गोवा सरकार पर क्यों मेहरबान है पर्यावरण मंत्रालय

इंसाफ की मांग , , मंगलवार , 07-11-2017


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जनचौक ब्यूरो

गोवा में चाहे जो भी सरकार हो, उसे वहां पर्यावरण पर काम करने वाले समूह हमेशा खटकते रहे हैं। सरकार को लगता है कि पर्यावरण के मसले पर ये ‘विकास’ बाधित कर रहे हैं। इसलिए यह अचरज की बात नहीं है कि गोवा में भारतीय जनता पार्टी सरकार के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर राष्ट्रीय हरित अभिकरण यानी एनजीटी की पुणे पीठ में चल रहे गोवा के सभी मामलों को एनजीटी दिल्ली में स्थानांतरित कराने की कोशिश की। सरकार ने तर्क दिया कि गोवा से पुणे आना-जाना मुश्किल है और कई गुना अधिक दूर होने के बावजूद दिल्ली आना-जाना आसान है।

केंद्रीय पर्यावरण,वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने उनके इस अनुरोध को तेजी दिखाते हुए दो महीने से भी कम वक्त में स्वीकार कर लिया। इस निर्णय में इन मामलों से संबंधित दूसरे पक्षों की राय तक नहीं ली गई। लेकिन बंबई उच्च न्यायालय की गोवा पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय के इस निर्णय को खारिज कर दिया।

इस मामले में न्यायमूर्ति गौतम पटेल और नूतन सरदेसाई ने 47 पन्ने का निर्णय दिया है कि उसमें देश की न्याय व्यवस्था के प्रति मूल सवाल उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद-21 जीवन और आजादी का मूल अधिकार देता है और न्याय तक पहुंच का अधिकार इसके तहत आता है। इसमें आने वाली कोई भी बाधा इस मौलिक अधिकार के खिलाफ है। आदेश में लिखा है, ‘एक ऐसे समय में जब अदालतें अपना शाखा विस्तार करना चाहती हैं ताकि याचिकाकर्ताओं को कम परेशानी हो, तब किसी सरकार की यह कोशिश बड़ी अजीब लगती है कि वह अपनी सुविधा के लिए मामलों की सुनवाई हजारों किलोमीटर दूर करवाना चाहती है और वह भी जनहित के नाम पर। यह जनहित नहीं है।’

वैसे गोवा सरकार की यह कोशिश एनजीटी की मूल भावना के भी खिलाफ है। क्योंकि 2011 में एनजीटी के पांच स्थानीय पीठ इसलिए ही स्थापित किए गए ताकि लोगों को सुनवाई के लिए बहुत दूरी नहीं तय करनी पड़ी। खुद एनजीटी की स्थापना सामान्य अदालतों में पर्यावरण संबंधित मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए हुई थी। सच्चाई तो यह है कि स्थानीय पीठ के अलावा गोवा जैसे जगहों पर सर्कुलर पीठ स्थापित करने की बात उठी थी। क्योंकि गोवा से सबसे अधिक मामले आते हैं।

पुणे पीठ के पास पूरे महाराष्ट्र और गुजरात के 340 मामले हैं और गोवा के 146। लेकिन राज्य सरकार ने इस काम को और आसान बनाने के बजाए जटिल बनाने की कोशिश की। पर्रिकर सरकार को यह लग रहा था कि वह ऐसा करने में कामयाब होगी लेकिन गोवा में कुछ ऐसे सजग समूह हैं जो पर्यावरण को लेकर बेहद जागरूक हैं।

इस फैसले में कहा गया कि गोवा की सबसे बड़ी धरोहर पर्यावरण और पारिस्थितिकी है। 14 लाख की आबादी वाला गोवा पर्यावरण जागरूकता के मामले में सबसे सजग राज्य है। पर्यावरण सुरक्षा की लड़ाई यहां गांव-गांव में दैनिक तौर पर लड़ी जाती है। पंचायतें अक्सर विकास योजनाओं का आकलन पर्यावरण के लिहाज से करती हैं। तब भी अगर सरकार इन चिंताओं का नहीं दूर कर पाती तब ये मामले अदालत में पहुंचते हैं। इस काम में एनजीटी की स्थानीय पीठ लोगों के लिए बेहद उपयोगी है। 

न्याय तक पहुंच सिर्फ अदालतों की स्थापना की जगह तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरी न्याय तंत्र से संबंधित है। भले ही अदालतें लोगों की पहुंच में हों लेकिन पूरी प्रक्रिया इतनी जटिल और खर्चीली है कि न्याय व्यवस्था बहुसंख्यक लोगों की पहुंच से दूर है। इस अदालती फैसले के बाद इन पक्षों पर बात करने की जरूरत है। इस फैसले में जजों ने जेम्स बाल्डवीन की पुस्तक दि प्राइस ऑफ दि टिकट के एक अंश का हवाला दिया, ‘अगर कोई यह जानना चाहता है कि देश में न्याय दिया जा रहा है या नहीं तो उसे पुलिस, वकील और जजों के पास नहीं बल्कि आम लोगों के पास जाना चाहिए, जिनके पास कोई सुरक्षा नहीं है और उन्हें सुनना चाहिए।’ यह बात भारत पर बिल्कुल सटीक बैठती है जहां कानून आम लोगों की रक्षा करने में अक्सर नाकाम रहता है।

                                                                                                                                                                                  (ईपीडब्लू से साभार)


 










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