नेताओं और अपराधियों के बीच गठजोड़ का नायाब नमूना है राजस्थान का आनंदपाल एनकाउंटर मामला

राजस्थान , जयपुर, शुक्रवार , 12-01-2018


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मदन कोथुनियां

जयपुर। राजस्थान के बहुचर्चित आनंदपाल एनकाउंटर केस में बीते बुधवार से सीबीआई ने जांच शुरू कर दी है। सीबीआई की एक टीम चूरू के रतनगढ़ स्थित मालासर गांव पहुंची और करीब 2 घंटे तक एनकाउंटर की जगह पर जांच-पड़ताल की। सीबीआई के अधिकारियों ने श्रवण सिंह और परिजनों से पूछताछ भी की। इस बीच इस मामले के कई राजनीतिक कोण भी सामने आने लगे हैं। 

मालूम हो, आनंदपाल श्रवणसिंह के घर में ही छिपा हुआ था और वहीं पर पुलिस ने उसे पिछले साल 24 जून को एक मुठभेड़ में मौत के घाट उतारा था। सीबीआई ने आनंदपाल एनकाउंटर मामले में राजस्थान सरकार की सिफारिशों के बाद तीन केस दर्ज किए हैं। 6 जनवरी को दर्ज इन मामलों में पहला मामला आनंदपाल एनकाउंटर से जुड़ा है, दूसरा सांवराद में सभा के दौरान सुरेन्द्र सिंह राठौड़ की मौत और तीसरा राजपूत नेताओं पर दंगा भड़काने, गैर कानूनी तरीके से भीड़ को जमा करने और अपहरण का प्रयास करने के आरोप में दर्ज केस से जुड़ा है।  

गौरतलब है आनंदपाल एनकाउंटर मामले में सीबीआई जांच कराने के लिए राज्य सरकार ने पिछले साल दिसंबर में दूसरी बार सीबीआई को पत्र लिखा था। इस मामले की जांच के लिए सरकार की ओर से पहले की गई मांग को सीबीआई ने खारिज कर दिया था। केस दर्ज होने के बाद बुधवार को दो गाड़ियों में सीबीआई के करीब 10 अधिकारी मालासर पहुंचे और पूछताछ के बाद वापस लौट गए। 

क्या है आनंदपाल सिंह मामले की सीबीआई जाँच के असली मायने ? 

क्या सीबीआई जांच कर सकेगी कि आनन्दपाल को किन-किन राजनेताओं व पुलिस-प्रशासन अधिकारियों का संरक्षण मिला था और क्यों व किन राजनेताओं व पुलिस अधिकारियों ने उसे जेल से भगाया था। कौन से स्वार्थों की पूर्ति करना चाहते थे ये सामन्तवादी सरकार के नेता और मन्त्री? 

बस सीबीआई जांच करके ये खुलासा कर दे कि आनंदपाल जेल से फरार होने के बाद किसके पास कितने दिन किस राजनेता के कहने पर कहां-कहां रुका व फरारी से पहले व फरारी के बाद किन-किन राजनेताओं के क्या-क्या काम किये? 

सीबीआई को यह भी जांच करनी चाहिए व जनता के सामने सच्चाई रखनी चाहिए कि किन राजनेताओं व पुलिस अधिकारियों ने कौन सी असली वजह या वे कौन से कारण थे जिनके चलते आनंदपाल सिंह को जेल से भगाया गया था? 

आनंदपाल के असली राज व असली चेहरों का पर्दाफ़ाश होना चाहिए। 

क्या है आनंदपाल के सियासी मोहरा होने के मायने 

समय बदल गया लोकतंत्र के रूप में स्वतंत्र भारत के उदय होने के साथ ही सत्ता पर कब्जा करने के लिए फिर से तिकड़मी नेताओं ने राजनीति की नई बिसात बिछा कर देश में छल कपट का खेल शुरू कर दिया। हमारे देश में राजाओं के शासन के समय भी राज परिवार के महलों की जनाने निवास से ले कर बादशाहों के हरम राजनीति की कुटिल चालों के केंद्र होते थे। राजाओं के शासन में भी राज्य सत्ता को हथियाने के लिए घात प्रतिघात छल कपट के खेल खेले जाते थे। शक्ति के इस खेल में हारने वाले के मुकद्दर में फिर उम्र भर कैद या फिर प्राणों की बलि आती थी।

