छत्तीसगढ़ में राजनीतिक दलों ने फिर किया आदिवासियों को दरकिनार

छत्तीसगढ़ , , बुधवार , 14-03-2018


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तामेश्वर सिन्हा

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में मूल छत्तीसगढ़िया नेतृत्व को कुचलने का इतिहास पुराना है, प्रदेश में कद्दावर नेताओं की मौजूदगी चंद्रशेखर साहू, ननकीराम कंवर एवं धरमलाल कौशिक को दरकिनार कर हारी हुई प्रत्याशी सरोज पांडे को राज्य सभा का उम्मीदवार बनाने से यह चर्चा फिर से छिड़ गई है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों राष्ट्रीय पार्टियां स्थानीय नेताओं को अपना आधार मजबूत करने के पश्चात उन्हें किनारे लगा देती हैं। 

आजादी के बाद एससी-एसटी को लोकसभा-विधानसभा में आरक्षण होने के चलते अरविन्द नेताम, बलिराम कश्यप, शिवप्रताप सिंह को आगे रखकर दोनों पार्टियां आदिवासी क्षेत्रों में अपना आधार मजबूत करते रहीं। क्योंकि इस समय पिछड़ों को कोई आरक्षण नहीं था इसीलिए पिछड़े नेता प्रभावशाली ढंग से अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवा सके थे। कई सीटों पर तो आयातित प्रत्याशी चुनाव लड़कर चुनाव जीत जाते थे जैसे धर्मपाल गुप्ता दुर्ग के होते हुए भी राजनांदगांव से चुनाव लड़ा करते थे, महासमुंद संसदीय क्षेत्र शुक्ल बन्धुओं की सीट हुआ करती थी।

1992 के बाद पिछड़ों को जब स्थानीय निकाय में आरक्षण मिलने लगा तो पिछड़ों में भी भरपूर मात्रा में राजनीतिक नेतृत्व निकले। इस नेतृत्व में ताराचंद साहू और चन्द्रशेखर साहू का नाम प्रमुख है। भाजपा दोनों नेताओं को खूब उपयोग किया और साहू समाज में अपना प्रभाव बढ़ाया था। ठीक वैसे ही आदिवासियों में स्व. बलिराम कश्यप को भाजपा ने अपना चेहरा बनाया था।

राजनांदगांव संसदीय सीट से आजादी के बाद 2009 लोकसभा चुनाव में पहली बार किसी पिछड़े को भाजपा से मधुसुदन यादव को टिकट दिया गया। रमन सिंह ने राजनांदगांव के स्थापित नेताओं जैसे सुरेश एठलाल, लीलाराम भोजवानी, खूबचंद पारख, आशोक शर्मा को पीछे ढकेलने के लिए मधुसूदन यादव को लोकसभा का प्रत्याशी बनाया गया। परन्तु 2014 में मधुसूदन यादव को दोबारा टिकट देने के बजाए मुख्यमंत्री रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह को टिकट थमा दिया गया।  

राजनांदगांव डोगरगांव विधानसभा क्षेत्र बरसों तक राजपरिवार के कब्जे में रहा है। 2008 के चुनाव में पहली बार खेदूराम साहू को टिकिट मिला पर 2013 में उनका टिकिट काट कर दिनेश गांधी को टिकट दे दिया गया। खुज्जी विधानसभा में 1993 में रविन्द्रपाल भाटिया विधायक निर्वाचित हुए। जिला पंचायत सीट से प्रदीप गांधी को जितवाने के लिए भाटिया ने अपने खास व्यक्ति चन्द्रिका डडसेना को (वर्तमान जिला भाजपा उपाध्यक्ष) को प्रदीप गांधी के पक्ष में नाम वापस करवा लिया था। जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित होने के बाद प्रदीप गांधी जिला पंचायत अध्यक्ष बने, डोंगरगांव विधानसभा सदस्य बने, फिर लोकसभा सदस्य बने।

मुख्यमंत्री रमन सिंह के विधान सभा क्षेत्र कवर्धा की बात करें तो कवर्धा विधानसभा सीट से योगेश्वर राज ठाकुर को पार्टी टिकट देती रही है।1993 के बाद रमन सिंह पहली बार तत्कालीन मध्यप्रदेश में कवर्धा सिट से निर्वाचित हुए थे उस समय कवर्धा सीट जीतने के लिए रमन सिंह ने अपने मित्र सियाराम साहू को साहू वोट हथियाने के लिए इस्तेमाल किया। हालांकि सियाराम साहू को वीरेंद्र नगर सीट से टिकट दिया था और मोहम्मद अकबर को हरा कर ये भी विधानसभा पंहुचे थे।

सियाराम साहू ने पार्टी का आधार मजबूत करने के लिए काफी काम किया। लेकिन वे आज अपने अस्तित्व को बचाने में संघर्षरत हैं। सियाराम साहू को पिछड़ा वर्ग आयोग का झुनझुना पकड़ा दिया गया है। चन्द्रशेखर साहू को वित्त आयोग का झुनझुना पकड़ा दिया गया है। यही नहीं ताराचंद साहू को अनुशासनहीनता के नाम पर पार्टी से निकाला गया। उनके पुत्र दीपक ताराचंद साहू को खादीग्राम उद्योग का झुनझुना पकड़ा दिया गया। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि दीपक तारचंद साहू को भविष्य में दुर्ग संसदीय क्षेत्र से पार्टी का चेहरा बनाने के लिए सरोज पांडे को राज्यसभा भेजा गया है। क्योंकि साहू समाज के विरोध के चलते सरोज पांडे का दुर्ग संसदीय क्षेत्र से जीतना संभव नहीं है। वहीं कांग्रेस साहू वोट की अहमियत को समझते हुए कांग्रेस ने धमतरी कांग्रेस जिला अध्यक्ष लेखराम साहू को राज्यसभा का नामंकन दाखिल करवाया गया है।

भाजपा हो या कांग्रेस दोनों पार्टियों में मूल छत्तीसगढ़वासियों के नेतृत्व का पार्टी अनुशासन के नाम पर गला घोंटा जाता है। जिसके उदाहरण शिवप्रताप सिंह, ताराचंद साहू और सोहान पोटाई हैं।वैसे देखा जाए तो दोनों पार्टियां सवर्णों का टिकट नहीं काटतीं पर पिछड़े और आदिवासी प्रत्याशियों को बदलते रहते हैं। कांग्रेस भाजपा रविन्द्र चौबे, अमितेश शुक्ल, सत्यनारायण शर्मा, शिवरतन शर्मा के टिकट कभी नहीं काटती हैं। ये सवाल अब मूल छत्तीसगढ़ियों को मथने लगा है।










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