शहीद गेंद सिंह: आदिवासी विद्रोह एवं चेतना का नायक

छत्तीसगढ़ , , सोमवार , 21-01-2019


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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। यह इतिहास के एक अनसुने आदिवासी विद्रोही की गाथा है। बस्तर में अंग्रेजो के खिलाफत लड़ाई लड़ने वाले परलकोट के जमींदार गेंदा सिंह ने एक साल तक अंग्रेजी हुकूमत को नाकों चने चबवा दिया। बात सन् 1818 की है, नागपुर के भोंसले शासन और ईस्ट इंडिया कंपनी के मध्य एक संधि हुई। संधि के अनुसार छत्तीसगढ़ जिसमे बस्तर में समिमिलित है, की शासन व्यवस्था ईस्ट इण्डिया कंपनी को सौंप दी गई।

नागपुर के भोंसले शासन को कंपनी जो सैनिक सहायता प्रदान कर रही थी, उसका खर्च वसूलने के लिए छत्तीसगढ़ को 12 वर्षों तक उपभोग करने के लिए उपहार में दे दिया गया। अब उनके साथ इस क्षेत्र को लूटने-खसोटने में ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज अधिकारी भी आ धमके थे।शोषण और दमन का दोहरा दौर चल पड़ा था, कर के बोझ से जनता की कमर टूट चुकी थी, आदिवासियों के परम्परागत सामानों, हथियारों को भी लूटा जा रहा था।

बस्तर के आदिवासियों में असंतोष की अग्नि पहले से ही सुलग रही थी, किन्तु विप्लव रूप में उनका प्रथम विस्फोट सन् 1824 में परलकोट के जमीदार भूमिया राजा गेंद सिंह के नेतृत्व में हुआ, परलकोट (वर्तमान में उत्तर बस्तर में नारायणपुर से लगा हुआ) महाराष्ट्र के चांदा (चंद्रपुर) जिले की सीमा से लगी हुई कोतरी नदी के अबूझमाड़ क्षेत्र में आती थी, इस जमींदार के 165 गांव थे, जिनमें 98 गांव निर्जन थे, परलकोट जमींदारी का मुख्यालय था।

मराठा कर्मचारियों और ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज अधिकारियों द्वारा शोषण और लूट-खसोट के विरुद्ध आदिवासियों को संग़ठित करके हथियार उठाने के लिए गेंद सिंह ने उतेजित किया और विद्रोह के नेतृत्व की बागडोर स्वयं संभाली, हजारों की संख्या में अबूझमाड़ के आदिवासी धनुष-बाण और भालों से सुसज्जित होकर अंग्रेज अधिकारियों और मराठा कर्मचारियों पर घात लगाकर आक्रमण करने लगे, शत्रुओं के घरों में आग लगा देते और जहां भी दिखाई देते, मार देते थे। पुरुष तो पुरुष महिलाएं भी हथियार लेकर इस विद्रोह में समिलित थीं। आदिवासी 500 से 1000 की संख्या में समूह बनाकर निकलते थे कुछ समूह का नेतृत्व महिलाएं करती थीं।

धौरा पेड़ की टहनियों को उन्होंने विप्लव का संकेत और सन्देश बनाया था, विप्लवियों ने छापामार युद्ध प्रणाली अपनायी थी, यद्धपि बंदूकों के सामने उनके हथियार कारगर नहीं थे। तथापि वे वनों और पहाड़ियों में छिपे होते थे, ज्यों ही मराठों और अंग्रेजों के आने का संकेत मिलता वे उस पर चारों ओर से बाणों की बौछार कर देते थे। विद्रोही समूहों के संचालन का दायित्व मंझियो पर था। रणनीति पर विचार-विमर्श के लिए रात्रि में गोटूल (घोटुल) में एकत्र होते थे। विदेशी सत्ता के विरोध में परलकोट, अबूझमाड़ के आदिवासियों का यह स्वाधीनता संग्राम लगभग 1 वर्ष तक चलता रहा, गेंद सिंह सुनियोजित ढंग से उनका नेतृत्त्व करते रहे। अंत में एगन्यू ने चांदा से बड़ी सेना बुलवाई।10 जनवरी सन् 1825 को परलकोट को चारों ओर से घेर लिया गया, गेंद सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। 20 जनवरी 1825 को परलकोट के उनके महल के सामने ही गेंद सिंह को फांसी दे दी गई।

बस्तर, छत्तीसगढ़ का यह वीर सपूत स्वाधीनता के संग्राम में प्राणों की आहूति देकर शहीद हो गया। सन् 1857 के बहुत पहले, अंग्रेजी शासन के विरुद्ध छत्तीसगढ़ की भूमि पर मुक्ति संग्राम का यह पहला बलिदान था। लेकिन शासन, प्रशासन की उदानशीनता के चलते और प्रचार के अभाव में शहीद गेंद सिंह के बलिदान की गाथा से यहां के निवासी लंबे समय तक अनजान रहे और आज भी हैं।

 










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