झारखंड में लोकतंत्र की हत्या, दलबदल मामले में विधानसभा अध्यक्ष ने सुनाया पक्षपातपूर्ण फैसला

झारखंड , , बृहस्पतिवार , 21-02-2019


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विशद कुमार

रांची।झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के छह विधायकों का दलबदल मामले में स्पीकर कोर्ट का फैसला झारखंड के 16 वर्षों के इतिहास में एक नया अध्याय छोड़ गया है। विगत 28 दिसंबर, 2014 को जब रघुवर दास ने मुख्यमंत्री बनकर झारखंड की बागडोर संभाली थी, तब उनके पास 37 विधायकों का समर्थन हासिल था। बहुमत से 4 विधायक कम थे। तब शुरू हुआ था सत्ता के गणित बिठाने का खेल। बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा (प्रा) के 8 विधायक जीत कर विधानसभा पहुंचे थे। काफी तोल—मोल के बाद 11 फरवरी, 2015 को इनमें से 6 विधायकों को दिल्ली में भाजपा में शामिल कर लिया गया। इस पाला बदल के बाद जेवीएम के खाते में सिर्फ दो विधायक प्रदीप यादव और प्रकाश राम शेष रह गए थे।इस घटनाक्रम के बाद जहां जेवीएम सुप्रीमो और राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इसे दलबदल का मामला करार दिया था। वहीं भाजपा ने कहा था कि जेवीएम का बीजेपी में विलय हो गया है।

इसके बाद झाविमो विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने 11 फरवरी तथा झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने 25 मार्च 2015 को स्पीकर कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में संबंधित विधायकों की विधानसभा की सदस्यता रद्द करने की मांग की गई थी। 15 फरवरी, 2015 को स्पीकर कक्ष के बंद केबिन में तथा 25 मार्च, 2015 से खुले इजलास में सुनवाई शुरू हुई थी।

बताते चलें कि कोर्ट ने इस मामले की अंतिम सुनवाई 12 दिसंबर, 2018 को  करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। लगभग चार वर्ष तक चले इस मामले में प्रतिवादी पक्ष (भाजपा) ने 78 गवाहों की सूची दी थी, जिनमें से 57 की गवाही हुई। जबकि झाविमो की ओर से कुल आठ गवाहों ने अपना बयान दर्ज कराया। सुनवाई के लिए स्पीकर ने कुल 97 तिथियां मुकर्रर की थी, जबकि कुल 64 सुनवाई हुई। लंबे अंतराल के बाद आ रहे इस फैसले का इंतजार राजनीतिक गलियारे के अलावा राज्य के आम और खास दोनों ही वर्गों को था।

अंतत: 20 फरवरी को स्पीकर दिनेश उरांव ने अपना फैसला सुना दिया। उन्होंने इन सभी छ: विधायकों के भाजपा में विलय को सही ठहराते हुए इसे संवैधानिक करार दिया। इस फैसले की अहमियत को समझने के लिए इतना ही काफी है कि फैसला सुनने के लिए स्पीकर कोर्ट में इतनी भीड़ थी कि समाचार संकलन करने गए पत्रकारों को भी बैठने की जगह नहीं थी और वे एक दूसरे की गोद में बैठे रहे। इस कोर्ट की सबसे मजेदार पहलू यह रहा कि दलबदल के आरोपित छह विधायकों में से कोई भी विधायक फैसला सुनने नहीं पहुंचा था। 

स्पीकर कोर्ट के इस फैसले से असहमति जताते हुए झाविमो ने हाई कोर्ट जाने की बात कही है। झाविमो अधिवक्ताे राजनंदन सहाय ने फैसले के खिलाफ रिट पिटीशन दाखिल करने की बात कही है। झाविमो के महासचिव खालिद खलील ने इस फैसले को लोकतंत्र की हत्या बताया है। पूर्व मंत्री सह झाविमो नेता रामचंद्र केशरी ने इसे पैसे का खेल बताया है। भाजपा अधिवक्ता विनोद कुमार साहू ने कहा है कि दसवीं अनुसूची के तहत यह दलबदल का मामला नहीं बनता था। वे इसे न्यानय की जीत बता रहे हैं।

