बकोरिया कांड : कहानी का असली सच कुछ और है

झारखंड , रांची, बृहस्पतिवार , 01-03-2018


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विशद कुमार

(बकोरिया कांड को लेकर कल आपने पढ़ा कि किस तरह से पलामू के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में पिछले आठ जून 2015 को पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में मारे गये 12 लोगों को पुलिस माओवादी बताती रही लेकिन अब यह आईने की तरह साफ हो गया है कि उनमें से एक डॉ. आरके उर्फ अनुराग को छोड़कर किसी का भी नक्सली होने का रिकॉर्ड पुलिस के पास उपलब्ध नहीं था।...आज पढ़ते हैं इसका दूसरा और अंतिम भाग)

इस घटना की कहानी कुछ इस प्रकार शुरू होती है। माओवादी पार्टी के सूत्रों पर भरोसा करें तो इस घटना का असली किरदार डॉक्टर आरके उर्फ़ अनुराग पर पार्टी के भीतर कुछ आतंरिक अनुशासनहीनता के आरोप लगे थे। उस पर पैसों में हेराफेरी का भी आरोप था। इस कारण वह जेजेएमपी में शामिल होना चाहता था।

सूत्रों के अनुसार उदय यादव जेजेएमपी का दलाल था। डॉक्टर आरके उर्फ़ अनुराग इसी के संपर्क में था। उदय यादव ही अनुराग को जेजेएमपी से मिलाने वाला था। अनुराग के पास उस वक्त माओवादी पार्टी के लेवी का पैसा था, जिसको लेकर अलग-अलग दावे हैं, यह रकम शायद 12 लाख थी या शायद 28 लाख, जो आजतक स्पष्ट नहीं हो सका है। अनुराग जेजेएमपी वालों से मिलने के पहले इन पैसों को अपने बेटे संतोष यादव (25 वर्ष) को सौंप देना चाहता था। इसलिए उसने अपने बेटे और भतीजे योगेश यादव (25) को गाड़ी लेकर बुलाया था। अनुराग के पास पैसे होने की जानकारी उदय यादव और पप्पू लोहरा को भी हो गई थी। अनुराग जेजेएमपी के लीडर पप्पू लोहरा को अमवाटिकर बुला रहा था। जबकि पप्पू लोहरा उसको भालुआडीह बुला रहा था। इस बीच अनुराग ने बुधराम उरांव, चरकू तिर्की, महेंद्र खरवार आदि लोगों को यह कहकर बुला लिया था कि एक जगह चलना है। इन सारे लोगों को यह कतई पता नहीं था कि अनुराग पप्पू लोहरा से हाथ मिलाने जा रहा है।

मिलने की जगह को लेकर चल रही अनुराग और पप्पू लोहरा के बीच की खींचतान इस बात पर ख़त्म हुई कि अनुराग भलुआडीह ही आये, पप्पू लोहरा गाड़ी भेज देगा। सब के सब दो गाड़ियों में भलुवाडीह पहुंचे। जिसमें एक जेजेएमपी की गाड़ी थी और दूसरी अनुराग की, जिसको ड्राइवर मो. एजाज अहमद चला रहा था। वहां पहुंचकर अनुराग और पप्पू लोहरा ने एक दूसरे से हाथ मिलाया और लाल सलाम कहा। उसके बाद पप्पू लोहरा ने अनुराग के पैसे अपने कब्जे में लिए और सबको गोली मार दी। इतना ही नहीं उसके लिए काम करने वाले उदय यादव और उसके साथ आये उसके भाई नीरज यादव को भी उसने मार दिया। ताकि कोई सबूत ही न रहे। फिर पप्पू लोहरा ने इसकी जानकारी पुलिस को दे दी। सूत्रों पर भरोसा करें तो जेजेएमपी माओवादियों के खिलाफ पुलिस की मुखबिरी भी करता है। आगे की कहानी यह है कि डेढ़ बजे के आसपास सतबरवा पुलिस ने पत्रकारों को बुलाया और बताया कि माओवादियों के साथ एक मुठभेड़ हुई है, जिसमें 12 माओवादी मारे गए हैं। 

इस घटना के वक्त एक लड़का जो उस रात उन बारहों के साथ था, पर धोखे की भनक लगते ही बचकर भागने में सफल हो गया, जिसका जिक्र उस समय के किसी अख़बार-चैनल में नहीं आया था ।  

