रोहित के बाद अनिता: क्यों टूटा एक और चमकता सितारा?

तमिलनाडु , त्रासदी, सोमवार , 04-09-2017


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कुमुदिनी पति

तमिलनाडु एक बार फिर जल रहा है- जल्लिकट्टू आन्दोलन के बाद अब पुनः सभी दलों के नेताओं से लेकर फिल्मी दुनिया के लोगों को जन-भावनाओं के समक्ष सिर झुकाना पड़ रहा है।

2 दिन पहले 17 वर्ष की छात्रा अनिता, जो तमिलनाडु के अरियालुर की रहने वाली थी, ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इसलिए नहीं कि वह पढ़ने में अच्छी नहीं थी और फेल हो गई, बल्कि इसलिए कि वह मेहनती और मेधावी थी, पर मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में सीट हासिल कर सकी और उसका डॉक्टर बनने का सपना चूर-चूर हो गया।

अनिता (फाइल फोटो) साभार : गूगल

एक गरीब पिता की होनहार बेटी

अनिता एक गरीब पिता की बेटी थी, जो पीठ पर बोरा ढोने वाले एक दैनिक मज़दूर थे और अनिता का सपना पूरा करना चाहते थे। बचपन में ही अनिता ने अपनी मां को खो दिया था। अनिता के रिश्तेदार उसकी लगन और स्कूल में उसके अव्वल अंक देखकर उसे डॉक्टर की उपाधि पहले ही दे चुके थे। वह हमेशा कक्षा में अव्वल दर्जा हासिल करती और बारहवीं कक्षा में उसने 1200 में से 1176 अंक प्राप्त किये थे। इंजीनियरिंग में उसे 200 में 199 अंक मिले थे और राज्य की मेडिकल परीक्षा में 200 में से 196.5

पर अनिता को मालूम नहीं था कि नीट परीक्षा के प्रश्नों को राज्य के पाठ्यक्रम के अनुसार नहीं तैयार किया गया था। वह नीट की परीक्षा में 85 अंक प्राप्त कर पाई, जिसके कारण उसे मेडिकल कॉलेज में सीट नहीं मिल सकी।

साभार : गूगल

केंद्र वायदे से पीछे हटा

इसके पीछे भी एक कहानी है। पहले जब तमिलनाडु में नीट का विरोध हुआ तो केंद्र सरकार ने स्वयं घोषणा कर दी कि एक साल के लिए इस राज्य को छूट दी जाएगी कि वह ऑर्डिनेंस पारित कर अपनी पुरानी व्यवस्था को जारी रखे। ऐसा किया भी गया, पर 22 अगस्त को एक बार फिर केंद्र अपने वायदे से पीछे हट गया और नीट के आधार पर प्रवेश होने लगे। यह एक धोखा है जिसके लिए राज्य के मुख्यमंत्री . पलानीस्वामी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार माना जाएगा।

साभार : गूगल

पूरा तमिलनाडु सड़कों पर

इसीलिए आज पूरे तमिलनाडु में जगह-जगह इन दोनों के पुतले जलाए जा रहे हैं, अस्पतालों के सामने धरने हो रहे हैं, सड़क पर हज़ारो-हज़ार छात्र-नौजवान, दलित संगठन और आम लाग उतर आए हैं, यहां तक कि वकील आंखों पर काली पट्टी बांधकर विरोध मार्च कर रहे हैं। जनता का उग्र तेवर देखकर लग रहा है कि वे नीट को रद्द कराए बिना मानेंगे नहीं। अनिता ने सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिका दायर की थी पर अब दसियों हज़ार छात्रों की ज़िंदगी अधर में लटकी हुई है क्योंकि केंद्र ने न्यायालय में साफ कह दिया कि 2017 से नीट को ही आधार बनाया जाएगा।

रोहित वेमुला। फाइल फोटो। साभार

रोहित भी हुआ था व्यवस्था का शिकार
आपको याद होगा कि इससे पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय में एक होनहार दलित छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी क्योंकि इस अभिजात्य-परस्त व्यवस्था में उसके सपने टूटकर बिखर गए थे। इस बार एक दलित छात्रा अनिता के साथ ऐसा ही हुआ। क्या यह व्यावसायिक शिक्षा व्यवस्था छात्र-छात्राओं को बाध्य कर रही है कि वे महंगी कोचिंग करें, राजस्थान में कोटा जाकर मल्टिप्ल चॉयस क्वेस्चिन के हल रटें और फिर एक केंद्रीकृत परीक्षा व्यवस्था में उच्च स्थान लाएं, तभी उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर या कुछ भी बनने का अवसर मिलेगा? तमिलनाडु में वैसे भी सबसे अधिक आत्महत्याएं होती हैं; इसका कारण है शिक्षा व्यवस्था का निजीकरण और व्यावसायिक करण। इधर जाति की राजनीति भी जमकर चलाई जा रही है और अचानक पिछले माह मेडिकल के प्रवेश में पिछड़ी जाति के मलाईदार हिस्से को भी ओबीसी कोटा में शामिल किया जा रहा है। इससे अति पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के लिए कम सीटें बचेंगी। फिर कैबिनेट का एक और फैसला है क्रीमी लेयर की आय सीमा को 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये कर दिया जाए। इससे भी उनपर  नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

राज्य की चिकित्सा व्यवस्था बेहतर

अनिता की मौत ने राज्य को हिला कर रख दिया है। कई सरकारी अस्पतालों के जाने-माने चिकित्सक हस्ताक्षर अभियान चलाने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि आज तक जितने चिकित्सक राज्य के कोने-कोने में कार्यरत हैं वे तमिलनाडु राज्य की परीक्षा से ही उत्तीर्ण होकर आए। इसमें एक बड़ी संख्या महिला चिकित्सकों की भी है। बहुत से डॉक्टर साधारण परिवारों से आए हैं, पर राज्य की चिकित्सा व्यवस्था देश में सबसे अच्छी है। यहां मातृत्व और शिशु मृत्यु दर नीचे से दूसरे नंबर पर है। क्या केंद्र सरकार यह दावा करना चाहती है कि महंगी कोचिंग करके ही छात्र आगे बढ़ सकते हैं? यह भी सवाल उठेगा कि संघवाद के सिद्वान्त को पूरी तरह ताक पर रख दिया जाएगा? कई चिकित्सकों का मानना है कि शिक्षा को समवर्ती सूची में नहीं बल्कि राज्य सूची में रखा जाना चाहिये और यदि पाठ्यक्रम में परिवर्तन करना भी है तो उसे क्षेत्रीय विशिष्टताओं, संस्कृति और भाषा को ध्यान में रखते हुए ही क्रमशः करना होगा। वरना कई और दुर्घटनाओं को होने से रोका नहीं जा सकता। 

(कुमुदिनी पति सामाजिक और राजनीतिक तौर पर सक्रिय रही हैं। आजकल इलाहाबाद में रहती हैं और तमाम ज्वलंत मुद्दों पर बेबाक लेखन कर रही हैं।) 










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