पत्थलगड़ी के आरोप में विजय कुजूर की गिरफ्तारी से झारखंड में एक अलग राजनीतिक भूचाल की आशंका!

सवाल दर सवाल , रांची, सोमवार , 19-03-2018


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विशद कुमार

रांची। पत्थलगड़ी करके संविधान की गलत व्याख्या करने के आरोप में विजय कुजूर की गिरफ्तारी को जहां एक तरफ सरकार और पुलिस बड़ी सफलता मान रही है वहीं इस गिरफ्तारी से झारखंड में एक अलग राजनीतिक भूचाल की आशंका बढ़ गई है। उल्लेखनीय है कि पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की एक पारंपरिक व्यवस्था है।

उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों ने आदिवासी बहुल इलाकों को अधिसूचित क्षेत्र बनाकर वहां की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के माध्यम से शासन की नींव डाली थी। अलग—अलग नामों से चल रही ग्राम—सभाओं को सरकार ने संदेश पहुंचाने का जरिया बनाया था। अंग्रेजों की इस विरासत को भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची ने भी ग्रहण किया। ग्रामसभाओं को कानूनी हक दिये। इसके साथ ही मुंडा, मानकी, बैंगा, पाहन और परगनैत नाम से चली आ रही पारंपरिक नेतृत्व की धारा को शासन का स्तंभ करार दिया गया। पेसा कानून के तहत तो आदिवासी इलाकों में इन्हीं को सरकार की धुरी करार दिया गया है। 

रीति-रिवाज के कानून तहत पत्थलगड़ी की मान्यता 

झारखंड में पत्थलगड़ी को लेकर पैदा हुए विवाद को कानूनी जानकार अनावश्यक मान रहे हैं। सच तो यह है कि झारखंड के अधिसूचित क्षेत्रों के लिए संवैधानिक प्रावधानों और आदिवासियों की परंपरा, संस्कृति और रिवाज को पारिभाषित करने वाले कानूनों में इसकी मान्यता दी गई है। झारखंड के आदिवासी हजारों वर्षों से शादी विवाह के शुभ अवसरों से लेकर मृतकों की समाधि के पास और सार्वजनिक उद्घोषणाओं के लिए पत्थलगड़ी करते रहते हैं। 

 

आदिवासी कानूनों के विशेषज्ञ रश्मि कात्यायन मानते हैं कि कहीं कहीं पत्थलगड़ी का गलत इस्तेमाल भी किया जा रहा है। उस पर ऐसे संदेश लिखे जा रहे हैं जो किसी भी रूप में मान्य नहीं हैं। लेकिन अधिकतर जगह पत्थलगड़ी पर आदिवासियों के परंपरागत कानूनों, पेसा के प्रावधानों और संविधान प्रदत्त ग्रामसभा को मिले अधिकारों की जानकारी दी गई है। इसी के तहत ग्राम सभा को सर्वोपरि बताते हुए प्रशासनिक अधिकारियों के अनावश्यक हस्तक्षेप की अपील की जाती है।

 

भारतीय संविधान भी पांचवीं अनुसूची के तहत इसकी इजाजत देता है। पांचवीं अनुसूचित से शासित इलाकों में स्थानीय स्वशासन के लिए पेसा कानून बनाया गया है, जो कि अपने इलाके में ग्राम सभा को सर्वोपरी बनाते हैं। शासन और प्रशासन को ग्रामसभा की इजाजत के बिना विकास परियोजनाओं से लेकर दूसरे किसी भी प्रावधान को लागू नहीं करने का निर्देश देते हैं। 

अधिवक्ता रश्मि कात्यायन कहते हैं कि जनजातीय परंपरा में यदि कोई व्यक्ति रीति रिवाजों का उल्लंघन करता है तो उसके गांव में प्रवेश बंद कर दिया जाता है। इसकी सूचना पत्थल (पत्थर) गाड़ कर अंकित कर दी जाती है।

बताते चलें कि झारखंड के 16022 गांव, 2074 पंचायत, 131 प्रखंड, 13 जिले पूरी तरह एवं 3 जिले आंशिक रूप से पेसा के तहत आते हैं।

उल्लेखनीय है कि झारखंड में पेसा ( प्रॉविजन ऑफ पंचायत एक्शटेशन टू शिड्यूल एरिया  1996 एक्ट ) कानून पूरी तरह से लागू नहीं है। राज्य सरकार ने इसे लागू करने की नियमावली ही नहीं बनाई है। इस कारण ग्रामसभाओं को अधिकारों से लैस नहीं किया जा सका है। सरकार केवल पंचायती राज कानून में पेसा के प्रावधानों को रखने का दावा कर रही है। ऐसे में ग्राम पंचायतों और पारंपरिक ग्राम सभाओं के अधिकारों को लेकर विरोधाभास सतह पर आ रहे हैं। 