जेजेएमपी के चंगुल से छूट कर भागे 14 वर्षीय नाबालिग सीताराम को पुलिस ने दो साल तक छिपा कर रखा था

बताते चले कि दो साल के बाद यह खुलासा हुआ है कि 12 लोगों की हत्या के कुछ देर पहले तक डॉ. अनुराग के साथ सीताराम सिंह नाम का 14 वर्षीय एक नाबालिग लड़का भी था। जो अब दो साल के बाद प्रकाश में आया है क्योंकि उसे दो साल तक पुलिस अपने कब्जे में रखी थी।

बकौल सीताराम सात जून 2015 की रात नक्सली अनुराग और उसके साथ के दो लोग लादी गांव में रुके हुए थे। आठ जून 2015 को वह (सीताराम) जंगल में गाय चराने गया था। तभी नक्सली अनुराग उर्फ डॉक्टर दो लोगों के साथ उसके पास पहुंचे। अनुराग ने उससे कहा कि चलो रास्ता बताओ। वह अनुराग के साथ रास्ता बताते हुए चलने लगा। लादी गांव के ही दो और लड़कों को उसने रास्ता बताने के नाम पर साथ ले लिया। इनको साथ लेकर अनुराग सबसे पहले हरातू गांव पहुंचा। वहां से भी एक लड़के को साथ लिया। सीताराम के अनुसार हरातू से सभी ने नावाडीह व बेलवा गांव होते हुए औरंगा नदी को पार किया। वहां पर एक बलेरो आया। जिस पर सभी सवार हो गए। सीताराम के मुताबिक सभी जहां पर रुके थे और अनुराग ने मोबाइल पर किसी से कई बार बात की। अनुराग सभी को कुछ दूरी पर रख कर खुद मोबाइल से किसी से बात भी करता रहा था। ऐसा उसने कई बार किया। रास्ते में कुछ और लोग भी अनुराग से मिले और साथ चल रहे थे, जिन्हें वह नहीं पहचानता। रात 9.30 बजे के करीब छिलकी (नदी के किनारा) पर सभी बलेरो से उतरे। तभी कुछ लोग आये, जिससे अनुराग ने हाथ मिलाया। कुछ चितकबरा ड्रेस (इन दिनों पुलिस और उग्रवादी-नक्सली दोनों चितकबरा वर्दी पहनते हैं) पहने कुछ लोग पहुंचे। अनुराग ने चितकबरा वरदी पहने एक व्यक्ति से भी हाथ मिलाया था। इसके बाद चितकबरा वर्दी पहने कई सारे लोग पहुंच गये। सीताराम को लगा कि यहां मुठभेड़ वगैरह हो सकती है, उसने वहां से भागना चाहा। तभी चितकबरा ड्रेस पहने एक व्यक्ति ने उसका हाथ पकड़ लिया। लेकिन वह हाथ छुड़ा कर अंधेरा का फायदा उठाते हुए भाग गया। वहां से भाग कर वह एक गांव में रुका। दूसरे दिन शाम में छह बजे अपने घर पहुंचा। कुछ दिन बाद जंगल के लोग उसे पकड़ कर ले गये। बकोरिया कांड को लेकर उससे पूछताछ की। करीब एक माह बाद वह जंगल से भाग कर फिर घर आ गया। फिर गांव के नजदीक के एक पुलिस पिकेट पर चला गया। जिसके बाद उसे कहीं दूसरी जगह पुलिस के पास भेज दिया गया। पुलिस ने करीब दो साल तक उसे अपने पास रखा। इस दौरान उसे खाना खिलाया, कपड़े भी दिये और पढ़ाया-लिखाया भी। फिर घर वापस भेज दिया। 

सीताराम सिंह की मां संगीता देवी बताती है कि पुलिस ने सीताराम को करीब दो साल तक अपने साथ रखा। इस दौरान पुलिस उसे लेकर कई बार गांव भी आती रही थी। पुलिस के लोग जब भी सीताराम को लेकर उसके पास आते थे, तब बताते थे कि सीताराम को पढ़ा रहे हैं। संगीता देवी के मुताबिक वह खुद भी कई बार लातेहार गयी थी और सीताराम से मुलाकात की थी।  

