“पद्मावत” की बिसात पर करणी सेना, बीजेपी सबने अपने मोहरे सजाए

बेबाक , व्यंग्य लेख, सोमवार , 22-01-2018


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बसंत रावत

बारह साल बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स (बीएसएफ) की नौकरी करने के बाद, अहमदाबाद में रह रहे राज शेखावत ने अपने आप को  अपने राजपूत पूर्वजों के सम्मान  की  रक्षा के लिए एक नये मोर्चे पर  तैनात कर दिया है। उनकी ये तैनाती बहुत रंग ला रही है। इन दिनों उन्होंने न सिर्फ़ अख़बारों  की बेशुमार सुर्खियां बटोर ली हैं , बल्कि लगे हाथों  उन्होंने भाजपा सरकार के भी संकट मोचक बनकर उभरने का कीर्तिमान हासिल कर लिया है।  उन्हें अपने आप पर  गर्व है, अपने राजपूत होने जैसा गर्व। राजस्थान  के किसी राजघराने से  ताल्लुक रखने का दावा करने वाले, 43 वर्षीय राज शेखावत  के लिए ये यक़ीन उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। किसी वीरता के लिए मिलने वाले मेडल से कहीं ज़्यादा। 

इसमें कोई  हैरानी की बात नहीं है कि राज शेखावत  राजस्थान में आगामी विधानसभा के चुनाव के भय से ग्रसित वसुंधरा सरकार के  पहले से ही विशेष राजदुलारे बने हुए हैं, खासकर जब से उन्होंने गुजरात में करणी सेना का  नेतृत्व संभाल कर संजय लीला भंसाली की फ़िल्म पद्मावत का विरोध करने का  बोझ अपने कंधों पर लादा है। एंड ही इज़ लविंग ईट। प्रसिद्धि जो मिल रही है। 

आजकल उनका ज़्यादातर समय टीवी स्टूडियो में फ़िल्म का विरोध करने को लेकर  इंटरव्यू  देने में बीत रहा है।  सबको ये  सौभाग्य  नहीं मिलता है। माइक सामने हो तो जीने का मजा आ ही जाता है। एक तरह  से जीवन की सार्थकता की जंग जीतने  जैसा  लगता है। और इसमें इनके लिए जान जाने का  कोई  जोखिम भी नहीं।


राजस्थान की भाजपा सरकार के लिए भंसाली की फ़िल्म, जिसे किसी राजपूत  अथवा “महान करणी सैनिकों”  ने  रिलीज़ होने से पहले शायद ही  देखा  हो,  उनके हाथ इस फ़िल्म के रूप में चुनाव  जीतने, राजपूत अस्मिता जगाने, राजपूत महिलाओं को एक बाड़े में एकत्रित करने  का महामंत्र  हाथ लग गया।  ये फ़िल्म इनके लिए चुनाव जीतने के लिए सफलता की कुंजी  कहो या खुल जा सिमसिम जैसा कोडवर्ड। इससे उन्हें चुनाव की वैतरणी पार होती नज़र आ रही है।


मकसद साफ है। चारों तरफ चुनाव जीतने की कामना को लिए   फ़िल्म बैन करने का राजनैतिक हवन  किया जा रहा है।  आगज़नी, तोड़फोड़, पोस्टर फाड़ना, बसें  जलाना इत्यादि  फ़िल्म न रिलीज होने देने के महान यज्ञ  में आहुति के तौर पर दिया जा रहा है। राज शेखावत  गुजरात में यजमान बन कर धमकियों की  आहुति दे रहे हैं, मंत्र फूंक रहे हैं। हालांकि सरकार ऐसा  नही मानती, क्योंकि सरकार को लगता है  कि फ़िल्म के  कारण राजपूतों का ख़ून खौल रहा है।  राज शेखावत, गुजरात प्रदेश अध्यक्ष राजपूत करणी सेना, उनका खून सबसे ज्यादा उबल रहा है।  क्यों न हो, बहुत  बेचैन हैं राजपूतों के सम्मान को संजय लीला भंसाली से  बचाने के लिए।

गुजरात करणी सेना के अध्यक्ष राज शेखावत।

 

