जंगल से बेदखली के फरमान पर आंदोलित हुआ झारखंड

झारखंड , , रविवार , 24-02-2019


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विशद कुमार

रांची। 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा देश भर के 11 लाख से अधिक और झारखंड के 28,000 जंगल के दावेदारों को जंगल से बेदखल करने के फरमान से झारखंड आंदोलित हो चला है। राज्य के कई हिस्सों में प्रदर्शन और पदयात्रा के माध्यम से विरोध का बिगुल फूंका जा रहा है।

20 फरवरी को हजारीबाग के संत कोलंबस कॉलेज ग्राउंड से नेशनल अलायंस फॉर पीस एंड जस्टिस के बैनर तले निकली पदयात्रा 27 फरवरी को रांची पहुंचेगी। 'नेशनल अलायंस फॉर पीस एंड जस्टिस' के संस्थापक वीरेंद्र कुमार कहते हैं, “हम जान रहे थे कि 20 फरवरी को उच्चतम न्यायालय का फैसला आदिवासी और वन क्षेत्र में रहनेवाले समुदायों के विरोध में अयेगा, क्योंकि केंद्र सरकार ने प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीपतियों को सौंपने की तैयारी कर रखी है। इसी कारण 20 फरवरी को ही हम लोग 'नेशनल अलायंस फॉर पीस एंड जस्टिस' के बैनर तले पदयात्रा का फैसला किया। जब सरकार और न्यायालय आदिवासियों की अन्याय से हिफाजत नहीं कर सकते, तो हमें सड़क पर उतरना ही पड़ेगा।'' उन्होंने कहा कि ''बड़कागांव में 25 सौ एकड़ फॉरेस्ट लैंड गैरकानूनी ढंग से एनटीपीसी को दे दी गयी है। ग्राम सभा के अधिकारों का राज्य में अनुपालन नहीं हो रहा है। अत: हम इन्हीं सब मामलों को लेकर 27 फरवरी को राजभवन के समक्ष प्रदर्शन कर अपनी मांग राज्यपाल को सौंपेंगे।”

पदयात्रा में शामिल जेवियर मरांडी कहते हैं- “वन विभाग द्वारा जब मर्जी होती है, तब ग्रामीणों की झोपड़ी गिरा दी जाती है, घर तोड़ दिये जाते हैं। जिस भूमि पर हम वर्षों से खेती कर रहे हैं, उस जमीन पर पौधारोपण कर दियाजाता है। इतना ही नहीं, वन विभाग द्वारा कई मामलों में आदिवासियों पर मुकदमा कर उन्हें जेल में भी डाल दिया गया है। सामुदायिक भूमि को रघुवर सरकार ने लैंड बैंक में शामिल कर दिया है। राज्य में भू-अर्जन कानून का अनुपालन सरकार नहीं कर रही है। पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून को सरकार राज्य में लागू नहीं कर रही है। ऐसे में हम विवश होकर संविधान प्रदत्त अधिकारों को पाने के लिए हजारीबाग से रांची तक पदयात्रा पर निकले हैं।साथ ही, वन पट्टा पर दिये गये शीर्ष न्यायालय के फैसले के विरोध में संगठन की ओर से निंदा प्रस्ताव पास किया गया है।”

पदयात्रा में शामिल युवा जसन अफरीदी का मानना है,"आदिवासी और जल, जंगल, जमीन का रिश्ता खून के रिश्ते से भी ज्यादा गहरा है। अंग्रेजी हुकूमत के काल से ही वन संपदाओं पर औपनिवेशिक शासकों के विरोध में झारखंड के इलाके में आदिवासी समुदाय द्वारा विद्रोह किया जाता रहा है और यह दौर झारखंड अलग राज्य बनने के बाद भी जारी रहा। झारखंड में आदिवासी-मूलनिवासी समुदाय जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के लिए और समुदाय का अधिकार कायम रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

पदयात्रा में शामिल राजेश कहते हैं, “हम यहां अपने पेड़ों और पर्यावरण की रक्षा के लिए घर से निकले हैं। सरकार ने ढांचागत विकास के नाम पर हमारी जमीन छीन ली है। जिस रफ्तार से वनों की कटाई कारखाने बनाने के लिएकी जा रही है, उसने सबकुछ नष्ट कर दिया है। इससे हमारे लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जहां उन्हें अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।”

जमशेदपुर में विरोध प्रदर्शन

दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जमशेदपुर में 23 फरवरी को विभन्न जन संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में तिलका चौक, डिमना में विरोध प्रदर्शन किया गया। जनतांत्रिक महासभा दीपक रंजीत ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा झारखंड सहित देशभर के करीब 11 लाख आदिवासी परिवारों एवं अन्य परम्परागत समुदायों को जंगल से बेदखल करने का फैसला को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। झारखंड जनतांत्रिक मोर्चा के मदन सोरेन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह जजमेंट 2006 के वनाधिकार कानून की मूल भावना के ख़िलाफ़ तथा  'ऐतिहासिक अन्याय' को फिर से बहाल करने वाला है। वनाधिकार कानून के तहत दावों की प्रक्रिया को समाप्त किये बगैर बेदखली असंवैधानिक है। यह नियमगिरि के मामले में सुप्रीम कोर्ट के खुद के जजमेंट के खिलाफ है।

