सत्ता भले बीजेपी को मिल गयी हो लेकिन धराशायी हो गया है गुजरात मॉडल

गुजरात , अहमदाबाद, सोमवार , 07-05-2018


gujrat-model-bjp-modi-development-communal-health-education

कलीम सिद्दीकी

अहमदाबाद। गुजरात चुनाव के परिणाम ने बीजेपी को भले ही सत्ता से बेदखल नहीं किया हो लेकिन उस गुजरात मॉडल पर प्रश्न चिन्ह ज़रूर खड़ा कर दिया जिस मॉडल के द्वारा 2014 में बीजेपी केंद्र की सत्ता में आई थी। अर्थशास्त्री प्रोफेसर हेमंत शाह का मानना है कि “गुजरात चुनाव विकास और गुजरात मॉडल पर ही हुआ है तीन चेहरे जो चुनाव के मुख्य बिंदु थे वह विकास, बेरोज़गारी, किसान, न्याय की ही बात कर रहे थे। बीजेपी का दो डिजिट पर आ जाना और कांग्रेस का सत्ता के जादुई आंकड़े तक न पहुंच पाना इस बात का साक्ष्य है कि चुनाव संप्रदायिकता और जातिवाद पर नहीं हुआ है। जनता विकास और गुजरात मॉडल के मुद्दे पर टिकी रही फैसला भी मॉडल के खिलाफ दिया।” 

2002 के बाद जो गुजरात मॉडल विकसित किया गया है उसे प्रोफेसर हेमंत शाह ने चार वर्गों में बांटा है: 

अभिभूत (प्रभावित) वर्ग: यह वर्ग रिवर फ्रंट, गांधीनगर के बगीचे, महात्मा मन्दिर, फ्लाई ओवर इत्यादि देख कर आंखें फाड़ कर वाव वाव कहते बैठ जाता है और इसी को विकास कहते हैं। इन्हें गांव के रहने वाले किसान और पर्यावरण हानि से कोई लेना-देना नहीं होता। शहर की कुछ बिल्डिगों में ही विकास दिखता है। 

लाभार्थी वर्ग: यह वह वर्ग है जिसे सत्ता से आर्थिक लाभ मिलता है इस मॉडल में इवेंट को महत्व दिया गया है। सरकारी उत्सव के माध्यम से कुछ लोगों को लाभ और जनता को सपना दिखाया जाता है। इस वर्ग में इवेंट आर्गेनाइजर, फिल्म निर्माता, टीवी चैनल, समाचार पत्र, बिल्डर, ठेकेदार, उद्योगपति, बड़े सरकारी अधिकारी, राजनैतिक दल के पदाधिकारी, नेता, दलाल इत्यादि आते हैं जो मात्र लाभ उठाने के प्रयास में रहते हैं।  

भक्त वर्ग: स्वतंत्र भारत के राजनैतिक इतिहास में पहली बार इस वर्ग का उदय हुआ है इस वर्ग को जो बताया जाता है वह अपने विवेक और बुद्धि का उपयोग किये बिना ही मान लेता है जो दिखाया बताया जा रहा है वही सच है। यह वर्ग हकीकत को समझे बिना सब कुछ मान लेता है। नेताओं की भक्ति में लीन भक्त नेताओं को भगवान समझ बैठते हैं। 

भयभीत वर्ग: इस वर्ग का उदय उन लोगों के कारण हुआ जो गुजरात मॉडल की निंदा करते थे। सरकार के विरोध में बोलते थे। धरना प्रदर्शन और जुलूस निकालते थे। इन्हें चुप करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद नीति अपनाई गई। सरकारी मशीनरी का उपयोग किया गया। लोगों को जेल में डाला गया। अदालती कार्रवाई हुई। लोगों की पिटाई हुई। यहां तक कि हत्याएं भी कराई गईं। इसके बाद सरकार के खिलाफ बोलने वाले को विकास विरोधी, गुजरात विरोधी, देश विरोधी साबित करके समाज से अलग कर दोबारा सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत न करे ऐसी परिस्थिति खड़ी की गई। इस वातावरण में समाज का एक बड़ा हिस्सा भय भीत हो गया। 

साढ़े छह करोड़ की जनसंख्या में लाभार्थी वर्ग बहुत ही छोटा है और भक्त वर्ग इससे थोड़ा बड़ा है अन्य दो वर्ग में ही राज्य की बड़ी संख्या आती है। देश के सवा सौ करोड़ में भी इसी मॉडल के अनुसार वर्गीकरण का प्रयास हो रहा है। 