सीताराम एवं उसकी मां के बयानो में कितनी सच्चाई है उसका असली सच वे ही जानते हैं या पुलिस, जिनके पास सीताराम दो साल तक रहा था। हो सकता है पुलिस द्वारा सिखाए जुमले ही दोनों मां बेटा दुहरा रहे हों। क्योंकि जिस तरह से बकोरिया मुठभेड़ के मामले पर पुलिस के चरित्र का परत दर परत खुलासा हो रहा है, कुछ भी असंभव नहीं है।  

घटना पर लीपापोती का शुरू से हो रहा है प्रयास

उल्लेखनीय है कि 9 जून 2015 को पलामू के सतबरवा (बकोरिया) में कथित मुठभेड़ में मारे गए कथित 12 नक्सलियों की सनसनीखेज खबर देश के अखबारों व खबरिया चैनलों पर पुलिस के जांबाजी को सलाम के साथ सुर्खियों में रही। मगर कुछ ही दिनों बाद इस फर्जी मुठभेड़ का जब खुलासा होने लगा तब कोर्ट के आदेश के बाद मामले की सीआईडी जांच की घोषणा हुई।

सीआईडी के एडीजी एमवी राव ने जब जांच शुरू की तभी झारखंड के डीजीपी डीके पांडेय ने जांच की दिशा को प्रभावित करने की कोशिश में एमवी राव को निर्देश दिया कि वे जांच की गति धीमी रखें, कोर्ट के आदेश की चिंता नहीं करें। मगर एमवी राव ने डीके पांडेय की बात मानने से साफ इंकार कर दिया। नतीजा यह रहा कि जिसके तुरंत बाद उनका तबादला सीआईडी से नयी दिल्ली स्थित ओएसडी कैंप में कर दिया गया, जबकि यह पद स्वीकृत भी नहीं था। राव को 13 नवंबर 2017 एडीजी सीआईडी के रूप में पदस्थापित किया गया था और 13 दिसंबर को उन्हें पद से हटा दिया गया। सूत्र बताते है कि अब तक किसी भी अफसर को बिना उसकी सहमति के ओएसडी कैंप में पदस्थापित नहीं किया गया है।   

इस बाबत एडीजी एमवी राव ने अपने तबादले के विरोध में गृह सचिव को एक पत्र लिखा। पत्र की प्रतिलिपि झारखंड के राज्यपाल और मुख्यमंत्री के अलावा केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी भेजी गयी। पत्र में यह भी कहा गया है कि बकोरिया कांड की जांच सही दिशा में ले जाने वाले और दर्ज एफआईआर से मतभेद रखने का साहस करने वाले अफसरों का पहले भी तबादला किया गया है। यह एक बड़े अपराध को दबाने और अपराध में शामिल अफसरों को बचाने की साजिश है। 

सनद रहे एमवी राव के पत्र के आलोक में गृह विभाग द्वारा डीजीपी डीके पांडेय को नोटिस भेजा गया। बकोरिया कांड मामले में अपनी भूमिका पर पक्ष रखने को कहा गया । डीजीपी से प्रतिक्रिया मांगी गयी। गृह विभाग उनका पक्ष जानने के बाद ही उनपर कार्रवाई करेगा कहा गया। 

जबकि सच्चाई यह है कि कथित मुठभेड़ के तुरंत बाद भी कई अफसरों के तबादले कर दिये गये थे। सीआईडी के तत्कालीन एडीजी रेजी डुंगडुंग व पलामू के तत्कालीन डीआईजी हेमंत टोप्पो का तबादला किया गया। उनके बाद सीआईडी एडीजी बने अजय भटनागर व अजय कुमार सिंह के कार्यकाल में मामले की जांच सुस्त हो गयी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस पर टिप्पणी की थी। मामले में रुचि लेने की वजह से रांची जोन की तत्कालीन आईजी सुमन गुप्ता का भी अचानक तबादला कर दिया गया था। पलामू सदर थाना के तत्कालीन प्रभारी हरीश पाठक को पुराने मामले में निलंबित कर दिया गया था। 

