आदिवासी किसान भीमा की मुठभेड़ में मौत की स्वतंत्र जांच की मांग, हाईकोर्ट में याचिका दायर

इंसाफ की मांग , बस्तर, बुधवार , 25-10-2017


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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर (छत्तीसगढ़)। सुकमा में आदिवासी किसान भीमा की पुलिस मुठभेड़ में मौत के मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। इसके साथ ही रमन सरकार से भी कार्रवाई और मुआवज़े की मांग की गई है।

 

 

  • पोडियम भीमा की मुठभेड़ में मौत के मामले में हाईकोर्ट में याचिका
  • मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच कराने की गुहार
  • पीड़ित परिवार को मुआवज़े और सुरक्षा की भी मांग 

आपको बता दें कि बस्तर संभाग के ज़िला सुकमा के पोलमपल्ली थाने के ग्राम पालामडगु में सुरक्षा बल व पुलिस के हाथों एक आदिवासी किसान पोडियम भीमा की जान चली गई। परिजनों और ग्रामीणों के मुताबिक भीमा को फर्जी मुठभेड़ में मारा गया है। 

पीड़ित परिवार के साथ पीयूसीएल ने बीलासपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस की।

पीयूसीएल ग्रामीणों के साथ

मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) परिवार वालों के साथ है। पीयूसीएल ने रमन सरकार से भी मामले का संज्ञान लेने की मांग की है। पीयूसीएल का कहना है कि रमन सरकार इस मामले पर ध्यान देते हुए पीड़ित परिवार को न्याय दिलवाए और मुआवजा भी दे। यदि सरकार ऐसा नही करती तो पीयूसीएल छत्तीसगढ़ आदिवासियों के साथ लगातार हो रहे ऐसे उत्पीड़न के विरोध में सभी कानूनी और ज़रूरी लोकतांत्रिक कार्यवाही करेगा।

आपको बता दे कि बस्तर में फर्जी मुठभेड़ों की दास्तां कोई नई नहीं है। बस्तर में सुरक्षा बलों के जवानों पर फर्जी मुठभेड़ में आम ग्रीमीणों की हत्या के लगातार आरोप लगते रहे हैं। इतना ही नहीं महिलाओं के यौन उत्पीड़न के आरोप भी सामने आते रहे हैं। इन मामलों में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग भी छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को नोटिस देकर जवाब-तलब करता रहा है। 

सच्चाई यही है कि यहां नक्सलवाद और सरकार के नक्सल उन्मूलन के बीच फंसे आदिवासी ग्रामीण लगातार मौत के घाट उतारे जा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यही वजह है कि लाखों की संख्या में आदिवासी ग्रामीण पलायन के लिए मजबूर हुए हैं और दूसरे राज्यों में जा कर बस गए है। यही कारण है कि यहां आदिवासियों की संख्या में लगातार कमी देखी जा रही है।

पूरा घटनाक्रम

पीयूसीएल की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मामले को गंभीरता से उठाया गया है। बताया गया कि पोडियम भीमा एक आम आदिवासी किसान था, जो अपने तीन बच्चों दो बेटों (10 साल और  7 साल) और 3 साल की लडकी के साथ रहता था। उसकी पत्नी एक बार फिर गर्भवती थी। 20 सितंबर के दिन खेत से लौट कर वह अपनी दीदी के घर में आराम कर रहा था, तभी रात को करीब 11-12 बजे पुलिस व सुरक्षा बल उनके घर आए और भीमा की आँखों को उसी की कमर पर बंधे तौलिये से बांधा और उसे चड्डी में ही ले गये। इस घटना के कई गांव वालों के गवाह हैं। 

पीयूसीएल के मुताबिक भीमा बार बार चीखता रहा कि वह एक खेती किसानी करने वाला आम आदमी है, उसने क्या किया है, लेकिन पुलिस वालों ने उसकी एक ना सुनी और उसे अपने साथ ले गए। घटना की रात के बाद अगले दिन सुबह मुंह अंधेरे जब गांववाले भीमा को ढूँढने के लिए निकल रहे थे तो उनको जंगल की तरफ से कुछ गोलियों की आवाज़ सुनाई पड़ी। आवाज़ की तरफ जंगल में भागने पर वे एक स्थल पर पहुंचे जहां पर बहुत सारा खून था। उन्होंने अनुमान लगाया की यह भीमा का खून है और उनको पुलिस व सुरक्षा बल वालों ने मार दिया है। 

इसके बाद गाँव वाले जब शव लेने पोलमपल्ली थाना गए तो उन्हें पुलिस वालों ने थाने के अन्दर जाने नहीं दिया और उनसे कहा कि उनको न ही किसी मुठभेड़ की और न ही किसी शव की जानकारी है। लेकिन कुछ महिलाओं ने पुलिस वालों को भीमा के शव को एक पुलिस जीप में डालते हुए और शव को सुकमा की ओर ले जाते हुए देखा।  गाँव वाले भी उस तरफ चल दिए और दोरनापाल थाने पहुंचे तो वहाँ पर भी पुलिस वाले उनके साथ बदतमीजी से पेश आये और उनको थाना के अन्दर आने नहीं दिया और शव के बारे में किसी भी तरह की जानकारी होने से इंकार कर दिया।

शव के गुप्तांग काटे?

गाँव वाले पूरे दिन दोनों थानों के चक्कर काटते रहे और अंत में रात को दोरनापाल थाने में उनको शव दिया गया। शव को गाँव ले जाकर गाँव वालों ने देखा की शव के गुप्तांग पूरी तरह से कटे हुए थे और शरीर पर कई प्रकार की और भी चोटे आई हुईं थी, जिससे ऐसा साफ़ प्रतीत हो रहा था कि भीमा को गोली मारने से पहले उसको काफी ज्यादा प्रताड़ित किया गया था। शव को गाँव ले जाने के कुछ ही मिनट पश्चात ही भीमा की पत्नी के एक और पुत्र का जन्म हुआ।

अपने नवजात बच्चे के साथ भीमा की पत्नी।

“अब भी पुलिस का उत्पीड़न जारी”

गाँव वालों ने जब पत्रकारों से इस घटना के बारे में बात करी तो गांव व परिवार के लोगों को पुलिस ने बहुत धमकाया और उन्हें चुप्पी साधने  को कहा। भीमा की बहन कन्नी व पत्नी कोय्न्दे को जान से मारने की धमकी तक पुलिस के द्वारा दी गयी। घटना के दिन से लेकर आज तक पुलिस द्वारा भीमा के परिवार, रिश्तेदार व गाँव वालो को लगातार पूछताछ के नाम पर तंग किया जा रहा है और कहीं आने-जाने पर भी रोक-टोक लगाई जा रही है। ग्रामीणों के मुताबिक इसी कारण कोर्ट में याचिका लगाने में भी विलम्ब हुआ। पिछले एक महीने से परिवार व  गाँव वाले पुलिस के आतंक में ज़िन्दगी गुज़र कर रहे हैं।

पहले भी हुईं कई घटनाएं

इससे पहले पिछले साल जनवरी, 2016 में दो नाबालिग लड़कियों की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। इस मामले में भी सुरक्षा बलों पर आरोप आया था। सितम्बर, 2016 में भी एक अन्य व्यक्ति पर भी तलाब से मछली निकालते समय सुरक्षा बलों द्वारा गोली चलाने का आरोप है। गोली उसके मस्तिष्क को छूकर चली गई और उसे काफी चोट आई थी। गाँव वालों ने घटना का खूब विरोध किया था और एक निष्पक्ष जांच की मांग रखी थी लेकिन आज तक उस पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है।










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