 

भारत सरकार ने पांचवीं अनुसूची के तहत आनेवाले आदिवासी बहुल इलाकों में स्वशासन का विशेष प्रावधान करते हुए 1996 में पेसा यानी (पंचायत उपबंध विस्तार अनूसूची क्षेत्रों) में अधिनियम को लागू किया तथा इसे राज्य को एक साल के भीतर ऐसा ही कानून विधानसभा से पारित करना था। मगर राज्य सरकार ने पेसा जैसे कानून बनाने की जगह 2001 में पंचायती राज अधिनियम बनाकर अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत की सीटों को आदिवासियों के लिए आरक्षित कर दी। जबकि पेसा में ग्राम पंचायत को हटाकर पारंपरिक ग्राम सभाओं को स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक सत्ता के रूप में स्थापित करने की व्यवस्था है। नियमावली नहीं होने से पारंपरिक प्रधानों को अधिकार सम्पन्न नहीं किया जा सका है। 


बता दें कि पत्थलगड़ी   की पारंपरिक रिवाज के अनुसार ग्रामसभा की प्रधानी वंशजों को ट्रांसफर होती है। पिता के बाद पुत्र को ही ग्राम प्रधान के अधिकार मिलते हैं। ये जीवन पर्यंत होते हैं। मगर पेसा के तहत बनने वाली ग्रामसभा की अध्यक्षता उस गांव के प्रभावशाली आदिवासी समुदाय का प्रधान करता है।

यह सब कानून सम्मत होने के बावजूद विजय कुजूर की गिरफ्तारी और अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर  से इतना तो स्पष्ट हो चला है कि या तो सरकार संविधान पर ध्यान नहीं दे रही है या किसी बड़ी वजह से पत्थलगड़ी  करने वालों के खिलाफ ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है कि आदिवासी समुदाय सरकार के किसी भी फैसलों का विरोध न कर सके। 

उल्लेखनीय है कि 16 फरवरी 2017 राज्य की राजधानी रांची में ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट मोमेंटम झारखंड का आयोजन हुआ था जिसमें केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली सहित केंद्रीय मंत्री वैंकेया नायडू, नितिन गडकरी, पीयूष गोयल, स्मृति ईरानी एवं देश-दुनिया से कई बड़े उद्योगपति शरीक हुए थे। कार्यक्रम में चीफ सेक्रेटरी राजबाला वर्मा ने अपने भाषण में झारखंड की संभावनाओं पर चर्चा की और कहा था कि ''इज ऑफ डूइंग बिजनेस में झारखंड टॉप पर है तो लेबर रिफॉर्म्स में भी झारखंड नंबर एक पर है और इंवेस्टमेंट के लिए जमीन सबसे अहम होती है, अत: राज्य सरकार ने लैंड बैंक बनाया है, जहां आज निवेश के लिए 2.1 मिलियन एकड़ जमीन उपलब्ध है।''

ऐसे में पत्थलगड़ी हो या पेसा कानून, रघुवर सरकार की कारपोरेट परस्त नीतियों के खिलाफ है और उसके पालन कर्ता सरकार की नजर में राष्ट्रविरोधी हैं। विजय कुजूर जैसों की गिरफ्तारी आदिवासियों को डराने का एक सरकारी हथकंडा भी माना जा सकता है। 

दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के सलवा जुडुम के तर्ज पर इलाके के कतिपय आदिवासियों को पैसों का लालच देकर पत्थलगड़ी के विरोध में कार्यक्रम करवाया जा रहा है और पत्थलगड़ी को विकास विरोधी बताया जा रहा है। इस काम में संघ का घटक वनवासी केन्द्र सक्रिय है।  

 

कौन है विजय कुजूर?

टिस्को में कार्यरत विजय कुजूर आदिवासी इलाके में हाल के दिनों में एक बड़ा नाम बन कर उभरा है। खूंटी के बाद पूर्वी सिंहभूम व सरायकेला के गांवों में भी विजय कुजूर व उसके साथियों ने ग्रामसभा के अधिकार की अपनी संवैधानिक व्याख्या कर रखी है। स्कूल-कॉलेज व सार्वजनिक स्थलों की दीवारों पर लिखा है कि आदिवासी 2019 के चुनावों का बहिष्कार करेंगे। साथ ही यह भी लिखा कि आदिवासियों की परंपरा में चुनाव कराना असंवैधानिक है।

 