राजनीति के आज के इस दौर में धार्मिक उन्माद भरना तथा अपराधियों का जातीयकरण करके उनको राजनैतिक संरक्षण प्रदान करना, आज के भारत के नेताओं का खास शगल बन गया है। देश में स्वस्थ राजनैतिक मूल्यों के आधार पर आज राजनीति करने वाले नेता कम ही बचे हैं। राजनीति के शिखर पर चढ़ने की जल्दी के कारण राजनीति का माफियाकरण हो गया है। 

देश में बिहार राज्य के धनबाद जिले से सर्वप्रथम कोयला माफिया के रूप में बाहुबली नेताओं का राजनीति में प्रादुर्भाव हुआ था, जो फिर सम्पूर्ण देश में फैल गया। देश के उत्तर प्रदेश, बिहार सहित अनेक राज्यों में बाहुबली अपराधियों की सक्रिय राजनीति में गहरी भागीदारी देखी जाती है। पहले नेता अपराधियों का इस्तेमाल कर के चुनाव जीतते थे, अब अपराधी खुद बाहुबल, धनबल से चुनाव जीतकर सांसद विधायक बन रहे हैं। 

राजनेताओं के द्वारा भष्मासुर अपराधी पैदा करने के रीति-रिवाज राजस्थान प्रदेश में कम ही सुने जाते थे, हाल के वर्षों में दूसरे राज्यों की अपेक्षाकृत शांत माने जाने वाले राजस्थान राज्य में भी नेताओं ने जातीय अपराधियों को तैयार करना शुरू कर दिया है।

राजस्थान राज्य में जाट जाति मूल रूप से खेती करने वाली जाति है और राजपूत समाज राज्य का शासक और सामंत रहा है। सामंत के रूप में राजपूत जाति के दबंगों की राठोड़ी का शिकार जाट जाति बनती रही है। देश की आजादी के बाद जाट जाति मूल रूप से कांग्रेस पार्टी की समर्थक बन गयी। वहीं, राजपूत जाति अपनी जागीरदारी छिनने के कारण कांग्रेस पार्टी की घोर विरोधी बन गयी। 

राजस्थान के शेखावाटी, मारवाड़ अंचल में जाट राजनीति कांग्रेस पार्टी की सरकारों का साथ मिलने के कारण खूब परवान चढ़ी। समूचे शेखावाटी, मारवाड़ क्षेत्र के जिलों में जाट जाति के विधायक सांसद कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतते रहे हैं। भाजपा की सरकार के वर्तमान मंत्री युनुस खां ने कांग्रेस पार्टी की सियासी काट के रूप में राजपूत, मुस्लिम, बनिया, ब्राह्मण जाति का एक नया समीकरण भाजपा को जीत दिलाने के लिए बनाया। 

यहां गौरतलब होगा की यूनुस खां के अपने विधान सभा क्षेत्र डीडवाना में मुस्लिम, राजपूत, जाट जाति के तीन जातीय समूह हैं। इन में दो जातीय वर्ग को जोड़ कर यूनुस खां विधायक बनते रहे हैं। यूनुस खां की विधानसभा में रूपाराम डूडी यूनुस खां के विरोधी जाट जाति के दबंग नेता रहे हैं। इनके समय डीडवाना विधानसभा क्षेत्र में जाट जाति के अपराधियों का क्षेत्र में बोलबाला था।

जीवनराम गोदारा के आरपराधिक जीवन को कांग्रेस के जाट नेताओं का खुला संरक्षण मिला हुआ था। आनंदपाल के बल पर यूनुस खां क्षेत्र में जाटों की दबंगई को समाप्त करके समूचे नागौर, चूरू, झुंझुनू जिलों में राजपूत, मुस्लिम, बनिया, ब्राह्मण का गठजोड़ बना कर इन जिलों में भाजपा को स्थापित करना चाहते थे। इसी कड़ी के तहत आनंदपाल ने एक दिन सरेआम दिन दहाड़े जीवनराम गोदारा की ह्त्या कर दी। 

