बस्तर : सरकार और नक्सलियों की जंग में मारा जा रहा है आम आदिवासी!

एक नज़र इधर भी , छत्तीसगढ़, मंगलवार , 06-02-2018


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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। बस्तर में तीन दिनों में 40 से भी ज्यादा वाहन कथित तौर पर नक्सलियों ने फूंक दिए तो वहीं तीन हत्याएं हो गईं और इधर मुख्यमंत्री ने कहा कि नक्सलियों कि उल्टी गिनती शुरू हो गई है, बौखलाहट में वारदात को अंजाम दे रहे हैं। 

दरअसल “बौखलाहट में वारदात अंजाम” ये रेडिमेट जवाब हो गया है! बस्तर में जारी सुरक्षा बल और नक्सलियों के बीच के युद्ध में आम आदिवासी ही मौत के घाट उतारा जाता है, जहां सुरक्षा बलों पर आरोप लगता है कि उन्होंने नक्सली बता कर आम आदिवासी को निशाना बनाया वहीं माओवादियों पर भी आरोप लगे हैं कि उन्होंने भी पुलिस का मुखबिर कहकर कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया। राजनीतिक बयानबाजी के बीच बस्तर में मारने-मरने का खेल बदस्तूर जारी है।

केंद्र अथवा राज्य सरकार ने अब तक नक्सलवाद की समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला है। प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह जी मीडिया में यह जरूर कहते हैं कि हम नक्सलियों से बातचीत को तैयार है। लेकिन बस्तर में जारी खूनी जंग और कॉरपोरेट लूट के बीच आम आदिवासी लगातार पिस रहे हैं।

राज्य में मानवाधिकार का उल्लंघन भी कई गुना बढ़ चुका है। आदिवासियों के जल, जंगल जमीन को विकास के नाम पर बड़ी कंपनियों और खनन माफिया के हाथों बेचे जाने के लगातार आरोप लगते रहे हैं। 

इस बार की हिंसा 5 फरवरी के बंद के नाम पर हुई। माओवादियों ने छत्तीसगढ़ विधानसभा में लाए गए भू राजस्व विधेयक और अन्य ज्यादती के खिलाफ 5 फरवरी को दंडकारण्य बंद का ऐलान किया था। 

आपको बता दें कि सरकार ने शीतकालीन सत्र में भू राजस्व संहिता संशोधन विधेयक पारित किया था लेकिन आदिवासियों ने इसे काला कानून बताते जंगी प्रदर्शन कर विरोध जताया था जिसके चलते सरकार को इसे वापस लेना पड़ा था, मगर यह दिलचस्प है कि इसके बावजूद नक्सलियों ने अपना प्रस्तावित बंद वापस नहीं लिया। 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के प्रवक्ता विकल्प की ओर से प्रेस को जारी बयान में कहा गया कि बीते 4 से 9 जनवरी तक दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा जिले में लगातार पुलिस और सीआरपीएफ, डीआरजी, एसटीएफ कोबरा के जवानों द्वारा आदिवासियों के साथ ज्यादती की गई। सरकार ऑपरेशन ग्रीन हंट के लिए समाधान कार्यनीति के मार्फत आने वाले साल 2022 तक माओवादियों का खात्मा करने और आम जनता पर फासीवादी तरीके से दमन चलाना चाहती है, जिसका विरोध जारी रहेगा। 

बंद बुलाने के तीन दिन पहले से बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों से हिंसक वारदात सिलसिलेवार सामने आती रहीं। 5 फरवरी बंद के दिन बस्तर में अंदरूनी क्षेत्रों में सन्नाटा पसरा रहा और आवागमन बाधित रहा। 

माओवादियों का असर कायम है, जबकि सरकार नोटबंदी का जमुला जनता के सामने परोस कर नक्सलियों की कमर तोड़ने की बात करती रही। नेता-मंत्री राजनीतिक जनसभाओं में नक्सलियों के बैकफुट पर जाने और समाप्ति कि घोषणा करते नहीं थकते थे। लेकिन इसके विपरीत आज भी बस्तर की जनता नक्सलवाद और नक्सलवाद के नाम पर जारी सरकारी हिंसा का दंश झेल रही है।

छत्तीसगढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सचिव संजय पराते कहते हैं कि “बस्तर में सरकार ने अपनी सैन्य ताकत झोंक दी है। 30 लाख की आबादी पर सशत्र बल के 80 हजार जवान तैनात हैं। जारी खूनी संघर्ष को रोकने के लिए सरकारों ने कोई विकल्प नहीं निकाला है, बल्कि उल्टे करोड़ों रुपये के बजट को नक्सलवाद के नाम पर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया जाता है। सरकार अभी तक आम आदिवासियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाई है, लेकिन उद्योगपतियों को जमीनें जरूर उपलब्ध करा देती है। सशस्त्र बल तैनात करना नक्सलवाद का हल नहीं है। सरकार को सभी सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य को लेकर बात करनी होगी, सिर्फ बयानबाजी से हल नहीं निकलेगा।"

मालूम हो कि वर्ष 2017 के नवम्बर में ‘द हिन्दू’ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि छत्तीसगढ़ सरकार यह सुनिश्चित करे कि केवल वास्तविक माओवादी कैडर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण करे। नकली माओवादी आत्मसमर्पण करा कर आंकड़े बढ़ाने से बचे।

आत्मसमर्पण की प्रतिस्पर्धा तक ही नक्सलवाद को सरकार ने समेट कर रख दिया है। 2018 के शुरुआती दौर में ही लगभग 60 से अधिक गाड़ियों को नक्सलियों ने आग के हवाले कर दिया है। मुखबिरी के नाम पर कम से कम छै हत्याए हो चुकी हैं। वहीं पुलिस पर आम आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ में मारने के आरोप लग रहे हैं। मानवाधिकार उल्लंघन के सैकड़ों मामले राज्य सरकार के पास लंबित हैं। हर वर्ष सिर्फ मारा-मारी ही चल रही है। कभी नक्सलवाद से कभी सरकार से।

यहां यह भी समझना जरूरी होगा कि जल,जंगल, जमीन के लिए आदिवासी पिछले तीन सौ वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं जबकि नक्सलवाद पिछले चार-पांच दशक की देन है। स्पष्ट है कि आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार ही नक्सलवाद की समाप्ति है। सरकार को अपनी विकास की परिभाषा बदलनी होगी।

 






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Ajay sinha :: - 02-16-2018
नक्सलवाद तो बहाना है जल जंगल जमीन हथियाना है सरकार की मंशा ही यही है । बहुत सही लिखा है तामेश्वर आपने । आपको क्रांतिकारी जोहार

rameshwar yadav :: - 02-16-2018
bahut hi achhi riport tameshwar bhai. keep it up

Bharatdwaj Gangwanshiga :: - 02-07-2018
ekdam correct news sinha ji... I respect your brave work.

eshwar kurre :: - 02-06-2018
bahut badhiya shinha sir....

eshwar kurre :: - 02-06-2018
bahut badhiya shinha sir...