घाटी में पलटा समय का पासा, जनता की बजाए अब होने लगी है सुरक्षा बलों के मानवाधिकार की बात

कानून-व्यवस्था , , सोमवार , 19-02-2018


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गौतम नौलखा

 

 

कश्मीर में आम लोगों के मानवाधिकारों के बजाए सशस्त्र बलों के अधिकारों पर अधिक चिंता जताई जा रही है। कश्मीर में इसके स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि न्याय पर अंधराष्ट्रवाद हावी है। 27 जनवरी को शोपियां जिले के गवानपुरा में हुई गोलीबारी के मामले में जब एक सेना अधिकारी पर एफआईआर दर्ज करने की बात आई तो यह स्पष्ट तौर पर दिखा।

12 फरवरी को भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने ‘सेना के मनोबल की रक्षा’ के मसले पर एक याचिका की सुनवाई की। अदालत ने आदेश दिया कि 10 गढ़वाल राइफल के मेजर आदित्य कुमार के खिलाफ जम्मू-कश्मीर पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करे। इसके कुछ दिन पहले 9 फरवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सैनिकों के बच्चों की ओर से दायर एक याचिका पर जांच करने का निर्णय लिया। इसमें हिंसक भीड़ द्वारा सेना के जवानों पर होने वाली पत्थरबाजी के खिलाफ जरूरी उपाय की मांग की गई है। आयोग ने इसे सैनिकों की सुरक्षा का मसला मानते हुए जांच की मांग को मान लिया।

संघर्ष क्षेत्र में सैनिकों को संदेह के आधार पर किसी को गोली मारने का अधिकार है, वहां उनके मानवाधिकारों को आम लोगों के मानवाधिकारों पर तरजीह दी गई। जांच पर रोक लगने के बाद अब शिकायत दर्ज करने पर भी रोक लगा दी गई है। 

28 जनवरी को जारी किए गए एक बयान में सेना ने 27 जनवरी की गोलीबारी का बचाव किया और उन्होंने कहा कि सेना ने तय मानकों का पूरी तरह से पालन किया है। सेना की गोलीबार में तीन युवा जावेद अहमद भट्ट, सुहेल जावेद लोन और रइस अहमद गनी की मौत हो गई। सेना का दावा है कि जब एक जेसीओ पर हमला हो गया और भीड़ गाड़ियों में आग लगाने लगी तो उसे बचाव में फायरिंग करना पड़ा।

लेकिन इस दावे की पुष्टि के लिए कोई तथ्य नहीं दिया गया। तथ्य तो दूसरी ही कहानी कहते हैं। 29 जनवरी को मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा को बताया कि पुलिस ने सेना को गवानपुरा के रास्ते जाने से बचने की सलाह दी थी। क्योंकि 24 जनवरी को हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकवादी के मारे जाने के बाद वहां तनाव का माहौल था। इनमें एक गवानपुरा का रहने वाला था। इस कार्रवाई में तीन आम लोग भी घायल हुए थे। इस वजह से वहां माहौल गर्म था।सेना ने पुलिस की इस सलाह को नहीं माना। सेना की पहली टुकड़ी जब सुबह गुजरी तो स्थानीय आतंकवादी के पोस्टर को लेकर स्थानीय लोगों से उनकी कहासुनी हुई। दोपहर बाद साढ़े तीन बजे मेजर आदित्य कुमार के नेतृत्व में 10 गढ़वाल रेजिमेंट की टुकड़ी ने गवानपुरा से होकर जाने का निर्णय लिया। उस माहौल में सेना की टुकड़ी दो बार उसी गांव से लेकर जाना ठीक नहीं था। स्थानीय लोगों का कहना है कि जेसीओ पर हमला नहीं किया गया था और एक बंद गाड़ी में से आखिर किसी को कैसे निकाला जा सकता था।

मई, 2017 में यहां ऑपरेशन ऑल आउट की शुरुआत हुई थी। इस बीच 217 आतंकवादी, 108 आम लोग और 124 सशस्त्र बलों के जवानों की जान गई है। 108 आम लोगों में से 19 को मुठभेड़ में मारा गया है। चाइगुंड और गवानपुरा के पांच आम लोग मारे गए हैं।

किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज करना पहला कदम होता है। सशस्त्र बलों के जवानों के खिलाफ शायद ही कभी जांच पूरी होती है। अगर जांच के बाद आरोप पत्र भी दाखिल कर लिया गया होता तो भी यह प्रक्रिया रुक जाती। क्योंकि आम लोगों को सशस्त्र बलों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति की जरूरत पड़ती है।

1 जनवरी, 2018 को रक्षा मंत्री द्वारा राज्यसभा में दिए गए लिखित जवाब के मुताबिक सशस्त्र बलों के खिलाफ मुकदमा चलाने के 50 आवेदनों में से 47 को खारिज कर दिया गया है और तीन पर अभी विचार चल रहा है। इनमें से 17 मामले आम लोगों के मारे जाने के थे,16 हिरासत में मौत के, आठ हिरासत से गायब होने के और चार बलात्कार के आरोपों के। 

28 सालों से जम्मू कश्मीर ‘अशांत क्षेत्र’ बना हुआ है और सेना व अधैसैनिक बलों को उनके अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता। 28 सालों के बाद इस स्थिति का बने रहने भारतीय जनता पार्टी सरकार की राजनीतिक अक्षमता को दिखाता है। इससे यह भी पता चलता है कि इस समस्या का समधान सैन्य कार्रवाइयों के जरिए नहीं हो सकता। गवानपुरा के सुहेल लोन के पिता जावेद अहमद लोन ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ‘हम सरकार से कुछ नहीं चाहते। हमें मुआवजा नहीं चाहिए। हमें न तो नौकरी चाहिए और न ही कोई जांच। उनकी अदालतें हैं, उनकी सेना है, उनकी पुलिस है और उनका प्रशासन है।’ अगर आहत लोग ऐसे सोचने लगें तो यह सुनना किसी मजाक से कम नहीं लगता है कि सैन्य बलों को सुरक्षा चाहिए। शोपियां की घटना बताती है कि लोगों की सोच सैन्य दमन के खिलाफ है। जब कोई लोकतांत्रिक राजनीतिक समाधान नहीं दिख रहा हो और न्याय देने से इनकार किया जा रहा हो तो कश्मीरियों की आजादी की मांग को बल मिलता दिखने लगता है।


           (लेखक पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, दिल्ली के सदस्य हैं।)

 










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