यूनुस खां के साथ नागौर, चुरू जिलों के भाजपा के राजपूत मंत्री खुल कर फिर आनंदपाल को राजनैतिक संरक्षण देने लगे। अनेक मामलों में आनंदपाल की गुण्डागर्दी के बल पर मकराना की मार्बल खदानों पर कब्जे करने से ले कर जमीनों पर कब्जे करने के मामलों में फिर युनुस खां के परिवार के सदस्यों के नामों की धूम समूचे राजस्थान में सुनी जाने लगी। साल 2013 के विधानसभा चुनावों में आनंदपाल ने खुल कर युनुस खां को चुनाव जिताने में मदद की।

आनंदपाल डीडवाना तहसील का मूल निवासी रहा है। इस कारण यूनुस खां के परिवार की धाक राज्य सरकार से ले कर सम्पूर्ण प्रदेश में मानी जाने लगी। 

नागौर जिले में ही मूंडवा विधानसभा क्षेत्र के विधायक हनुमान बेनीवाल राज्य की मुख्यमंत्री के धुर विरोधी माने जाते हैं। आनंदपाल के बहाने हनुमान बेनीवाल पर भी युनुस खां ख़ासा नियंत्रण रख पाने में सफल हो रहे थे। यूनुस खां मंत्री के रूप में बीकानेर जेल में बंद आनंदपाल से निजी रूप से मिलने पहुंचे थे, इस पर राज्य की राजनीति में तीखी प्रतिक्रया हुई। जेल में बंद खूंखार अपराधी आनंदपाल की सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिस बल की नफरी में कटौती यूनुस खां के प्रभाव से ही की गई। इस का फायदा उठा कर एक दिन पेशी पर जाने के दौरान आनंदपाल पुलिस हिरासत से भाग गया।

राज्य की राजनीति में फिर राजपूत जाति का संरक्षण आनंदपाल को मिलने लगा। इसी तरह राजू ठेहट गिरोह के लोगों को गैर भाजपा दल के नेताओं का संरक्षण मिलने लगा।

बीकानेर जेल में बंद आनंदपाल की हत्या करने के लिए राजू ठेहट गिरोह ने असफल प्रयास किया, जिसमें आनंदपाल का एक साथी मारा गया। अपनी फरारी के दौरान ही एक दिन पुलिस से मुठभेड़ होने पर नागौर जिला पुलिस के जवान खुभानाराम की ह्त्या कर के आनंदपाल फिर पुलिस पकड़ से दूर हो गया। 

साल 2015 सितम्बर 30 तारीख को पुलिस हिरासत से भागा आनंदपाल तब से मुठभेड़ में मरने तक भागता ही रहा। इसी बीच उसने अपने वकील के माध्यम से पुलिस के सामने सरेंडर होने की कोशिशें भी की। फरारी के दौरान अपने उपकारों के बदले आनंद पाल ने यूनुस खां से सरेंडर करवाने के लिए मदद मांगी। इसी दौरान आनंद पाल ने मोबाइल पर यूनुस खां को देख लेने की धमकी दे डाली।

दहशत में आये यूनुस खां ने राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा से मिल कर उन्हें अपनी दुविधा बताई। यहीं से फिर आनंद पाल की हत्या की पटकथा यूनुस खां ने तैयार की। मुख्यमंत्री ने यूनुस की शिकायत पर आनंदपाल का एनकाउंटर करने के लिए राज्य की पुलिस के एनकाउंटर विशेषज्ञ एमएन दिनेश (आई जी पुलिस) को आनंदपाल को ठिकाने लगाने का लक्ष्य दे कर राज्य की एसओजी पुलिस में भेजा।

सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री के पास जाकर आनंदपाल से डरे यूनुस खां खूब रोये थे। भष्मासुर को पालने वाले यूनुस खां पर जब आनंद पाल भारी पड़ने लगा, तब राज्य सत्ता के बल पर आनंदपाल को दिनांक 24 जून 2017 की रात को पुलिस ने गोलीमार कर ढेर कर दिया। 

भारत की राजनीति में भिन्डरावाले, दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, अन्ना शुक्ला, फूलन देवी को पालने वाले भ्रष्ट नेताओं के अनेक किस्से हैं। नेता अपने स्वार्थों को साधने के लिए अपराधियों को संरक्षण दे कर उन्हें पालते पोसते हैं। एक दिन ये ही नेताओं के पालतू अपराधी जब भष्मासुर बन जाते हैं, तब राज्य शक्ति के सहारे इन्हें संरक्षण देने वाले ही इन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। ऐसा ही कुछ आनंदपाल के साथ हुआ। 

(मदन कोथुनियां पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)










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