गए धनबाद लोकसभा सीट से।

एके रॉय ने देश में सबसे पहले लोकपाल की मांग लोकसभा में की थी, सांसद विधायकों को वेतन और पेंशन का पहला प्रस्ताव जब संसद में लाया गया तो एके रॉय एकलौते सासंद थे जिन्होंने निर्विरोध रुप से पारित होते प्रस्ताव का विरोध किया और लगभग घंटे भर के अपने संबोधन में तथ्यों के साथ इस प्रस्ताव की आलोचना की और अपना वोट प्रस्ताव के विरोध में दिया। एके रॉय ने जीवन भर जनप्रतिनिधि को मिलने वाले किसी भी सरकारी सुविधा का लाभ नहीं लिया। आज भी उनके पास  किताबें, कुर्ता-पजामा और टायर की चप्पल के अलावा कोई संपत्ति नहीं है, जब सांसद हुआ करते थे तो सरकारी बस से संसद भवन जाया करते थे।

एके राय पर हमले की स्थानीय पेपर में छपी खबर।

झारखंड अलग राज्य आंदोलन में चाणक्य की भूमिका में रहने वाले एके रॉय ने अपनी देखरेख में 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना करवाई। शिबू सोरेन को हजारीबाग के गोला प्रखंड से निकाल कर टुंडी के जंगलों में स्थापित किया और महाजनी प्रथा के विरुद्ध और अलग झारखंड राज्य के पक्ष में आम जनता के बीच माहौल बनाने का कार्य किया। एके रॉय का कहना रहा है की “नेता उस समाज से ही निकलना चाहिए जिस समाज का प्रतिनिधित्व करना हो”, एके रॉय ने वैचारिक रूप से ओत-प्रोत एक जन आंदोलन की रुपरेखा तैयार की जो कि झारखंड की जनजातियों की मनोवेज्ञानिक सोच के तहत था। एके रॉय के द्वारा तैयार की गयी योजना सफल रही और आंदोलन मुकाम पर पहुंचा।

  • झारखंड राज्य के आंदोलन के सूत्रधार रहे हैं
  • माफियाओं ने भी कभी नहीं किया हमला
  • लोगों के नायक के तौर पर देखे जाते रहे हैं एके रॉय

राज्य का निर्माण हुआ, झारखंड अलग राज्य आंदोलन के समानांतर ही मिथिला राज्य का आंदोलन भी खड़ा हुआ था लेकिन वो एक कदम भी नही आगे बढ़ सका। चूंकि बहुत बड़ी आबादी के बीच से नेता का चयन नहीं हुआ और रणनीति एके रॉय की तरह बनाने वाला नहीं था। 1970 के दशक में छत्तीसगढ़ के शंकर नियोगी और झारखंड के एके रॉय को एक हीरो के रूप में देखा जाता रहा था।

एके रॉय ने 5 दशकों के अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी आंदोलन को हिंसक नहीं होने दिया। उनके सादगीपूर्ण और ईमानदार चरित्र के मुरीद उनके विरोधी भी रहते थे। वर्षों कोयला क्षेत्र के माफियाओं के विरुद्ध संघर्ष करते रहने के बावजूद अपराधियों ने भी उनके ऊपर व्यक्तिगत हमला कभी नहीं किया। माफियाओं के विरुद्ध संघर्ष में उनके अनेक साथी मारे गए। शक्ति नाथ महतो से लेकर विधायक गुरुदास चटर्जी तक, लेकिन उन्होंने हर मामले में न्यायीक प्रकिया का सहारा लिया और मामलों के दोषी को कोर्ट से सजा दिलवाया।

ताजा घटना तब हुई है जब रॉय साहब पूर्ण रूप से अस्वस्थ हैं। लकवा ग्रस्त होने के कारण वो अब कुछ बोल नहीं पाते हैं, अपनी पार्टी के कैडर की देख रेख में जीवन के अन्तिम दिन गिन रहे हैं। स्थानीय अखबारों की खबर के अनुसार अब किसी के आने पर वो सिर्फ हाथ उठाकर लाल सलाम कहने का प्रयास करते हैं।

82 वर्ष के एक वृद्ध इंसान के ऊपर हमला करना सामाजिक पतन की पराकाष्ठा को दिखाता है, जिस धनबाद में उन्होंने बीसीसीएल, टाटा, डीवीसी के साथ संघर्ष करके लाखों लोगों को जमीन के बदले नौकरी दिलवाया उस जगह पर उनके कमजोर हो चुके हाथ को मरोड़ा जा रहा है। एक तरफ गाय के नाम पर देश में हत्याओं का दौर चल रहा है तो दूसरी तरफ देश समाज को रास्ता दिखाने वाले महान इंसान को घर में घुसकर पीटा जा रहा है। ये नए भारत का नया चेहरा है।

बुद्धिजीवियों की हत्या की जा रही है, हाल ही में आए मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सरकार की शह पर लोगों को झरिया शहर से उजाड़ा जा रहा है, एके रॉय जैसे लोगों का अस्तित्व ही सरकार की गलत नीतियों के लिए खतरा है। अनसंग हिरो ऑफ झारखंड मूवमेंट नामक पुस्तक में लेखक अनुज कुमार सिन्हा भी एके रॉय को झारखंड आंदोलन के हीरो के तौर पर पेश किए हैं। देश-विदेश में फैले उनके शुभचिंतकों ने घटना की निंदा की है। भाकपा (माले) के महासचिव दिपांकर भट्टाचार्य ने ट्वीट कर इसकी कड़े शब्दों में भर्त्सना की है।

(लेखक आईआईएमसी का पूर्व छात्र होने के साथ स्वतंत्र पत्रकार हैं।)










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Dr.Anand prakash tiwari :: - 10-24-2017
अत्यंत दुखद । बेहद शर्मनाक ।। कायराना हरकत ।