"विकास मॉडल" नहीं अब अश्लीलता और नफरत की सीडियों का सहारा

गुजरात , , मंगलवार , 21-11-2017


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अखिलेश अखिल

देश में पहली दफा चुनावी राजनीति में गुजरात मॉडल का अवतरण हुआ। वह भी लोक सभा चुनाव  2014  में। बीते लोक सभा चुनाव से पहले देश के किसी भी आदमी को गुजरात मॉडल की जानकारी नहीं थी या होगी भी तो उसे राष्ट्रीय फलक पर लाने की कोशिश नहीं की गयी। 2014 के चुनाव में जब बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाये जाने के बाद मोदी गुजरात मॉडल लेकर दिल्ली और देश के दूसरे इलाकों में पहुंचे तो इसके साथ ही ये मॉडल देशमय हो गया। फिर लगातार प्रचार के बाद इसने अपनी राष्ट्रीय पहचान बना ली। मोदी देश के जिस भी इलाके में प्रचार करने पहुंचते सबसे पहले अपने गुजरात माडल के बारे में बताते। और उसकी तारीफों के इतने पुल बांध देते कि जनता उसके मोहपाश में बंध जाती। उसका नतीजा ये रहा कि लोगों ने उनके नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार दे दी। और फिर उसी गुजरात मॉडल के दम  पर बीजेपी ने कई और राज्यों की सत्ता को फतह किया। और इस कड़ी में तकरीबन सभी बड़े राज्य आज उसके कब्जे में हैं। 

लेकिन अब जब गुजरात में चुनाव की बारी आयी है तो बीजेपी अपने उसी माडल को खुद उसके लोगों को नहीं दिखा पा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल बनता है कि अगर पूरे देश के लोगों ने गुजरात माडल को स्वीकार कर लिया है तो फिर खुद गुजराती समाज उससे परहेज क्यों कर रहा है? दअरसल मोदी और शाह की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। और गुजरात की सत्ता जाने का मतलब है केंद्र की सत्ता पर मरमांतक चोट। ऐसे में बीजेपी इस सूबे की सत्ता पाने के लिए अपनी जान लड़ा देगी। इस लिहाज से भले ही वहां कथित ‘गुजरात माडल’ काम न कर रहा हो। लेकिन उसकी चुनावी झोली में कई दूसरे माडल भी मौजूद हैं। लिहाजा उसने इन दूसरे माडलों का पिटारा खोल दिया है। ये मॉडल बड़े ही भयावह हैं। जिसके तहत बीजेपी सूबे के 22 साल पहले के फसाद का भय दिखा रही है। और उस दंगे की सीडी बंटवाकर उसने लोगों से वोट मांगना शुरू कर दिया है। 

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट लॉ नेटवर्क 'एचआरएलएन' के कार्यकर्ता और वकील गाविंद परमार ने इस मामले की चुनाव आयोग और क्राइम ब्रांच में शिकायत की है। उन्होंने कहा है कि नफरत फैलाने और गुजरात चुनाव को सांप्रदायिक बनाने वाले इस प्रयास पर चुनाव आयोग तत्काल रोक लगाए। परमार की शिकायत के बाद गुजरात के मुख्य चुनाव आयुक्त बीबी स्वैन ने पुलिस को इस मामले में कार्रवाई के आदेश दे दिए हैं।

गोविंद परमार का कहना है कि 85 सेकेंड के इस वीडियो को अगर पुलिस चाहे तो बनाने वालों को पकड़ने के साथ सभी मीडिया माध्यमों पर इसके विज्ञापन को रोकना कोई मुश्किल नहीं है। ये वीडियो प्रोफेशनल प्रोडक्शन हाउस से बनवाया गया है। जो न सिर्फ हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत फैलाने का काम कर रहा है बल्कि इसने अल्पसंख्यक समुदाय के लिए असुरक्षा पैदा करने की भी कोशिश की है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे 1 मिनट 15 सेकेंड के गुजराती भाषा में बने इस वीडियो की शुरुआत इस वाक्य के साथ होती है, 'शाम 7:00 बजे के बाद गुजरात में ऐसा हो सकता है।' उसके बाद अजान 'मस्जिद में होने वाली प्रार्थना' की आवाज आती है। इसके बाद वीडियो में एक नौजवान लड़की सुनसान सड़क पर चली जा रही है। जैसे ही घर पहुंचती है मां—बाप बहुत घबराए हुए परेशान हालत में होते हैं। मां कहती है, 'हतप्रभ हूं, क्या यही गुजरात है?' पिता जवाब देता है, '22 साल पहले ऐसा था गुजरात। अगर वह लौट आए तो फिर एक बार वैसा ही हो जाएगा।' इसके बाद आखिर में भगवे रंग की पट्टी पर लिखा आता है, 'अपना वोट, अपनी सुरक्षा।'

नफरत फैलाकर वोट मांगने वाले इस कैंपेन में कहीं से भी भाजपा को वोट देने के लिए नहीं कहा जा रहा है, पर बहुत साफ है कि पिछले 22 वर्षों से किसके राज में 7 बजे के बाद अजान नहीं सुनाई दे रहा है, किसका राज आएगा तो फिर सुनाई देने लगेगा।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं आजकल दिल्ली में रहते हैं।)






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