नये राजनीतिक करवट के लिए तैयार है बिहार!

बिहार , , शुक्रवार , 20-10-2017


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अखिलेश अखिल

एनडीए में शामिल हो जाने के बाद बिहार में भले ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार चलती दिख रही हो लेकिन बिहार की राजनीति भीतर-भीतर सुलग रही है। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव अपना अपमान अभी भूले नहीं हैं और अगर कोई मौका मिला तो वो नीतीश की राजनीति को तबाह करने से भी नहीं चूकेंगे। ये बात अलग है कि नीतीश की राजनीति भी अपने तरह की रही है। उनके बारे में माना जाता है कि किसी भी फैसले पर पहुंचने से पहले वो उसके दूरगामी नतीजों का गुणा-गणित निकाल लेते हैं। और उसके बाद ही कोई कदम उठाते हैं। बीजेपी के साथ उनकी वापसी के बाद जितनी घटनाएं घटी हैं और बिहार से लेकर नीतीश की राजनीति पर सवाल उठे हैं, ऐसा नहीं है कि नीतीश को इसका पूर्वानुमान नहीं था। इसका अंदेशा उनको पहले से ही था। नीतीश कुमार को यह भी पता है कि अगर वे चक्रव्यूह में फसे हैं तो उससे निकलने का क्या रास्ता होगा। चूंकि राजनीति में कोई किसी का स्थाई दोस्त-दुश्मन नहीं होता, परिस्थितियों के मुताबिक ही राजनीतिक मिलन और बिखराव होते हैं इसलिए नीतीश भविष्य के इस खतरे से वाकिफ न हों ऐसा हो ही नहीं सकता है। 

कमजोर जातीय वोट बैंक के बावजूद सत्ता में बने रहने का खेल नीतीश कुमार से ज्यादा भला कौन जान सकता है? ऊपर से देखने में भले ही यह लगता हो कि नीतीश ने महा गठबंधन का साथ छोड़ा और बीजेपी के साथ चले गए लेकिन वो यह भी जानते हैं कि बीजेपी की चाल-ढाल क्या है और उसकी राजनीति कहां तक उन्हें भाएगी। 

बिहार को आगे बढ़ाने के नाम पर नीतीश का अगला दांव चाहे जो भी हो लेकिन लालू प्रसाद की राजनीति की दिशा बिल्कुल तय है। बीजेपी-नीतीश की सत्ता को अपदस्थ करना उसका पहला लक्ष्य है। राजद के भीतर फिर इस बात को लेकर मंथन जारी है कि नीतीश और बीजेपी की सरकार को कैसे कमजोर किया जाए।  इसके लिए राजद फिर से एक विशाल महारैली करने की तैयारी में है। उम्मीद की जा रही है कि यह रैली अगले नए साल में होगी जिसमें लालू के मंच पर कई नए साथी पहुंचेंगे।  जिस तरह से पिछले दिनों लालू प्रसाद और उपेंद्र कुशवाहा की गुपचुप मुलाक़ात हुयी है और जीतन राम माझी की पार्टी के साथ गए पुराने जदयू नेता अपने को कमजोर महसूस कर रहे हैं। उससे साफ़ लगता है कि जनता परिवार से जुड़े कई पुराने नेता एक बार फिर एक मंच पर आ सकते हैं।  

वैसे भी उपेंद्र कुशवाहा का अपना जातीय वोट है और बिहार की राजनीति में एक बेदाग़ छवि वाले नेता के रूप में उनकी गिनती की जाती है, ऐसे में राजद अगर नीतीश वाले फॉर्मूले का कुशवाहा के साथ प्रयोग करे तो बिहार की राजनीति बदल सकती है। इधर, जदयू के बागी नेता शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता को लेकर अंतिम निर्णय 30 अक्तूबर को होना है। यह बात और है कि शरद यादव ने अपने को असली जदयू का नेता माना है और नीतीश के जदयू को सरकारी जदयू बताया है। उससे भी इस बात को बल मिलता है कि 30 अक्तूबर के बाद बिहार की राजनीति एक बार फिर नया करवट लेगी। 

आपको बता दें कि   जदयू के असंतुष्ट नेता शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता को समाप्त करने के बारे में उनकी पार्टी द्वारा दी गयी याचिका पर उनका पक्ष जानने के लिए राज्यसभा सभापति एम वेंकैया नायडू ने उन्हें 30 अक्तूबर को बुलाया है।  राज्यसभा में जदयू के नेता रामचंद्र प्रसाद सिंह ने एक याचिका में शरद एवं पार्टी के एक अन्य राज्यसभा सदस्य अली अनवर अंसारी पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाते हुए उन्हें राज्यसभा की सदस्यता के अयोग्य ठहराने का अनुरोध किया था। 

 

  • 30 अक्तूबर को है शरद यादव की राज्यसभा की सदस्यता पर सुनवाई
  • विपक्ष के दूसरे नेताओं के साथ मिलकर शरद कर सकते हैं नया प्रयोग

 

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार शरद को 18 अक्तूबर को एक पत्र जारी कर उनसे कहा गया है कि इस याचिका के संदर्भ में उनका पक्ष जानने के लिए उन्हें एक अवसर दिया जा रहा है।  उनसे कहा गया है कि वह 30 अक्तूबर को सुबह साढ़े नौ बजे सभापति नायडू के कक्ष में उनके समक्ष अपना पक्ष पेश करें।  जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने राजद एवं कांग्रेस के साथ महागठबंधन को तोड़कर भाजपा से हाथ मिला लिया था।  शरद एवं उन्हीं की पार्टी के राज्यसभा सदस्य अली अनवर अंसारी ने पार्टी के इस फैसले से असहमति जतायी थी। शरद को पहले उच्च सदन में पार्टी नेता के पद से हटाया गया था।  उन्होंने लालू प्रसाद नीत राजद की पटना रैली में भाग लिया, जिसके बाद जदयू ने उन्हें अयोग्य घोषित करने की याचिका दी।  उसके बाद वास्तविक जदयू होने का दावा करते हुए उनके गुट ने चुनाव आयोग से संपर्क कर पार्टी का चुनाव चिह्न मांगा।  

ऐसे में कहा जा सकता है कि कांग्रेस, राजद, रालोसपा और माझी की पार्टी ‘हम’ के साथ शरद यादव की एकता बिहार में एक नये राजनीतिक प्रयोग की संभावना पैदा कर रही है। इस प्रयोग में उपेंद्र कुशवाहा और शरद यादव की क्या भूमिका होगी, इस पर ही सबकी नजरें टिकी हैं। बता दें की नीतीश कुमार के एनडीए में शामिल होने के बाद कुशवाहा असहज हैं। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)










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