...और बदल जाएंगे बिहार के राजनीतिक समीकरण!

विश्लेषण , , बुधवार , 29-11-2017


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अखिलेश अखिल

यह तय है कि आगामी लोकसभा चुनाव में बिहार की राजनीति बदल जायेगी। 

सीटों को लेकर जो हालात दिख रहे हैं उससे तो साफ़ लगता है कि न चाहते हुए भी बिहार एनडीए से कई दल अलग हो जाएंगे। उनके लिए वहाँ कोई स्पेस बचेगा नहीं और वे या तो अकेले चुनाव लड़ेंगे या फिर किसी के साथ नया गठबंधन करेंगे। 

लगभग सभी दलों के बीच आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर समीकरण तय होने लगे हैं और उम्मीदवारों की पैमाइश भी।  

बिहार के राजनेता। फोटो साभार

 

  • बदलते समीकरण
  • बिहार में लोकसभा चुनाव को लेकर बनने लगे हैं नये समीकरण
  • जदयू के बीजेपी के साथ आ जाने से बदल गई है राजनीतिक तस्वीर
  • एनडीए में सबसे मुश्किल काम होगा सीटों का बंटवारा
  • पासवान और कुशवाहा के सामने अपनी हैसियत बचाए रखने की चुनौती

बिहार में जदयू और बीजेपी के एक साथ आ जाने के बाद एनडीए में शामिल  किसी दूसरे दल के लिए लोकसभा की सीटें बचती नहीं दिखती।

बिहार  में  लोकसभा की कुल 40 सीटें हैं। 2014  के चुनाव में  बीजेपी को 22 सीटों पर जीत हासिल हुयी थी जबकि जदयू को  मात्र 2  सीटें मिली थीं।  यह बात और है कि इस चुनाव में जदयू सभी 38 सीटों पर चुनाव लड़ी थी जिनमें से 24 सीटों पर उसकी ज़मानत ज़ब्त हो गयी थी। 

बीजेपी कुल 30 सीटों पर चुनाव लड़ी और 22 सीटें जीती थीं। 

सीटों का बंटवारा सबसे मुश्किल

जाहिर है कि अगले लोकसभा चुनाव में बीजेपी न तो अपनी जीती सीटें छोड़ने वाली है और न ही  हारी हुयी सीटें जदयू को देने वाली है। 

बीजेपी के एक नेता कहते हैं कि क्योंकि विधानसभा में नीतीश जी की सीटें ज्यादा हैं इसलिए विधानसभा चुनाव में बीजेपी कुछ नीचे तो जा सकती है लेकिन लोकसभा चुनाव में बीजेपी 30 सीटों पर तो चुनाव लड़ेगी ही। 

साफ़ है कि  जदयू के खाते में अधिकतम 10 सीटें जा सकती हैं। इन 10 सीटों को लेकर जदयू की अगली राजनीति क्या होगी यह देखने वाली बात होगी। 

कहां जाएंगे पासवान, कुशवाहा? 

उधर, बिहार एनडीए के साथ रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा भी है। दोनों पार्टी केंद्र सरकार में भी शामिल हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में रालोसपा को भी 3 सीटें मिली थी और पासवान की पार्टी को भी 6 सीटें मिलीं। ज़ाहिर है कि नीतीश के एनडीए में आने के बाद लोजपा और रालोसपा के लिए सीटें नहीं के बराबर हो जाएंगी। अगर बीजेपी को रालोसपा और लोजपा को भी कम से कम उनकी जीती सीटें देनी पड़  गयीं तो जदयू के खाते में भी उनकी जीती दो सीटें ही जायेंगी। ऐसी हालत किसी भी पार्टी के लिए असहनीय हो सकती है। जदयू को कम से कम 10 सीटें मिलती हैं तो साफ़ है कि रालोसपा और लोजपा के लिए कोई भी सीट खाली नहीं होगी। चूंकि बिहार सरकार में जदयू और बीजेपी का गठबंधन है इसलिए न चाहते हुए भी लोजपा और रालोसपा को एनडीए से अलग होना पड़ सकता है।

लोकसभा चुनाव पर निर्भर हैं विधानसभा चुनाव के समीकरण 

उधर बिहार विधानसभा में  जदयू के 71 विधायक हैं और भाजपा के 53 होने के कारण अगले विधानसभा चुनाव में संभव है कि जदयू कुछ ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़े  लेकिन यह भी तब संभव होगा कि अगले लोकसभा चुनाव में किसके सांसद ज्यादा चुनकर आते हैं। 

बीजेपी के नेता कहते हैं कि बीजेपी की राजनीति तय हो चुकी है कि जदयू और बीजेपी सौ-सौ सीटों पर चुनाव लड़ेगी और बाकी सीटें सहयोगी दलों को दी जायेंगी। 

आपको बता दें कि अभी बिहार एनडीए में लोजपा, रालोसपा और माझी की पार्टी शामिल है। यानी बाकी 45 सीटों  को तीनों पार्टियों के बीच बांटा जा सकता है। लेकिन यह समीकरण तो तब सामने आएगा जब विधानसभा के चुनाव सामने होंगे। चूंकि विधानसभा चुनाव भी 2020  में ही होने हैं इसलिए बिहार एनडीए के बीच लोकसभा चुनाव को लेकर सीट बंटवारे में परेशानी आ सकती है। 

बीजेपी को जदयू के बाद किसकी ज़रूरत?

माना जा रहा है कि  एनडीए में जदयू के आ जाने के बाद बीजेपी को भी बिहार में कोई दूसरे सहयोगी की ज़रूरत नहीं रह गयी है। बीजेपी मानती है कि अन्य सहयोगी दलों की अपेक्षा जदयू का देश में अपना वजूद है और नीतीश कुमार की अपनी पहचान भी।  ऐसे में साफ़ लगता है कि देर सवेर लोजपा और रालोसपा को अपनी राजनीतिक पहचान बनाये रखने के लिए कोई सार्थक कदम उठाने होंगे ताकि उनके कार्यकर्ताओं की हैसियत बरकरार रहे। 

बन सकते हैं नए गठबंधन!

लगता है कि आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र बिहार में फिर से एक नए गठबंधन का आगाज़  होगा।  एक गठबंधन कांग्रेस, राजद और शरद यादव गुट का होगा तो दूसरा गठबंधन लोजपा, रालोसपा और पप्पू यादव की पार्टी का। या फिर यह भी संभव है कि सभी दल अलग-अलग चुनाव लड़ें या फिर इनमें से कुछ दल राजद, कांग्रेस के साथ हो लें। वैसे अभी गुजरात चुनाव के परिणाम इस तरह की राजनीति को ज्यादा प्रभावित करेंगे। 

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)






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Arun Pradhan :: - 11-29-2017
लगभग सही विश्लेषण है बिहार के भविष्य की राजनीतिक स्थिति का।