पिछले दिनों विशेष शाखा ने सरकार को एक रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें कहा गया था कि सरायकेला जिले के इचागढ़ में सरकार के विरुद्ध भोलेभाले आदिवासियों को भड़काया जा रहा है। वहां भी पत्थलगड़ी की योजना है। विशेष शाखा से रिपोर्ट मिलने के बाद डीजीपी डीके पांडेय ने संबंधित जिले के अफसरों को अलर्ट रहने और ससमय कार्रवाई करने का आदेश दिया था। विशेष शाखा ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि टिस्को के कोलकाता ब्रांच में कार्यरत विजय कुजूर तथा रांची के डोरंडा थाना क्षेत्र की हुंडरू निवासी बबीता कच्छप के नेतृत्व में सरायकेला में पत्थलगड़ी की योजना बनाई जा रही है तथा इस संदर्भ में प्रत्येक रविवार को जमशेदपुर स्थित आशियाना गेट के पास ट्रायबल कल्चर सेंटर में बैठक कर आवश्यक निर्देश दिया जाता है।

क्या-क्या हैं आरोप

खूंटी के कांकी गांव में 25 अगस्त को एसपी, डीएसपी और तीन दर्जन जवानों को बंधक बना कर घंटों रखा गया था। हरवे हथियार से लैस  होकर सरकारी कामकाज में  बाधा डालने की घटना में विजय कुजूर नामजद अभियुक्त  है। मामले में खूंटी  थाने में कांड संख्या 102/17 दर्ज है।

खूंटी के भंडरा गांव में  सभा कर संविधान की गलत व्याख्या करने, प्रशासन के खिलाफ लोगों को भड़काने, सरकारी पदाधिकारियों व कर्मचारियों का घेराव कर प्रताड़ित करने को लेकर 24 जून 2017 को खूंटी थाने में कांड संख्या 102/17 दर्ज किया गया था। इसमें भी विजय कुजूर नामजद अभियुक्त हैं।

सरायकेला के ईचागढ़ थाने के जामदोहा व काटगोढ़ा गांव में करीब तीन माह पूर्व पत्थलगड़ी की गयी थी। प्राथमिकी में विजय कुजूर, बबीता कच्छप सहित अन्य कई नामजद आरोपी थे।

बताते चलें कि विजय कुजूर पर खूंटी और सरायकेला में पत्थरगड़ी कर संविधान की गलत व्याख्या करने का आरोप है। वह शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की कोलकाता शाखा में जीएम के पद पर कार्यरत हैं। सरायकेला एसपी चंदन कुमार सिन्हा ने बताया कि पूछताछ के बाद विजय को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

एक माह से आफिस से गायब थे कुजूर!

सरायकेला एसपी ने बताया कि गिरफ्तारी के डर से विजय कुजूर अपने कार्यालय से पिछले एक महीने से गायब थे। वह दिल्ली में छिप कर रह रहे थे। पुलिस को इसकी सूचना मिली थी। झारखण्ड पुलिस द्वारा पुलिस की एक टीम को दिल्ली भेजा गया। कई दिनों तक कैंप करने के बाद विजय कुजूर पुलिस की पकड़ में आये। वह आदिवासी महासभा का थिंक टैंक माने जाते हैं। विजय कुजूर की पत्नी टाटा स्टील में स्पोर्ट्स  डिविजन में कार्यरत हैं। सरायकेला एसपी के मुताबिक, मामले में बबीता कच्छप भी फरार हैं। उनकी भी तलाश की जा रही है। 

विजय कुजूर को पकड़ने में आरआइटी थाना प्रभारी अंजनी कुमार, चांडिल इंस्पेक्टर सिया शरण प्रसाद व जेएसआइ अविनाश कुमार की तीन सदस्यीय टीम की भूमिका रही है।

संविधान की गलत व्याख्या करते थे विजय?  

पुलिस के मुताबिक विजय कुजूर ने खूंटी के कांकी गांव में पिछले साल 25 अगस्त को एसपी, डीएसपी सहित तीन दर्जन पुलिसकर्मियों को बंदी बनाने के पीछे अपनी अहम् भूमिका निभाई थी ।

इसके बाद खूंटी में जैप के जवानों को भी बंधक बनाया गया था। पुलिस के मुताबिक, विजय कुजूर और उसके साथी पत्थलगड़ी को लेकर संविधान की गलत व्याख्या कर भोले-भाले आदिवासियों को भड़काते रहे हैं। खूंटी, पूर्वी सिंहभूम, सिमडेगा और सरायकेला के गांवों में इसका तेजी से प्रचार-प्रसार किया जा रहा था। स्कूल, कॉलेज के अलावा सार्वजनिक स्थलों की दीवारों पर यह लिखवा दिया गया था कि आदिवासी 2019 के चुनावों का बहिष्कार करेंगे, क्योंकि उनकी परंपरा में चुनाव कराना असंवैधानिक है। मामले की जानकारी खुफिया विभाग ने भी वरीय अफसरों को दी थी।

(विशद कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)

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