फैसले के बाद दलबदल के आरोपित विधायक जानकी यादव ने कहा है कि-

यह न्यायालय की जीत है। उन्होंने स्पीकर के प्रति अपना आभार जताया और  कहा कि स्पीकर ने विधिसम्मत फैसला दिया है। दो तिहाई से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधियों ने जेवीएम का भाजपा में विलय किया था। तब मेरी अध्यक्षता में बैठक हुई थी और मैंने ही झाविमो का भाजपा में विलय किया था। आठ में से छह विधायक मेरे साथ थे। यह मुकदमा इतने लंबे समय तक चलना ही नहीं चाहिए था। हम सभी पढ़े-लिखे लोग हैं, सोच-समझकर विलय का फैसला लिया था। झाविमो विधायक प्रकाश राम भी आने वाले दिनों में हमारे साथ होंगे। हम चुनाव आयोग से झाविमो का चुनाव चिह्न रद्द करने की मांग करेंगे। झाविमो के विलय के बाद अब पार्टी महासचिव विधायक प्रदीप यादव निर्दलीय माने जाएंगे।वहीं भाजपा के पक्ष में फैसला आने से पार्टी जश्नय मना रही है। इस फैसले को पार्टी लोकसभा चुनाव के लिए संजीवनी मान रही है।

बता दें कि विधानसभा चुनाव 2014 के बाद झाविमो के टिकट से जीत हासिल करने के बाद छह विधायकों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। इनमें से अमर कुमार बाउरी (चंदनक्यारी) राज्य के राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार मंत्री हैं, जबकि रणधीर सिंह (सारठ) कृषि मंत्री। इनके अलावा जानकी प्रसाद यादव (बरकट्ठा) झारखंड राज्य आवास बोर्ड, गणेश गंझू झारखंड कृषि विपणन बोर्ड और आलोक चौरसिया वन विकास निगम के अध्यक्ष हैं। झाविमो छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले एक अन्य विधायक नवीन जायसवाल (हटिया) हैं।फैसले के पहले वादी पक्ष (झाविमो) और प्रतिवादी पक्ष (भाजपा) दोनों को ही अपने पक्ष में फैसला आने की उम्मीद थी।

झाविमो के प्रधान महासचिव प्रदीप यादव के अनुसार-

विधायकों का दूसरे दल में जाना पूरी तरह से दलबदल के मामले को स्थापित करता है। हरियाणा, तामिलनाडु, बिहार आदि राज्य इसके उदाहरण हैं। उनका कहना था कि प्रतिवादी पक्ष का यह दावा कि झाविमो के दो तिहाई विधायकों के चले जाने से पार्टी का स्वत: विलय हो गया है, यह पूरी तरह से निराधार है। क्योंकि मामले का पेंच यह है कि एक बार में चार और दूसरी बार में दो विधायकों ने भाजपा की सदस्यता ली। इस तरह दो तिहाई की बात खारिज हो जाती है। प्रदीप यादव बताते हैं कि विलय के लिए यह भी जरूरी है कि इससे संबंधित बैठक पार्टी अध्यक्ष बुलाए, जिसमें केंद्रीय समिति के सदस्यों की उपस्थिति हो, लेकिन बैठक दल बदलने वाले विधायकों में से एक जानकी प्रसाद यादव की अध्यक्षता में बुलाई गई। बाबूलाल मरांडी आज भी झाविमो के अध्यक्ष हैं, निर्वाचन आयोग तक को यह पता है। ऐसे में यह फैसला पूरी तरह अलोकतांत्रिक है।

दूसरी ओर प्रतिवादी पक्ष के जानकी प्रसाद यादव का दावा है कि विधायकों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण नहीं की थी बल्कि पूरी पार्टी का ही विलय भाजपा में हो गया था। झाविमो के आठ विधायकों में से छह भाजपा में शामिल हो गए थे। चूंकि यह आंकड़ा दो तिहाई होता है, ऐसे में विलय को गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता। विलय पूरी तरह से संवैधानिक और विधिसम्मत है। ऐसे में फैसला स्वागत योग्य है।

पूरे मामले का तारीखवार घटनाक्रम

 • 9 फरवरी, 2015: झाविमो के बागी विधायकों ने स्पीकर को पत्र लिख कर अलग बैठने की मांग की।

 • 10 फरवरी, 2015: झाविमो अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी और विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने पत्र लिख कर चार विधायकों के दलबदल करने के मामले में कार्रवाई की मांग की।

 • 11 फरवरी, 2015: दूसरे दिन झाविमो अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी और विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने दो और विधायकों पर दल बदल के तहत कार्रवाई की मांग की।

 • 12 फरवरी, 2015: स्पीकर ने झाविमो नेताओं को पक्ष रखने के लिए बुलाया।

 • 25 मार्च, 2015: याचिक को सुनवाई योग्य मानने को लेकर बहस शुरू हुई़।

 • 12 दिसंबर, 2018: दलबदल पर स्पीकर के न्यायाधिकरण में आखिरी सुनवाई हुई़ फैसला सुरक्षित रख लिया।

  • 20 फरवरी, 2018: दलबदल पर आया फैसला।

 

 










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