बस्तर में नियम-कानून ताक पर रखकर छीनी जा रही है जमीन, आदिवासी किसानों ने मोर्चा खोला

एक नज़र इधर भी , छत्तीसगढ़, बुधवार , 28-02-2018


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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। छत्तीसगढ़ में किसानों को लगातार उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है। कभी नक्सलवाद का नाम थोपकर, कभी विकास के नाम पर सरकार उनकी जमीन छीनने का काम कर रही है। अनुसूचित क्षेत्रों में संवैधानिक अधिकारों का हनन कर, पेसा कानून, वन अधिकार कानून के विपरीत सरकार आदिवासी/किसानों की जमीन को जबरिया कॉरपोरेट मुनाफे के लिए ग्रामवासियों से छीन रही है।


ताजा मामला उत्तर बस्तर कांकेर के अंतागढ़ ब्लाक अंतर्गत ग्राम कलगांव का है। यहां भिलाई इस्पात सयंत्र के नाम पर ग्रामवासियों की जमीन छीनी जा रही है। आदिवासी किसान परिवारों ने इसके विरोध में मुख्यमंत्री निवास जाकर ज्ञापन सौंप कर कार्रवाई की मांग की थी और आंदोलन की भी चेतावनी दी थी। अब ग्रामवासियों ने मंगलवार को ब्लाक मुख्यालय अंतागढ़ में जुलूस की शक्ल में तहसीलदार के पास जाकर राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में सरकार द्वारा गैरकानूनी ढंग से भिलाई इस्पात सयंत्र को किसानों की जमीन देने की बात कही गई है और चालू निर्माण कार्य को रोकने की मांग की गई है। 


पुलिस के पहरे में निकाली गई रैली 

आपको बता दे कि कलगांव के किसान जब मंगलवार को ज्ञापन सौंपने तहसीलदार के पास जा रहे थे, तो जितनी संख्या किसानों की नहीं थी उससे ज्यादा उनके ऊपर पुलिस का पहरा था। आदिवासी किसान भय और दबाव में तहसीलदार को ज्ञापन सौंप रहे थे। एक-एक किसान की तस्वीर ली जा रही थी। 

यहां यह उल्लेखनीय है कि जब भी बस्तर में आदिवासी, किसान अपने संवैधानिक हकों को लेकर आवाज़ उठाना चाहते हैं तो उन्हें नक्सलवाद का जामा पहना दिया जाता है। इसबार भी कुछ ऐसा ही हुआ, ग्रामीणों ने बताया कि गांव वापस लौटने पर सुरक्षा बलों द्वारा सवाल किया जा रहा था कि यह नक्सलियों की रैली तो नहीं है?

 

क्या है पूरा मामला?

ज्ञात हो कि कलगांव  में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा बीएसपी (भिलाई इस्पात सयंत्र) की किसी परियोजना हेतु 17.750 हेक्टेयर जमीन अदला-बदली के नाम पर ले ली गई है। इसका ग्रामीण शुरू से ही विरोध कर रहे हैं। इस जमीन पर गांव वाले कई वर्षों से खेती करते आ रहे हैं और सामूहिक निस्तार की भी जंगल जमीन है। 


संविधान की पांचवी अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी परियोजना हेतु जमीन लेने के पूर्व ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है। इसके साथ ही वन अधिकार मान्यता कनून 2006 की धारा 4 उपधारा 5 एवं केंद्रीय वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय  के 30 जुलाई 2009 के आदेश अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसकी काबिज वन भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता जब तक उसके वन अधिकार की मान्यता की प्रक्रिया समाप्त नहीं होगी। उक्त दोनों कानूनों का उल्लंघन कर कलगांव में अदला-बदली के नाम पर जमीन छीनी गई है।

 

उल्लेखित जमीन पर निर्माण कार्य पर शीघ्र रोक लगाने एवं आदिवासियों की जमीन वापसी की मांग को लेकर प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई जा चुकी है। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। अब आलम यह है कि आदिवासी किसानों के आंदोलन को सरकार नक्सल का नाम देने पर तुली हुई है। हालांकि ग्रामीण किसी भी हालत में बीएसपी को जमीन देना नहीं चाह रहे हैं और आगे आंदोलन की बात कह रहे हैं। 


आपको बता दें कि कलगांव का अपने आप में पहला मामला है जो किसी परियोजना के लिए कम्पनी द्वारा शहरी क्षेत्र (सामान्य क्षेत्र) में जमीन उपलब्ध करवाई गई और इसके बदले राज्य सरकार द्वारा अनुसूचित क्षेत्र में जमीन छीन ली गई है। यदि इस प्रक्रिया को कानूनी मान्यता दी जाए तो संविधान की पांचवी अनुसूची से प्रदत्त संरक्षण, पेसा और वन अधिकार कानून एवं भू अर्जन कानून का कोई औचित्य नहीं रहेगा। यह अपने आप में एक उदाहरण है कि आदिवासियों से जमीन छीनने के लिए किस तरह नए नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।


कलगांव के किसान हृदयराम का कहना है कि यह भूमि बीएसपी को “अदला-बदली” में दी गई है। बीएसपी ने राज्य शासन को दुर्ग जिले में भूमि दी है, जिसके बदले में उन्हें यह भूमि दी जा रही है। यह संलग्नक क्र. 2 के आम उद्घोषणा पत्र में अंकित है। आम किन्तु सामान्य भूमि के बदले में संविधान की पांचवी अनुसूची के अन्तर्गत क्षेत्र की भूमि को देना असंवैधानिक है और अनुच्छेद 244 के सिद्धान्तों के विपरीत है। 

इस प्रकार की “अदला-बदली” के लिये कानून में कोई प्रावधान नहीं है। शासन ने इस प्रक्रिया के लिये राजस्व परिपत्र पुस्तक खंड 4- क्र. 3 – कंडिका 20 का उपयोग किया है परन्तु इस कंडिका में केवल कृषि प्रयोजन के लिये शासकीय भूमि को निजी भूमि से अदला बदली में देने का प्रावधान है – और वह भी आस-पास के गाँव में जो कि एक ही जिले में या एक ही संभाग में हो, और जिससे कृषकों की भूमि की चकबन्दी में सहायता मिले। दो विभिन्न संभागों में इस प्रकार की भूमि का औद्योगिक या अन्य प्रयोजन के लिये अदला-बदली का कानून में कोई प्रावधान नहीं है। इस अदला-बदली से ग्रामवासियों को कोई सुविधा या लाभ उप्लब्ध नहीं है और यह हर रूप में असंवैधानिक है। अगर बीएसपी को इस क्षेत्र में अपने प्रयोजन के लिये भूमि की आवश्यकता है तो उसे विधिवत् सरकार को प्रस्ताव देकर, सम्पूर्ण भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए, और इस भूमि का क्या उपयोग होगा इसकी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि जनता अपने हितों की रक्षा कर सके।


(तामेश्वर सिन्हा छत्तीसगढ़ के तेज-तर्रार युवा पत्रकार हैं और तमाम जोखिम उठाकर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं।)










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Rahul markam :: - 02-28-2018
मुख्यधारा की मीडिया से यह पूरा मामला गायब है । भला है इस वेबसाइट का जिसने आदिवासी किसानों की संघर्ष को सामने लाया ।

Arjun kurre :: - 02-28-2018
gajab h bhai

eshwar kurre :: - 02-28-2018
bahut hi badhiya bhai