छत्तीसगढ़: वनभूमि से बेदखली के फैसले का बस्तर से लेकर सरगुजा तक विरोध

छत्तीसगढ़ , , शनिवार , 23-02-2019


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तामेश्वर सिन्हा

 

रायपुर। वनभूमि से बेदखली के फैसले से आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ में बस्तर से लेकर सरगुजा तक विरोध हो रहा है। फैसले के विरोध में छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला का कहना है कि वन अधिकार अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायलय का फैसला- विश्व का सबसे बड़ा जंगल आधारित भू-सुधार(लैंड रिफार्म) पर विस्थापन का बड़ा खतरा है। केंद्र और राज्य सरकारें तुरंत हस्तक्षेप कर इस पर अध्यादेश लाएं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में सन 2015 के आंकड़े के हिसाब से पूरे देश में 10 लाख से ज़्यादा मूलनिवासी परिवारों को अपनी जमीन और जंगल से बेदखली की बात कही गयी हैं। लेकिन दिसम्बर, 2018 तक के आंकड़े के अनुसार कुल 23 लाख 30 हजार परिवार अर्थात करीब 1 करोड़ जनता का बेदखली अनिवार्य हो सकता है। ऐसा पहली बार होगा जब भारत में इतनी बड़ी संख्या में आदिवासियों और अन्य समुदाय का विस्थापन होगा।

यह सब सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार और अन्य राज्य सरकारों द्वारा सही पैरवी न करने के कारण हुआ है। केंद्र सरकार के वकीलों ने कोर्ट में उपस्थित होने के बावजूद चुप्पी साध लिए। छत्तीसगढ़ की पिछली  सरकार कानून के प्रावधानों को ही नज़रंदाज़ (पंचायत सचिव, वन अधिकार समिति का सचिव) कर दिए। पूरे देश में कहीं भी वन अधिकार कानून का सम्पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो पाया है, न समाप्ति हुआ है।

गौर करने की बात यह है कि वन अधिकार की समाप्ति की घोषणा कानूनी तौर पर ग्राम सभा ही कर सकती है। अब तो छत्तीसगढ़ में कानून के सही क्रियान्वयन की उम्मीद जगी है। इस समय सर्वोच्च न्यायलय को गुमराह कर कॉर्पोरेट परस्त सरकार जिस जन विरोधी नीति को अपनाने जा रही है उस  इरादे को  छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन  तीव्र भर्त्सना करते हुए जनवादी तरीके से विरोध जारी रखेगी। राजनैतिक दलों तथा अन्य जन जन आन्दोलनों  से अपील करते हैं कि वे भी अपनी भूमिका सुनिश्चित करें और जंगले को ख़तम करने की इस षडयंत्र में न फंसे।  

छत्तीसगढ़ के तमाम आदिवासी संगठनों ने इस याचिका के खिलाफ केंद्र की भाजपा व छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार द्वारा आदिवासियों के पक्ष में उचित पैरवी न करने की भी तीखी निंदा की है तथा कहा है कि ये सरकारें कॉर्पोरेट लॉबी के दबाव में वनाधिकार मान्यता कानून को ही ख़त्म करने पर तुली हुई हैं।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी राज्य सचिवमंडल ने कहा है कि वनों से बेदखली के खिलाफ माकपा अभियान-आंदोलन छेड़ेगी। पर्यावरण व वन्य संरक्षण के नाम पर गलत तथ्यों के आधार पर दाखिल एक याचिका के पक्ष में देश के वन-क्षेत्र में रह रहे 50 लाख से अधिक आदिवासी व गैर-आदिवासी गरीबों को बेदखल करने के आदेश की आलोचना की है तथा इस निर्णय को वनाधिकार क़ानून के प्रावधानों के विरूद्ध बताया है। 

आज यहां जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिवमंडल ने कहा है कि वनाधिकार मान्यता कानून में निरस्त दावाकर्ताओं को उजाड़ने का कोई प्रावधान नहीं है और धारा 4(5) तब तक बेदखली की प्रक्रिया को रोकने का प्रावधान करता है, जब तक कि किसी क्षेत्र-विशेष में इस कानून के पालन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। यह निर्णय आदिवासियों के साथ एक दूसरा ऐतिहासिक अन्याय करने जा रहा है।

माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने कहा है कि छत्तीसगढ़ की नवगठित कांग्रेस सरकार ने आश्वस्त किया था कि वह सुप्रीम कोर्ट में आदिवासियों के पक्ष में जमीनी हकीकत रखेगी। वास्तविकता यह है कि पिछले एक दशक में भाजपा सरकार में इस कानून के क्रियान्वयन के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं थी, दावाकर्ताओं को कोई पावती नहीं दी गई तथा व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार के दावों को गैर-कानूनी तरीके से, बिना किसी छानबीन के निरस्त किया गया। सरगुजा में तो वितरित वनाधिकार के पट्टे भी छीन लिए गए, ताकि वनों को खनन के लिए अडानी को सौंपा जा सकें। लेकिन इतने अहम सवाल पर कोर्ट से अपनी अनुपस्थिति से कांग्रेस सरकार ने साफ़ कर दिया है कि वास्तव में वह किसके साथ खड़ी है।

सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई पर झारखंड समेत 21 राज्यों को जवाब देना होगा।  सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासियों और उन अवैध कब्जेदारों से जंगल की जमीन को मुक्त कराने के लिए कहा है जिनका जायज हक का दावा खारिज हो गया है। शीर्ष न्यायालय ने जमीन बेदखली के लिए 21 राज्यों की सरकारों से आवश्यक कदम उठाने के लिए कहा है। इस सिलसिले में 13 फरवरी को दिए आदेश में शीर्ष न्यायालय ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों से क्रियान्वयन संबंधी अद्यतन जानकारी मांगी है। 

 

 








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Humendra Raj Tekam :: - 02-23-2019
Ab kaha jayenge aadiwasi?

Ankit Raven :: - 02-23-2019
आदम खोर सरकार दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश भारत हे