उल्लेखनीय है कि कोर्ट के आदेश पर पिछले महीने सीआईडी के एसपी सुनील भास्कर और सुपरवाइजिंग ऑफिसर आरके धान की उपस्थिति में मामले की भी समीक्षा की गयी, जिसमें पता चला कि मामला दर्ज किये जाने के बाद पिछले ढाई वर्षों में जांच आगे नहीं बढ़ सकी । मजे की बात तो यह है कि घटना के मामले में सीआईडी के एसपी सुनील भास्कर ने हाईकोर्ट में जो हलफनामा दाखिल किया है, उसमें उसने कई तथ्य छिपाये हैं। हलफनामे में कहा है कि घटना के वक्त इंस्पेक्टर हरीश पाठक पलामू सदर थाना के प्रभारी थे। घटना बकोरिया थाना क्षेत्र में हुई थी। इस कारण इससे हरीश पाठक का कोई लेना देना नहीं है। उन्हें इस अभियान से अलग रखा गया था। बता दें कि सुनील भास्कर का बयान विश्वसनीय इसलिए नहीं है कि उस वक्त रांची से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर में छपी तस्वीरों में  इंस्पेक्टर हरीश पाठक घटना के बाद घटनास्थल पर दिख रहे हैं। इतना ही नहीं, इस बात की भी पक्की सूचना है कि पलामू के तत्कालीन एसपी कन्हैया मयूर पटेल के निर्देश पर इंस्पेक्टर हरीश ही दंडाधिकारी को लेकर घटनास्थल पर पहुंचे थे। शवों के पोस्टमार्टम के वक्त भी हरीश मौजूद थे। कहना ना होगा कि सीआईडी द्वारा कोर्ट में दाखिल किया हलफनामा काफी विसंगतपूर्ण है। जिससे साफ हो जाता है कि मामले पर सबसे बड़ी ताकत का परोक्ष हस्तक्षेप है।

उल्लेखनीय है कि 9 जून 2017 को गिरिडीह के मधुबन थाना अंतर्गत पारसनाथ पहाड़ पर सीआरपीएफ कोबरा के जवानों द्वारा फर्जी मुठभेड़ में दुर्दांत माओवादी बताकर मोतीलाल बास्के की हत्या कर दी गई। मोतीलाल बास्के एक डोली मजदूर था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि मोतीलाल बास्के के निर्दोष होने के कई तथ्यगत प्रमाण मौजूद हैं जबकि पुलिस आजतक उसके माओवादी होने का कोई पुख्ता सबूत नहीं दे सकी है। इस फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ ‘दमन विरोधी मोर्चा’का गठन कर एक व्यापक जनांदोलन खड़ा किया गया, जिसमें झामुमो, भाकपा माले, आजसू पार्टी, जेवीएम सहित कई महत्वपूर्ण राजनीतिक दल व सामाजिक संगठन शामिल हुए।

साभार : गूगल

 

एक नजर इस पर भी 

नक्सल के नाम पर राज्य में हो रहा है कितना बड़ा खेल 

सेना में नौकरी देने का लालच देकर 514 युवकों को फर्जी नक्सली बनने को किया गया था तैयार

सच्चाई खुलने के डर से फर्जी सरेंडर कराने वाले केस की फाइल कर दी गई बंद 

पुलिस के अफसरों ने आंकड़ा बढ़ाने के लिए किया था सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग

ज्ञातव्य है कि रांची, खूंटी, गुमला व सिमडेगा के 514 युवकों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने के मामले से जुड़ी जांच को रांची पुलिस ने बंद कर दिया है। जबकि मामले पर एक याचिक हाईकोर्ट में लंबित है। 

बताते चलें कि शुरू से ही रांची पुलिस की जांच को केवल औपचारिकता थी। उसने कभी भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट पर गौर ही नहीं किया, जिसमें साफ कहा गया था कि पुलिस के आला अधिकारियों ने सरेंडर का आंकड़ा बढ़ाने के लिए नक्सली सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग किया है।  उल्लेखनीय है कि जिस वक्त 514 युवकों को कोबरा बटालियन के जवानों की निगरानी में पुरानी जेल परिसर में रखा गया था और हथियार के साथ उनकी तस्वीरें ली जा रही थी, उस वक्त सीआरपीएफ झारखंड सेक्टर के आईजी डीके पांडेय हुआ करते थे। डीके पांडेय अभी राज्य के डीजीपी हैं और इस मामले में डीजीपी डीके पांडेय, एडीजी एसएन प्रधान समेत सीआरपीएफ के अन्य अफसर संदेह के घेरे में हैं। एनएचआरसी की रिपोर्ट में भी इस ओर इशारा किया गया है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या रांची पुलिस ने डीजीपी डीके पांडेय को बचाने के लिए लोअर बाजार थाना में दर्ज मामले की जांच का दायरा समित रखा और मामले की जांच को बंद कर दी।