सो, ज़रा  ग़ौर से देखिए इन महाशय को। इनकी तस्वीर यकीनन  बेहद दिलचस्प लगेगी। और क्यों न  लगे? इसमें  इनकी शाही शनो-शौक़त  की झलक  झलकती है। क़रीब एक किलो  सोने   से  लकदक, बहुमूल्य नग से जड़ी अंगूठियां। इसमें कुछ गलत तो नहीं!  उनका कहना है ये उनका परम्परागत शाही  पहनावा  है। ग़लत समझने की  ग़लती मत कर लेना। वरना ख़ैर नहीं। कुछ भी हो सकता है। भंसाली जैसा हाल भी हो  सकता है। आख़िर करणी सेना के स्टेट प्रेज़िडेंट की भी कोई शान होती है।


बीएसएफ़ से  2006  में समय से पूर्व (प्री मचुर) रिटायरमेंट लेने के  बाद वे अहमदाबाद में सिक्योरिटी एजेंसी चलाने लगे। ये अलग बात है कि गुजरात के मल्टी प्लैक्स ऑनर इन दिनों इन्हीं की  वजह से ज़्यादा इन्सिक्योर फ़ील कर रहे बताये जाते हैं। इनसे डरे हुए हैं, इतने डरे हुए कि उन्होंने 25 जनवरी को  पद्मावत फ़िल्म न दिखाने का "स्वैच्छा" से अंडरटेकिंग दे दिया है करणी सेना को। बावजूद इसके कि  देश की सर्वोच्च अदालत ने  हाल ही में भाजपा  शासित चार राज्यों द्वारा फ़िल्म पद्मावत को रिलीज करने पर लगी पाबंदी को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया है। 

लेकिन क्या करें। गुजरात में एक सेंसिटिव सरकार है। राजपूत फ़ीलिंग के प्रति सजग, भाजपा सरकार ने पद्मावत फिल्म को रिलीज नहीं होने देने के लिए  करणी सेना के ऊपर अपना हाथ वरदान स्वरूप  रखा हुआ है। 

 

सरकार का  गुप्त सहयोग मिलने के बाद मल्टी प्लैक्स  मालिकों  को पहले ही  “प्यार” से डराया धमकाया जा चुका हैं। फ़तवा निकल चुका है फ़िल्म के ख़िलाफ़, अब  यदि कहीं फिल्म रिलीज होती है तो  बख़्शा नहीं  जाएगा। करणी सेना का इशारा  साफ है। तोड़फोड़ या  आगजनी। कुछ  भी। सब कुछ जायज है। भीड़ अपना काम करेगी। गुजरात में सरकारी तंत्र को मुंह फेरने की सनातन लोकतांत्रिक छूट मिली हुई है। आगे भी  इस छूट का लाभ उठाते रहेगी गुजरात की लोकप्रिय सरकार फिलहाल अभी ऐसा  लगता है।

 

जब राज शेखावत की मुलाकात गुजरात सरकार के  राजपूत मंत्री भूपेंद्र सिंह चूड़ासमा से हुई, तो परिणाम बहुत ही अच्छा रहा। चूड़ासमा का साफ़ कहना था  कि सरकार ने अनफिशल बैन जारी रखने का रास्ता निकाल दिया है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने भाजपा की सरकारों को  हिदायत दी है कि  फिल्म को रिलीज होने से रोक नहीं सकते, लेकिन समझदार सरकार ने बड़ी समदारी से काम लिया और बीच का रास्ता निकाल  ही लिया। मल्टीप्लैक्स  सिनेमा के मालिकों ने स्वयं ही फिल्म को स्क्रीन न करने का फैसला लिया है यह सरकार के लिए बड़ी राहत की बात है, चूड़ासमा ने राज शेखावत को भरोसा दिलाते हुए बताया। और  एक दूसरे को मन  ही मन  धन्यवाद दिया। अभी तो सहयोग करने के दिन है। मिशन पूरा होने के बाद फ़िल्म  को न चलने देने और  जनता कर्फ्यू लगाने का  श्रेय लेने की लड़ाई लड़ी जा सकती है। लड़ी जाएगी किसी दूसरे मोर्चे पर। फिलहाल एक साझा लड़ाई लड़ी जानी है साझा दुश्मन -फ़िल्म पद्दमावत- के खिलाफ।  

(बसंत रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और अहमदाबाद में दि टेलीग्राफ के ब्यूरो चीफ रहे हैं।)










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