लिंगायत और अंबेडकर सेमिनार की मांगें अगले चुनाव का घोषणापत्र

चुनाव विश्लेषण , दक्षिण का झरोखा, मंगलवार , 29-08-2017


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के रामचंद्रन

(कल, 28 अगस्त को आपने भाजपा के लिए कर्नाटक जीतना टेढ़ी खीरशीर्षक के तहत पढ़ा कि अप्रैल 2018 में कर्नाटक विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए कर्नाटक राजनीतिक रूप से उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा है। यहां जनसंख्या के एक बड़े हिस्से लिंगायत समुदाय का कहना है कि वे हिन्दू नहीं हैं, अतः उन्हें एक अलग धार्मिक समुदाय की मान्यता दी जाए। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मांग को तवज्जो देते हुए इसके अध्ययन के लिए एक विशेष समिति का गठन कर दिया है, उधर भाजपा और संघ परिवार यह नहीं चाहते। उनके लिए एक जबर्दस्त धक्का है, क्योंकि लिंगायत हाल-फिलहाल के चुनावों में भाजपा के वोट बैंक थे। इसके अलावा सिद्धारमय्या ने बड़ी चतुरई से दलितों को भी समर्थन दिया है। अब पढ़िए इससे आगे)

लिंगायतों के भीतर विभाजन की जड़ें

बसावन्ना 12वीं सदी के समाज सुधारक थे। उन्होंने हिन्दू धर्म में जाति व्यवस्था और लिंगभेद को खारिज कर दिया था। उनके अपने वचन थे, जो हिन्दू धर्म के सिद्धान्तों के विकल्प बने। उन्होंने मंदिरों में पूजा-पाठ और यज्ञोपवीत जैसे ब्राह्मणवादी संस्कारों को धता बताते हुए एक माला में शिवलिंग की तस्वीर को गले में पहनने का प्रचलन शुरू किया। उनका कहना था कि इससे भक्त सीधे शिव के साथ संबंध कायम करता है। उन्होंने हिंदू धर्म के बहुदेववाद का विरोध किया और अनुभव-मंडप की अवधारणा को प्रतिपादित किया-एक भवन-जो लोकतंत्र का संस्थागत रूप होगा। और यहां सभी सार्वजनिक प्रश्नों पर आम जनमानस की भागीदारी से निर्बाध बहस होगी।

कई दलित, पिछड़े और उच्च जाति के लोगों ने बासव के सिद्धान्तों को स्वीकार किया। विजयनगर साम्राज्य के अन्तर्गत तेलगू-भाषी ब्राह्मणों ने लिंगायतों पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया। बाद के विद्वानों ने बासव और रामानुज जैसी सुधारवादी धाराओं के बारे में लिखा कि ये भाक्ति आन्दोलन का हिस्सा रहे हैं और ब्राह्मणवादी वर्चस्व की पुनर्स्थापना के लिए दलितों को ब्राह्मण में जाति-परिवर्तन कर रहे थे। बौद्ध धर्म से बासव की नज़दीकी को नहीं माना गया और बताया गया कि बगल के तमिल समाज में प्रचलित शैव न्यानमार परंपरा के साथ उसकी समानता है। हिन्दू धर्मपरायणता ने धीरे-धीरे बासव के अनुयाइयों को समाहित कर लिया, उन्हें वीरशिवादी कहा और लिंगायतों को हिन्दू धर्म के भीतर की एक जाति-विशेष का दर्जा दिया। यह ठीक वैसे ही किया गया जैसे बौद्ध और जैन धर्म को भी हिन्दू धर्म की उपधारा मान लिया गया था। पर बहुत सारे लिंगायतों ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया।

पर लिंगायतवाद भी एक अर्ध-धर्म के रूप में विकास करता रहा। यह एक संगठित धर्म का रूप ले रहा था-जैसे इसाइयों के पैरिश थे, इनके भी मठ थे। जन्म मृत्यु का पंजीकरण, विवाह और तलाक के फैसले, भूमि और व्यापारिक झगड़े, ये सारे मामले धर्मगुरुओं के द्वारा मठों में हल किये जाते। 1986 तक लिंगायतों के किसी भी हिस्से को पिछड़ी जाति के रूप में आरक्षण नहीं दिया गया। फिर भी लिंगायतों के पिछड़े हिस्से की तीव्र ख्वाहिश थी कि उन्हें अन्य पिछड़ी जाति के रूप में मान्यता प्राप्त हो। 1986 में जनता सरकार ने लिंगायतों और वोक्कलिगा, दोनों प्रभावशाली जातियों को आरक्षण के दायरे में ला दिया और 55 प्रतिशत् जनसंख्या को ओबीसी की श्रेणी में शामिल कर लिया। बाद में चिन्नप्पा रेड्डी आयोग ने इन्हें इस श्रेणी से बाहर कर दिया। पुनः, 2009 में, तत्कालीन येदियुरप्पा सरकार ने 19 लिंगायत उपजातियों को, जिसमें बनाजिगा, आराध्य और सदर लिंगायत शामिल थे, ओबीसी सूची में शामिल कर लिया। पर लिंगायतों में नाई हैं और धोबी भी, जो बहुत पिछड़े हुए और गरीब हैं। जो दलित लिंगायत बन गए उन्हें अब भी कई जगहों पर दलित ही माना जाता है। इन्हें किसी प्रकार का आरक्षण नहीं दिया जाता।