बता दें कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि एजेंट और अफसरों ने सरेंडर करने वाले युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर लाखों रुपये वसूले, ताकि सरेंडर के समय उन्हें वह हथियार सहित सरेंडर कराया जा सके और फर्जी सरेंडर असली लगे। 

उल्लेखनीय है कि मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी)  ने डीजी (अनुसंधान) को मामले की जांच कराने का आदेश दिया था। एनएचआरसी के उच्चाधिकारियों ने रांची आकर मामले की जांच  की थी। 

नक्सल सरेंडर की योजना गृह मंत्रालय के मौखिक निर्देश पर बनायी गयी थी 

एनएचआरसी की जांच में 12 तथ्य सामने आये थे, जिसकी जानकारी राज्य सरकार और गृह मंत्रालय को दे दी गई थी और आयोग ने उन 12 बिंदुओं  पर सरकार से जवाब मांगा था, लेकिन सरकार के उच्चाधिकारी इस रिपोर्ट को दबाये बैठे रहे। आयोग को कोई जवाब नहीं भेजा गया। जांच के दौरान तत्कालीन आइजी स्पेशल ब्रांच एसएन प्रधान ने जांच अधिकारी को बताया था कि नक्सली सरेंडर की योजना गृह मंत्रालय के मौखिक  निर्देश पर बनायी गयी थी, ताकि उन्हें मुख्य धारा में लाया जा सके। जांच में पुलिस के सीनियर अफसरों पर लगे आरोपों को सही पाया गया था।  

मानवाधिकार आयोग की जांच में जो तथ्य सामने आये

गृह मंत्रालय के मौखिक निर्देश पर पुलिस व सीआरपीएफ के अफसरों ने नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने की योजना बनायी थी। योजना पर जून 2011 से फरवरी 2013 तक काम किया गया।  

पुलिस अफसरों की ओर से रवि बोदरा को यह काम सौंपा गया था कि वह सरेंडर करने वाले नक्सलियों को लाये।

सीआरपीएफ व सेना में नौकरी पाने के लालच में युवकों ने जमीन व मोटरसाइकिल बेच कर रवि बोदरा और दिनेश प्रजापति को पैसे दिये। दोनों ने युवकों से कहा था कि नक्सली के रूप में सरेंडर करने पर नौकरी मिलेगी।

निर्दोष  युवकों को नक्सली बता कर नौकरी दिलाने के नाम पर सीआरपीएफ अफसरों के सामने सरेंडर कराने का आरोप सही।

युवकों को पुरानी जेल में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन की निगरानी में रखा गया।  युवकों के रहने और खाने का बोझ सरकार ने उठाया। जांच में जब सीनियर अधिकारियों ने पाया कि सिर्फ 10 युवक ही नक्सली गतिविधियों से संबंधित हैं, फिर भी अन्य को फंसाये रखा गया। कोर्ट में पेश नहीं किया गया था, इसलिए कानूनी तरीके से यह नहीं कहा जा सकता है कि उन्हें जेल में रखा गया था। युवकों को अवैध रूप से रखने के लिए सीआरपीएफ व पुलिस के सीनियर अफसर दोषी हैं।

युवकों को अवैध रूप से कब्जे में नहीं रखा गया था, पर यह स्पष्ट है कि इस अवधि में युवकों के आजीविका का नुकसान हुआ। 

पुराना जेल परिसर में 514 युवकों की जांच में किसी के भी नक्सली होने या उससे संबंध होने की बात सामने  नहीं आयी। युवकों को एक साल तक पुरानी जेल में रखा गया।

कोबरा बटालियन के अधिकारियों की अनुमति से युवकों को बाहर जाने और आने की अनुमति दी गयी थी।

जेल परिसर में रखे गये युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर सरकार द्वारा नियुक्त और पुलिस अधिकारियों ने पैसे लिये।

रवि बोदरा और दिनेश प्रजापति ने इन युवकों को सेना या अन्य पुलिस बलों में नौकरी दिलाने के नाम पर ठगा।

युवकों को जेल परिसर में रखने के लिए सरकारी अधिकारियों ने नियम का पालन नहीं किया।


(विशद कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)










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