हेमंत शाह।

गांव का किसान शहर के अमीरों को अनाज से लेकर साग सब्ज़ी सब कुछ उपलब्ध कराता है। परन्तु गुजरात चुनाव में गांव के लोगों ने गुजरात मॉडल के खिलाफ मतदान करते हुए कांग्रेस को 127 ग्रामीण सीटों में से 71 सीटें दी जबकि गुजरात मॉडल को 56 सीटें। 

गांव का किसान चुनाव चाहता था जिस प्रकार से अलाउद्दीन खिलजी ने किसान के हितों को देखते हुए फसलों के सही दाम दिए इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति बनाकर गांव को दिल्ली से जोड़ दिया था। परन्तु गुजरात मॉडल और हूं छुं विकास हूं छुं गुजरात की बातें करने वाले प्रधान मंत्री किसानों को समझा रहे थे औरंगजेब ही नहीं खिलजी भी बर्बर था। किसान चाहते थे उनकी फसलों को एफसीआई के माध्यम से सरकार खरीद ले जिस प्रकार से खिलजी के समय काल में सरकारी विभाग किसानों की फसल खरीद कर सरकारी गोडाउन में जमा रख देता था ताकि मुनाफाखोर मुनाफाखोरी न कर सकें।

आप को बता दें अलाउद्दीन खिलजी ने ही भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति बनाई थी। खिलजी ने ही फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया जैसे विभाग की स्थापना की थी। यह नीतियां आज भी जारी हैं। खिलजी ने बाज़ार को चार भागों में बांटा था। पशु मेला, अनाज मंडी, कपड़ों का बाज़ार, सराफा बाज़ार इत्यादि का उदय खिलजी के समय ही हुआ था। परन्तु देश के प्रधानमंत्री नीतियों के बजाय 1540 में मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य “पद्मावत” से उदित काल्पनिक चरित्र पद्मावती और जौहर जैसी कहानियां सुना रहे थे जो किसानों को पसंद नहीं आई। 

गुजरात मॉडल में कुपोषण एक बड़ी समस्या रही है। परन्तु कुपोषण कभी भी चुनावों में बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया। सरकार ने भी कुपोषण से निपटने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाया। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार गुजरात में 2015-16 में 6-59 महीने की आयु के 62.6%बच्चे, 15-49 वर्ष की गर्भवती न हों ऐसी 55.1% महिलाएं, 51.3% गर्भवती महिलाएं तथा 21.7% पुरुष कुपोषित अथवा एनीमिया से पीड़ित हैं।

नेशनल फैमिली सर्वे भारत सरकार के ही आंकड़े बताते हैं गुजरात में वर्ष 2015-16 में 12-23 महीने आयु के मात्र 50.4% बच्चों का संपूर्ण टीकाकरण हो पाया है जबकि 2005-06 में यह आंकड़ा 45.2%था। गुजरात मॉडल के 10 वर्षों में यह आंकड़ा मात्र 5.2% ही बढ़ पाया। इसी आयु के 50% बच्चों को बीसीजी, पोलियो तथा डीटीपी टीके की तीन डोज़ मिल ही नहीं पाई। 

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की मानें तो 2015-16 में गुजरात की 28% महिलाएं निरक्षर हैं। शहरों में 17.4% और ग्रामीण की 36% महिलाएं निरक्षर हैं। 10 वर्ष पूर्व यह आंकड़ा 34.7 था अर्थात 10 वर्षों में मात्र 6.7% का ही सुधार हो पाया। 

नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्टरेशन, भारत सरकार के अनुसार गुजरात में वर्ष 2013-14 में प्राथमिक शाला में छात्रों की संख्या 92.29 लाख थी। एक वर्ष बाद यह संख्या 91.42 हो गई। बच्चों की जनसंख्या बढ़ने के बावजूद 87000 छात्र कम हो गए 45% माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों में विज्ञान की प्रयोगशाला ही नहीं है। गुजरात में 23% स्कूल निजी हैं। 28% स्कूलों में मात्र पांचवीं तक ही शिक्षा दी जाती है। 18% छात्र प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं करते हैं। अर्थात प्राथमिक शिक्षा के दरमियान 2 लाख 90 हज़ार छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं। 

                                          जारी..








Taggujrat model modi development communal

Leave your comment











:: - 05-08-2018