घर उजड़ने के बाद भी मुआवजा न मिलने से पेड़ के नीचे दिन गुजारने के लिए मजबूर है एक परिवार

छत्तीसगढ़ , , शनिवार , 12-05-2018


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तामेश्वर सिन्हा

कोरबा (छत्तीसगढ़)। सत्तरह दिन से यह परिवार दिन-और रात पेड़ के नीचे गुजार रहा है, घर का सामान उनकी आंखों के सामने बिखरा पड़ा है, परिवार में एक बच्ची को भीषण गर्मी में लू लग चुका है। अपने घर को देखते-देखते इनकी आंखें भी अब पथराने लगी हैं। ये दृश्य कहीं और का नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले का है। उस प्रदेश का जहां अभी मुख्यमंत्री रमन सिंह विकास यात्रा निकालने वाले हैं।

जानकारी के अनुसार ग्राम भठोरा निवासी खातेदार सुखराम पिता हीराराम  के मकान व जमीन का अधिग्रहण एसईसीएल गेवरा परियोजना द्वारा किया गया है। मकान को गेवरा परियोजना द्वारा दिनांक 25 अप्रैल को तोड़वाया गया लेकिन आज की तारीख तक मकान का मुआवजा नहीं दिया गया है जिसके कारण पेड़ के नीचे पिछले 17 दिनों से अपनी 3  छोटे नतनी व पत्नी सहित कड़ी धूप मे निवासरत हैं। 

पहले आशियाना उजाड़ो फिर मिलेगा मुआवजा   

एक जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में एसईसीएल प्रबंधन की 4 कोयला परियोजना है। गेवरा, दीपका, कुसमुंडा कोरबा परियोजना। इन चारों परियोजनाओं में विगत 2001 से 2010 के बीच 17 गांव के लगभग 20,000 परिवारों के जमीन व मकान का अधिग्रहण किया गया है।

ग्राम भठोरा तहसील कटघोरा जिला कोरबा छग के कुल 501 खातेदारों की निजी जमीन 319 एकड़ का अधिग्रहण सन् 2001 मे किया गया और अंतिम अवार्ड 2015 और जमीन के मुआवजे का भुगतान शुरू किया गया। फिर 2016 में मकान का सर्वे कर 2017 से मकान के मुआवजे का भुगतान किया जा रहा है। लेकिन कोल इंडिया पालिसी में प्रावधान है कि प्रभावित परिवार पहले अपने मकान को तोड़ेगी फिर उसके बाद मकान के मुआवजा का भुगतान किया जएगा। इस प्रावधान के कारण हजारों परिवार घर से बेघर होने पर मजबूर हैं।

आप को बता दें कि कोल इंडिया पॉलिसी के कारण मकान तोड़ने के बाद मुआवजा का भुगतान किया जाता है जिसका खामियाजा प्रभावित किसानों को भुगतना पड़ रहा है। पेड़ के नीचे पूरा परिवार कड़ी धूप मे बैठे हैं उसमें से एक बच्ची गंभीर अवस्था में बुखार से तड़प रही है, विगत कई दिनों से भूखे हैं, पीड़ित परिवार जिद पर अड़ा है। उनका कहना है कि जब तक मकान का मुआवजा व पुनर्वास की सुविधा नहीं दी जाएगी तब तक, किसी से कोई मदद नहीं लेंगे।

सुखराम ने बताया कि एसईसीएल गेवरा परियोजना के तहत अधिग्रहीत किए गए जमीन में उसका मकान है। सुखराम कहते हैं डेढ़ साल पहले विस्थापन के लिए फॉर्म भरा था। लेकिन गेवरा क्षेत्र के अफसरों ने यह कहकर पैसे रोक दिए थे कि मकान तोड़ने पर ही राशि दिए जाने का प्रावधान है। मकान तोड़े जाने के समय वो दफ्तरों का चक्कर काट रहे थे। उसके बाद न मुआवजा मिला और न ही कोई दूसरी मदद। इसलिए पेड़ के नीचे ही आशियाना बना लिया।

उर्जाधानी भुविस्थापित संगठन के अध्यक्ष सुरेन्द्र राठौर ने बताया कि कोल इंडिया पालिसी मे एक बहुत बड़ी खामी है जिसके अनुसार मकान के मुआवजे का भुगतान मकान तोड़ने के बाद किया जाता है, जिससे खामियाजा प्रभावित परिवार को भुगतना पड़ता है।

इस पॉलिसी मे संशोधन के लिए लगातार हमारी समिति द्वारा मांग किया जा रहा है कि पहले मकान के मुआवजे का भुगतान किया जाए उसके बाद 06 माह का समय अन्य जगह मकान बनाने के लिए दिया जाए और पुनर्वास की व्यवस्था पहले किया जाए । लेकिन प्रबंधन मांग को पूरा ही नहीं कर रहा है। और कोल इंडिया पालिसी में संशोधन नहीं कर रही है। अगर इस परिवार के साथ किसी भी प्रकार का कोई अप्रिय घटना घटती है तो इसकी जिम्मेदार केवल एसईसीएल गेवरा प्रबंधन होगा।

(तामेश्वर सिन्हा पेशे से पत्रकार हैं और अपनी जमीनी रिपोर्ट के लिए जाने जाते हैं।)










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