विभाजकारी राजनीति के खिलाफ एकताबद्ध आंदोलन की राह पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान

उत्तर प्रदेश , , बृहस्पतिवार , 19-07-2018


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पुरुषोत्तम शर्मा

मेरठ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान आंदोलन फिर से अपने पुराने स्वरूप में संगठित होने लगा है। अपनी चुनावी विसात के लिए संघ-भाजपा ने मुजफ्फरनगर दंगों के जरिये यहां किसानों की एकता को पूरी तरह विभाजित करने का षड्यंत्र रचा था। परंतु प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन की कर्मभूमि और आजाद भारत में किसान आंदोलन के इस पुराने गढ़ में सामाजिक-धार्मिक विभाजन के जो बीज बोए गए थे, उनके अंकुरित होने के बाद उसके खतरनाक नतीजों से रूबरू किसानों ने उसे नष्ट कर अपनी गौरवशाली परम्परा को फिर स्थापित करने का निर्णय ले लिया है। हालांकि किसानों का यह निर्णय 4 माह पूर्व ही हो गया था जिसका असर हमने कैराना के उपचुनाव में देख लिया था। यहां भाजपा के जिन्ना नारे पर किसानों का गन्ना नारा भारी पड़ गया था और भाजपा को मुंह की खानी पड़ी थी।

चुनाव के बाद किसानों की इस एकता की परख अभी आंदोलन के मोर्चे पर दिखनी बाकी थी। 17 जुलाई को यह एकता " किसान महापंचायत " के रूप में आंदोलन के मैदान में भी दिख गई। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, शामली और बड़ौत तीन जिलों की सीमा पर स्थित नगवां कुटी नामक स्थान पर मैं खुद भी इसका गवाह बना। आश्चर्य की बात यह है कि महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलन का किसान आधार और पुराने कार्यकर्ता इस किसान महापंचायत में जुटे थे पर टिकैत का राजनीतिक वारिस बनकर इस विभाजनकारी सत्ता से मोलभाव में लगे उनके पुत्रों का किसी ने नाम तक नहीं लिया।

किसान महापंचायत में बसों व ट्रैक्टरों से हजारों की संख्या में किसान पहुंचे। कार्यक्रम का आयोजन जाटों में प्रभाव रखने वाले किसान नेता नरेंद्र राणा, मुस्लिमों में प्रभाव रखने वाले किसान नेता गुलाम मोहम्मद जौला और राजपूतों में प्रभाव रखने वाले किसान नेता ठाकुर पूरण सिंह ने संयुक्त रूप से किया था।

भारतीय किसान यूनियन के बिखराव के बाद अपने-अपने स्तर पर सक्रिय किसान यूनियन के इन ग्रुपों के बीच किसानों की संगठित ताकत को फिर बटोरने पर सहमति बनी है। सभी कार्यकर्ता किसानों के मुद्दे पर संयुक्त रूप से लड़ने और किसानों की एकता को तोड़ने की विभाजनकारी राजनीति को परास्त करने का संकल्प लेते दिखे।

यह आज के भारत के किसान आंदोलन के लिए एक अच्छी सीख हो सकती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान आंदोलन फिर खड़ा हो और आज देश भर में चल रहे किसानों के एकताबद्ध आंदोलन के साथ कदम से कदम मिलाकर चले ये उम्मीद की जानी चाहिए।

  (पुरुषोत्तम शर्मा किसान आंदोलनों के आॅल इंडिया कोआॅर्डिनेशन कमेटी के सदस्य हैं।)

 








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