वे वीरशिवादी जो लिंगायतों को अलग धर्म के अन्तर्गत लाने का विरोध करते हैं यह आधार बनाते हैं कि संविधान के तहत नए धर्म के निर्माण का कोई प्रावधान नहीं है। दूसरी ओर जो लिंगायत अलग धर्म की मांग का प्रतिपादन करते हैं एक पुराने केस का हवाला देते हैं जिसमें रामकृष्ण मिशन को इस बिना पर जीत हासिल हुई थी कि वे पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते थे इसलिए हिन्दू धर्म का हिस्सा नहीं बन सकते, बल्कि वे एक धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय हैं; इसलिए वे मानते हैं कि लिंगायतों को भी कानूनी तौर पर यह स्थान मिल सकता है। अभी यह मामला कानूनी तौर पर तय नहीं हुआ है।

लिंगायत धर्मगुरु माते महादेवी। फोटो साभार : गूगल

माते महादेवी का ऐलान

माते महादेवी एक बेहद लोकप्रिय लिंगायत नेता थीं जिन्होंने एमए पास किया था और 1965 में धर्मगुरू बनीं। ये पहली ऐसी महिला थीं जिनको लिंगायतों में जगतगुरू का दर्जा मिला। वह केवल धर्मगुरू ही नहीं बल्कि विदुषी और धर्मशास्त्री भी हैं और जिनके अपने वचन हैं। उन्होंने प्रसिद्ध अक्कामहादेवी को अपना रोल-मॉडल बनाया और बालिकाओं के लिए शिक्षण संस्थान खोले। वह लिंगायत मठों के भीतर मठाधीशों द्वारा किये जा रहे महिला यौन शोषण के बारे में खुलकर बोलती थीं।

जुलाई के पहले सप्ताह में, बीजापुर में 2-3 लाख की रैली में उन्होंने घोषणा की कि लिंगायत हिन्दू नहीं थे और मांग की कि उन्हें अलग धर्म का दर्जा दिया जाए; यह लिंगायतों के मन को छू गया और तब से यह मुद्दा जैसे चल निकला। लिंगायत समुदाय में इसके कारण ध्रुवीकरण भी हुआ-वीरशिवादी, जो इस समुदाय का वर्चस्व वाला अभिजात्य हिस्सा है और अपने को उच्च जाति का शिव-भक्त हिन्दू समुदाय मानता रहा और बाकी बहुसंख्यक लिंगायत, जो अपने को बासवन्ना के सच्चे अनुयायी मानते हैं। बासवन्ना समाज सुधारक थे और जाति प्रथा बहुदेववाद के धुर विरोधी थे। इस नए ध्रुवीकरण ने ऐसा महामंथन पैदा किया कि पिछले दो महीनों से रैलियां और काउंटर-रैलियों का सिलसिला थम नहीं रहा।

बेंगलुरु में 21-24 जुलाई को सम्पन्न अंतर्राष्ट्रीय अम्बेडकर सेमिनार। फोटो साभार : गूगल

अंबेडकर सेमिनार

बेंगलुरु में 21-24 जुलाई को सम्पन्न अंतर्राष्ट्रीय अंबेडकर सेमिनार में पारित प्रस्ताव-

1.  विधि-शासन का सम्मान करो और भीड़-हत्या को रोकने के लिए राजनीतिक वैधानिक उत्तरदायित्व को पुनः प्रभावकारी करो।

2.  समान अवसर आयोग का गठन करो ताकि एस सी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए रोजगार में व्यापकतम प्रनिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।

3.  शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव के रोकथाम हेतु कानून का निर्माण हो।

4.  कानून में तमाम ऐसे प्रावधानों को हटाया जाए जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगाते हैं- जैसे मानहानि, देशद्रोह, कला/फिल्मों पर सेंसरशिप और सोशल मीडिया में भी सेंसरशिप।

5.  उच्च न्यायपालिका में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण।

6.  मीडिया घरानों में विविधता सुनिश्चित करने के लिए एससी, एसटी ओबीसी के प्रतिनिण्त्वि को प्रोत्साहित करना।

7.  मीडिया पत्रकारों की आज़ादी पर कट्टरपंथी ताकतों द्वारा हमलों से रक्षा करना और अनुक्त राज्य सेंसरशिप से बचाना।

8.  प्रेस काउंसिल को सशक्त बनाना ताकि वह कॉरपोरेट एकाधिकार और मीडिया में का्रॅस ओनरशिपको नियंत्रित कर सके।

9.  एक राष्ट्रीय कानून जो यह सुनिश्चित कर सके कि एससी एसटी की जनसंख्या के अनुपात में बजट का एक हिस्सा उनके विकास की योजनाओं को संचालित करने में लगे।

10. एक करोड़ रु. तक की सरकारी खरीद ठेकों में आरक्षण

11. एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं अल्पसंख्यकों के लिए अंग्रेजी मीडियम शिक्षा की व्यवस्था।

12. एससी, एसटी, ओबीसी के लिए हॉस्टलों की सकल अभिगम्यता।

13. प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण।

14. भूमिहीन दलितों के लिए कृषि भूमि जिसमें विधिसम्मत अधिकार और विशेष सहायता हो।

15. आधुनिकीकरण के माध्यम से जाति-आधारित व्यावसायिक धंधों में समग्र सुधार।

16. सामाजिक आर्थिक जातीय जनगणना का तत्काल प्रकाशन

17. किसान आय आयोग जो आय सुरक्षा की गारण्टी करे। 

यह बेंगलुरु घोषणा 2019 के लिए दलित घोषणापत्र का मूल आधार बन सकती है।

(लेख का पहला हिस्सा पढ़ने के लिए क्लिक करें- http://www.janchowk.com/statewise/karnataka-election-analysis/927)










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