भाजपा के लिए कर्नाटक जीतना टेढ़ी खीर!

चुनाव विश्लेषण , दक्षिण का झरोखा, सोमवार , 28-08-2017


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के रामचंद्रन

अप्रैल 2018 में कर्नाटक विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए कर्नाटक राजनीतिक रूप से उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा है।

आइये हम इस राज्य में चल रहे घटनाक्रम पर एक नज़र डालें-

लिंगायत समुदाय का सम्मेलन। फोटो साभार : गूगल

लिंगायतों पर दांव 

कर्नाटक में लिंगायत, जो कि राज्य की जनसंख्या का करीब 17 प्रतिशत हिस्सा हैं, जुलाई अगस्त 2017 में लगातार रैलियां करते नज़र रहे हैं; उनका कहना है कि वे हिन्दू नहीं हैं, अतः उन्हें एक पृथक धार्मिक समुदाय की मान्यता दी जाए। सिद्धारमैया का इस मांग को तवज्जो देते हुए इसके अध्ययन के लिए एक विशेष समिति का गठन करना मामले को बढ़ावा दे रहा है। यह भाजपा और संघ परिवार के लिए एक जबर्दस्त धक्का है, क्योंकि लिंगायत हाल-फिलहाल के चुनावों में भाजपा के वोट बैंक थे।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमय्या। फोटो साभार : गूगल

सी-फोर का सर्वे

दूसरी ओर सी-फोर एजेन्सी द्वारा 19 जुलाई से 10 अगस्त के बीच किये गए एक प्री-पोल सर्वे के परिणाम को इंडिया टुडे ने 20 अगस्त को प्रसारित किया। सर्वे के परिणाम ने खासी हलचल मचा दी है, क्योंकि वह कहता है कि यदि आज कर्नाटक में चुनाव करा दिये जाएं तो कांग्रेस की विजय निश्चित है। रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस को 120-132 सीटें और भाजपा को 60-72 सीटें मिलेंगी, जबकि देवेगौड़ा के जद (सेक्युलर) को 24-30 सीटें मिल सकती हैं।

बीजेपी नेता येदियुरप्पा। फोटो साभार : गूगल

येदियुरप्पा पर शिकंजा

तीसरी बात यह है कि जब कर्नाटक ने गुजरात के कांग्रेस विधायकों को अमित शाह के हॉर्स ट्रेडिंगसे बचने के लिए कांग्रेस मंत्री डी के शिवकुमार के संरक्षण में शरणगाह मुहय्या कराया, तब केंद्र की मोदी सरकार ने बदले की कार्रवाई-स्वरूप शिवकुमार के घर पर आयकर विभाग के छापे पड़वाए। पर ही शिवकुमार, कर्नाटक कांग्रेस पर कोई फर्क पड़ा। बल्कि सिद्धारमय्या ने येदियुरप्पा के विरुद्ध उनके मुख्यमंत्रित्व काल में बदनियती से कुछ भूमि की अधिसूचना रद्द करने के मामले में प्राथमिकी दर्ज करवा दी। येदियुरप्पा को लिंगायतों का मजबूत नेता माना जाता था; यही नहीं वह भाजपा के लिए मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी भी थे। पर इस कार्रवाई के बावजूद लिंगायत समुदाय की उनके पीछे किसी प्रकार की गोलबन्दी नहीं देखी गई। इसके मायने हैं कि येदियुरप्पा सहित भाजपा लिंगायतों के बीच अपना प्रभाव खो रही है, और लिंगायतों का यह विभाजन उनके लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

