आखिर माननीय लोग क्यों नहीं करते हैं आदिवासियों से मुलाकात?

छत्तीसगढ़ , बस्तर, शनिवार , 08-12-2018


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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। आखिर क्यों आदिवासी समाज को दरकिनार कर रहे हैं जिम्मेदार माननीय? 90 प्रतिशत आदिवासी समाज का सामाजिक प्रतिनिधित्व कर रहे सर्व आदिवासी समाज के लोगों से नहीं मिलना चाह रहे हैं आदिवासी सामाज के संवैधानिक अधिकारों की रक्षक राज्यपाल और राष्ट्रपति ? आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने इनसे सवालिया लहजे में पूछा है कि क्या इनके बस्तर आने का मकसद सिर्फ सैरसपाटा है? आपको बता दें कि 4 और  5 दिसम्बर को छत्तीसगढ़ की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल बस्तर प्रावस पर थीं जिनसे आदिवासी समाज का एक प्रतिनिधिमंडल मिलना चाह रहा था। और उनसे अपने समाज से जुड़ी समस्याओं पर और अपने संवैधानिक अधिकारों पर आए संकट पर बातचीत करना चाह रहा था। और इसकी जानकारी समाज ने पहले ही प्रशासनिक अधिकारियों को भी दे दी थी लेकिन राज्यपाल ने आदिवासी समाज के लोगों से नहीं मुलाकात की !  

बता दें कि जुलाई महीने में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी जब बस्तर प्रवास पर आए हुए थे तो आदिवासी समाज राष्ट्रपति से मिल कर बस्तर कि समस्याओं से उन्हें अवगत कराना चाह रहा था। लेकिन उस दौरान भी राष्ट्रपति आदिवासी समाज से बिना मिले वापस लौट गए थे। समाज ने आरोप लगाया था कि बस्तर प्रवास के दौरान माननीय जब सभी लोगों से मिल सकते हैं तो आखिर 90 प्रतिशत आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हिस्से से क्यों नहीं मिलना चाहते? 

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल 4 और 5 दिसम्बर को दो दिवसीय प्रवास पर बस्तर संभाग पहुंची हुई थीं। इस दौरान सर्व आदिवासी समाज ने राज्यपाल महोदया से मुलाक़ात का समय मांगा था लेकिन उसकी राज्यपाल से मुलाक़ात नहीं हो सकी। उसके बाद संगठन ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर महामहिम के रवैये पर सवाल उठाया। और पूछा कि बस्तर को सैरगाह बनाने वाले राज्यपाल आखिर आदिवासियों से क्यों नहीं मिलना चाहते? 

सर्व आदिवासी समाज के संभाग अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने जनचौक को बताया कि समाज द्वारा जिला प्रशासन के सामने नियमानुसार लिखित दरख्वास्त दिया गया था और कलेक्टर महोदय से मिलकर उन्हें व्यक्तिगत तौर पर भी अवगत कराया गया था लेकिन राज्यपाल महोदया ने जिला प्रशासन को मिलने हेतु समय ही प्रदान नहीं किया। इससे बस्तर के आदिवासी समुदाय में काफ़ी रोष व्याप्त है।

विगत समय देश के राष्ट्रपति महोदय के बस्तर प्रवास पर भी जिला प्रशासन द्वारा समाज को राष्ट्रपति से मिलने नहीं दिया गया था। जबकि अन्य सामाजिक संगठन के पदाधिकारियों को बाकायदा मिलवाया गया था। ठाकुर ने कहा कि राष्ट्रपति राज्यपाल अनुसूचित क्षेत्र में क्या देखने के लिए आते हैं?किनसे मिलने के लिए आते हैं? जबकि बस्तर संभाग में आदिवासी समुदाय की बहुलता है साथ ही यहां की 90% सरकारी योजनाएं आदिवासी समुदाय के लिए ही चलायी जा रही हैं। लेकिन सामाजिक संगठन के सदस्यों से प्रशासन राष्ट्रपति व राज्यपाल को मिलने नहीं देता है। ऐसे में योजनाओं की कमियों को कैसे दूर किया जा सकता है।

ठाकुर आगे कहते हैं कि आदिवासी समुदाय 70 साल से अनुसूची पांच की अवहेलना से काफी आक्रोश में है। अब समाज बस्तर में सैर करने वाले जिम्मेदार माननीयों व अधिकारियों का विरोध करेगा। संभाग में आदिवासी समुदाय दिन-ब-दिन नक्सली हिंसा से जल रहा है। रोज समुदाय के लोग मारे जा रहे हैं और यहां पर राज्यपाल महोदय परिवार के साथ आकर इसको सैर कर यहां की वस्तुस्थिति से अवगत हुए बिना ही चुपचाप चले जाते हैं। ऐसे प्रवास का समाज पुरजोर विरोध करता है ऐसा करने वाले अधिकारियों का भी विरोध किया जाएगा।

कोई भी राज्यपाल हो या राष्ट्रपति या कोई भी मंत्री हो या कोई भी उच्चाधिकारी बस्तर में आने पर आदिवासी समुदाय के साथ बैठकर यहां की वस्तु स्थिति की उसे जानकारी लेनी चाहिए। समाज यहां की वास्तविक स्थिति से उनको अवगत भी कराएगा। उसके बाद उनका कर्तव्य बन जाता है कि वो उनकी समस्याओं का निराकरण करें। ऐसा नहीं होने पर आदिवासी उनका विरोध करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। 

आप को बता दें कि आदिवासी समुदाय की रविवार की बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि राज्यपाल से प्रतिनिधि मंडल मिलकर बस्तर संभाग की ज्वलंत मुद्दों व भारत का संविधान की अनुसूची पांच, पेसा एक्ट 1996, सामुदायिक वनाधिकार अधिनियम 2006, भू राजस्व की धारा 170ख,165,गौण खनिजों का नियंत्रण परम्परागत ग्रामसभा के द्वारा, भू अधिग्रहण विधेयक, नगरनार स्टील प्लांट में अनुसूची पांच के तहत तृतीय चतुर्थ श्रेणी के पदों पर भर्ती, संभाग में तृतीय चतुर्थ श्रेणी के पदों पर अनुसूची पांच के तहत भर्ती, बस्तर विश्वविद्यालय में कोर्स व महाविद्यालय में प्रोफेसर की कमी, नक्सली हिंसा पर भारत के संविधान में प्रावधान के तहत कार्रवाई आदि विषयों पर सकारात्मक चर्चा करना चाहते थे।








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