महसभा के सुनील हेम्ब्रम ने कहा कि कोर्ट के इस आदेश से झारखंड के जंगलों में गुजर-बसर कर रहे लगभग 28 हज़ार आदिवासी एवं 300 अन्य परम्परागत समुदाय के परिवार प्रभावित होंगे। यह लोगों की आजीविका, वनों के संरक्षण और संवर्धन पर नकारात्मक असर डालेगा।

महासभा के अनूप महतो ने कहा कि यह फैसला केंद्र सरकार और कारपोरेट गठजोड़ का परिणाम है। केंद्र सरकार की और से सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर कोई गंभीर पहल नहीं हुई है।

जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के मंथन ने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ दख़ल दे व पुनरावलोकन याचिका दायर कर वन भूमि पर रह रहे आदिवासियों एवं अन्य परम्परागत समुदायों के अधिकारों की रक्षा करे।

झारखंड के आदिवासीयों और जन संगठनों ने क्या कहा

 

आदिवासी और जनमुद्दों पर संघर्षशील रहे लक्ष्मी नारायण मुंडा कहते हैं — ''सरकारों का आदिवासियों और परंपरागत समुदायों के प्रति नजरिया स्पष्ट नहीं है। कोर्ट में सरकार ने अपना पक्ष भी नहीं रखा। जिससेस्पष्ट है कि आदिवासियों और परंपारगत समुदायों की वजूद मिटाने की कोशिश हो रही है। बड़े पैमाने पर वनपट्टा के दावे खारिज करने के कारण यह संकट सामने है। इसका असर कमजोर तबके के साथ अन्य परंपरागत और गरीब समुदायों पर भी पड़ेगा।''  

इस बीच आदिवासी जन परिषद के अध्यक्ष प्रेम शाही मुण्डा ने कहा है कि ''केंद्र और राज्यों की सरकारों की शिथिलता के कारण आदिवासियों को इन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा रहा है। वर्षों से जंगल में रहने वालेआदिवासियों के दावे खारिज किए जाते रहे हैं। यदि राज्य सरकारें त्वरित गति से वन अधिकार अधिनियम 2006 को विधि सम्मत और तीव्र गति से कारवाई करती, तो ये समस्या उत्पन्न नही होती।'' उन्होंने चेतावनी दी कि अगर जंगलों से आदिवासी हटाए गए, तो आंदोलन शुरू हो जाएगा।

दयामनी बरला ने कहा- ''सुप्रीम कोट के एक फैसले ने जंगल में रहने वाले आदिवासियों की अस्मिता और जिंदगी पर गहरा असर डालेगा। केंद्र सरकार ने आदिवासियों का पक्ष नहीं रखा है, जिससे आदिवासी बेहदनाराज हैं। हजारों सालों से जंगलों के बीच रहनेवाले आदिवासी बेदखल होने की कल्पना से सिहर जा रहे हैं। अमेरिका और अफ्रीका में खदानों और जंगलों पर अधिकार के लिए आदिवासियों को न केवल लहूलुहान कर दिया गया,बल्कि उनका बड़े पैमाने पर जेनोसाइड भी हुआ। वनाधिकार कानून के समय यह वायदा किया गया था कि आदिवासियों के खिलाफ जो ऐतिहासिक अन्याय हुआ है, यह कानून उस पर मामूली मरहम है। अब जब आदिवासी बेदखल होंगे, तो क्या ये ऐतिहासिक अन्याय नहीं होगा।''

कोलेबिरा विधायक विक्सल कोंगाड़ी कहते है — ''वन अधिकार कानून से जो भरोसा आदिवासी समाज को सरकार के प्रति आया था, वो अब खोता जा रहा है। फैसले के बाद आदिवासी समाजों के भीतर इस सवाल को लेकर भारी बेचैनी है। जंगलों की विविधता को खत्म करने और उस पर कब्जा करने के लिए देशी-विदेशी कॉरपोरेट घरानों में होड़ लगी हुई है। जड़ी-बूटी के नाम पर भी जंगलों को लूटा जा रहा है। आदिवासियों ने जान देकर जंगलों की रक्षा की है। आदिवासी समाज के इस संकट को यदि तुंरत हल नहीं किया गया तो इसका बहुत गहरा असर होगा। आदिवासी जनसंगठन पूछ रहे हैं, क्या मोदी सरकार अपनी गलती सुधारेगी और अध्यादेश लाकर जंगलों से हाने वाली इस संभावित बेदखली को रोकेगी।''

 










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