भाजपा-आरएसएस परेशान

केवल भाजपा, बल्कि आरएसएस भी लिंगायतों की नई मांग से परेशान है। इस संकट के परिणमस्वरूप मोहन भागवत खुद कर्नाटक भागे गए और वीरशिवादियों अन्य लिंगायतों की एकता पर प्रवचन देने लगे कि दोनों ही हिन्दू धर्म के अनुयायी हैं। 22 अगस्त, 2017 को लाखों लिंगायतों ने इस दावे का जवाब बेलगांव रैली में दिया, जिसमें करीब 100 लिंगायत मठाधीश शरीक हुए। मोहन भागवत को सार्वजनिक तौर पर चेतावनी दी गई कि वह उनके निजी मामलों में दखल दें। भाजपा चीखने लगी कि सिद्धारमय्या षड़यंत्र कर रहे हैं और उसने कोशिश भी की कि किसी तरह से वीरशिवादियों के छोटे से अभिजात्य हिस्से के माध्यम से काउंटर-रैलीका आयोजन किया जाए और एकता की बात दोहराई जाए।

येदियुरप्पा ने खुलकर सिद्धारमय्या कांग्रेस की आलोचना की और कहा कि लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा नहीं दिया जा सकता। पर यह वक्तव्य उनपर भारी पड़ गया क्योंकि सिद्धारमय्या ने 2013 का एक पुराना ज्ञापन सार्वजनिक कर दिया जिसमें मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लिंगायत समुदाय के लिए अलग धर्म की वकालत की थी। पूर्व सीएम का माखौल बन गया।

कर्नाटक की जातीय संरचना

लिंगायतों के बीच विभाजन सी-फोर के चुनाव-पूर्व सर्वे में स्पष्ट दिखाई पड़ता है। कर्नाटक के मतदाताओं की जातीय संरचना इस प्रकार है। लिंगायत समुदाय 17 प्रतिशत है, वोक्कालिगा या गौड़ा 14 प्रतिशत हैं और बड़ा हिस्सा देवेगौड़ा के जद सेक्युलर के साथ हैं; कुछ जरूर कांग्रेस को वोट देते हैं। कर्नाटक के मतदाताओं में मुसलमान 13 प्रतिशत हैं, दलित 23 प्रतिशत और इसाई 2 प्रतिशत। ओबीसी 22 प्रतिशत हैं जिनमें कुरुबा समुदाय प्रमुख है और 8 प्रतिशत है। इसी समुदाय से आते हैं सिद्धारमय्या (ये लोग पहले चरवाहे थे, अब कृषक हैं।)

पहले भाजपा अपने बल पर या फिर देवेगौड़ा के पुत्र,कुमारस्वामी के साथ गठबंधन कायम करके वोक्कलिगा वोट लेकर जीतती थी। बहुसंख्यक लिंगायत और वोक्कलिगा सवर्ण हैं, और उनकी गोलबंदी (लगभग 31 प्रतिशत) भाजपा की विजय सुनिश्चित करती थी। इसके अलावा दलित और ओबीसी (अयोध्या मामले के प्रभाव से जिन्हें साथ लाया जा सका) मिल गए तो भाजपा जीत जाती। यानी बाद में जब दलित और ओबीसी की भाजपा के साथ गोलबन्दी हुई तो वह बिना गठबन्धन के साथ जीतने लायक बन गई। यह मुख्यतः दलित मतदाताओं के समर्थन से संभव होगा।

सिद्धारमय्या ने दलितों को साथ लिया

सिद्धारमय्या ने बड़ी चतुरई से दलितों को समर्थन दिया है। उन्होंने पोरु कर्मकारों (सफाई कर्मचारियों), जो अधिकतर दलित हैं, का न्यूनतम वेतन 13,000 रुपये मासिक कर दिया है। 1200 कर्मकारों को उन्होंने घूमने के लिए सिंगापुर भेजा। उन्होंने दलितों द्वारा खेती के लिए उपयोग किये जा रहे सार्वजनिक और पोराम्बोक (जो राजस्व रिकार्ड में शामिल हो) भूमि का नियमितीकरण किया। उन्होंने दलितों को घर बनाने के लिए भूमि आवंटित की। दलित परिवारों के बच्चों को लैपटॉप दिये गए। उन्होंने दलितों के लिए 50 प्रतिशत् कोटा की मांग भी रखी। बंगलुरु में उन्होंने एक भव्य अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित करवाया, जिसमें राहुल गांधी को वक्ता के रूप में और मार्टिन लूथर किंग जूनियर के बेटे को मुख्य अतिथि बनाया। इस सेमिनार में मार्क्सवादी चिंतक प्रभात पटनायक, नक्सल-समर्थक ऐक्टिविस्ट हरगोपाल, अम्बेडकर के पौत्र आनन्द तेलतुम्ड़े जैसे दिग्गज वक्ता आये। कर्नाटक ऐसा एकमात्र राज्य है जिसमें हाशिये पर जी रहे दलितों ने कांग्रेस को पूरी तरह अपना लिया है। सेमिनार में पारित प्रस्तावों को देखकर समझा जा सकता है कि अखिल-भारतीय स्तर पर कांग्रेस का उभरता दलित घोषणापत्र क्या होगा। कर्नाटक के लिए अलग झंडे की मांग करके और मेट्रो स्टेशनों पर हिन्दी में लिखे साइनबोर्ड हटवाकर सिद्धारमय्या ने भाजपा की केंद्रीय सत्ता के खिलाफ कर्नाटक की देशीय भावना को जगा दिया है।

सी-फोर सर्वे से पता चलता है कि कांग्रेस को 41 प्रतिशत वोट मिलेंगे और भाजपा को 32 प्रतिशत। जद (सेक्युलर) को 17 प्रतिशत मत मिलेंगे। इससे साफ जाहिर है कि कांग्रेस ने सिर्फ भाजपा के चंगुल से दलितों को छीन लिया है, बल्कि पिछड़ी जाति के एक बड़े हिस्से को भी गोलबन्द कर लिया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सिद्धारमय्या का मुस्लिम-दलित-पिछड़ा प्लैंक कारगर साबित हुआ है।

भाजपा की वोक्कलिगा पर निगाह

अलगाव में पड़ी भाजपा अब वोक्कलिगा लिंगायतों को मोहने के लिए बेकरार है। आज यदि जद सेक्युलर और भाजपा किसी प्रकार एकताबद्ध हो भी जाएं तो मतदाताओं को जीत नहीं सकते क्योंकि इन दो दलों के गठबन्धन-सरकार के भीतर की आंतरिक कलह को वे बहुत नज़दीकी से देख झेल चुके हैं। इसके अलावा जद सेक्युलर के मतदाता/वोक्कलिगा भौगोलिक रूप से दक्षिण कर्नाटक के पुराने मैसूर वाले सीटों में ही सिमटे हुए हैं। वे समान रूप से पूरे कर्नाटक में फैले हुए नहीं हैं, जबकि अन्य लिंगायत उत्तर कर्नाटक में केंद्रित हैं। यदि हम अंकगणित के हिसाब से इन मतों को जोड़ भी दे तो वह उसी अनुपात में सीटों की वृद्धि में परिणित नहीं होता, जबकि लिंगायत मतदाताओं में विभाजन होना भाजपा के लिए नुकसानदेह जरूर साबित होगा।

संघ-पक्षधर मीडिया टिप्पणीकारों के बीच कुछ फैशन सा हो गया है कि वे समय-पूर्व अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस का मृत्युलेख लिखने में लग गए। पर सिद्धारमय्या ने दावा किया है कि कांग्रेस की पुनरुत्थान-यात्रा कर्नाटक से ही आरम्भ होगी। कर्नाटक में कांग्रेस विजय अखिल भारतीय स्तर पर पार्टी के पुनरुत्थान का कारण बनती है या नहीं यह तो देखने की बात है, पर यह तो स्पष्ट है कि भाजपा ने कर्नाटक में विजय का अवसर खो दिया है।

जारी... 

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)










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