नफरत और घृणा नहीं, जहां बहती है प्रवासियों के लिए प्रेम और भाईचारे की गंगा

स्पेशल रिपोर्ट , मुवत्तुपुझा, एरनाकुलम, शुक्रवार , 22-02-2019


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महेंद्र मिश्र

मुवत्तुपुझा, एरनाकुलम। प्रवासी शब्द नफरत और घृणा का पर्याय बन गया है। वह दुनिया का कोई हिस्सा हो या फिर देश के भीतर का कोई क्षेत्र। सभी जगहों के लिए यह बात 100 फीसद सच है। खुद को देश का असली वारिस बताने वाले सूबे तक इससे अछूते नहीं रहे। क्षेत्र और भाषा के नाम पर प्रवासियों के खिलाफ घृणा और नफरत फैलाना जैसे उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। इस मामले में अभी तक सबसे ज्यादा बदनाम महाराष्ट्र था। मुंबई तो भैइया लोगों की पिटाई के लिए ही जानी जाती है। लेकिन ये बीमारी अब महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रही। बेरोजगारी की मार ने इसे दूसरे सूबों तक विस्तार दे दिया है। भारत का हृदयस्थल समझे जाने वाले सूबे तक इसकी चपेट में हैं।

एमपी के नवनियुक्त मुख्यमंत्री कमलनाथ का बयान उस सयम पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था जब उन्होंने सूबे की बेरोजगारी के लिए यूपी के प्रवासियों को जिम्मेदार ठहरा दिया था। लेकिन इन सब स्थितियों और माहौल के बीच एक सूबा ऐसा भी है जो न केवल प्रवासी मजदूरों के लिए आदर्श बन गया है बल्कि इन सभी राज्यों को भी राह दिखाने का काम कर रहा है। केरल में प्रवासी मजदूरों के लिए न केवल उत्साहवर्धक और भाई-चारे का माहौल है बल्कि उनको सूबे में हर तरीके से सम्मानजनक जीवन हासिल है। इस मामले में सरकार की भूमिका बेहद अहम है। जिसके तहत उसने पहल कर अपने घरों से दूर रहने वाले इन मजदूरों के लिए कई तरह की योजनाओं की घोषणा की है।

सम्मेलन में मौजूद प्रवासी मजदूर।

इनमें न केवल स्वास्थ्य सुविधाएं, बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था और आवास जैसी सुविधाएं शामिल हैं बल्कि किसी दुर्घटना या फिर स्वाभाविक मौत पर तमाम ऐसी इमरजेंसी सुविधाएं देने का प्रावधान है जो किसी दूसरे सूबे में उसके सामान्य नागरिकों को भी मयस्सर नहीं है। केरल पहला सूबा है जिसने प्रवासियों के  लिए इस तरह की कोई योजना बनाई है।

केरला प्रवासी कामगार कल्याण योजना के नाम से जानी जाने वाली ये स्कीम 2010 में शुरू की गयी थी। इसके तहत शुरुआत में प्रवासी मजदूरों के लिए चार क्षेत्रों में सुविधाओं की घोषणी की गयी थी। योजना में किसी मजदूर के किसी दुर्घटना में घायल होने या फिर उसकी मौत होने पर मुवाअजे का प्रावधान है। जिसमें घायल होने पर 25000 रुपये और मौत पर 1 लाख तक परिवार को मुआवजा देने की बात शामिल है। प्रवासी मजदूरों के बच्चों की शिक्षा के लिए योजना में अलग से फंड की व्यवस्था की गयी है। इसके तहत बच्चों को भत्ता देने का प्रावधान है।

इस मामले में एक और अनूठी व्यवस्था की गयी है। जिसके तहत कोई मजदूर अगर सूबे में पांच साल मजदूरी करने के बाद उसे छोड़ने का फैसला करता है तो उसे एकमुश्त 25000 रुपये देने का प्रावधान है। एक ऐसे समय में जब दूसरे सूबे चाहते हैं कि प्रवासी मजदूर उनके यहां न आएं तब केरल में ये प्रावधान न केवल उनके स्वागत की गारंटी करता है बल्कि उनके यहां बने रहने पर अतिरिक्त पैसे और सुविधाएं देकर एक नायाब उदाहरण पेश कर रहा है। इतना ही नहीं संयोग से अगर किसी मजदूर की काम के दौरान मौत हो जाती है तो सरकार उसके शव को न केवल उसके गृहराज्य भेजने की व्यवस्था करती है बल्कि उसके शव पर लेपन से लेकर हवाई यात्रा का खर्च भी उठाती है। सीपीएम के स्थानीय विधायक एल्दो अब्राहम ने बताया कि दूसरी और क्या सुविधाएं प्रवासी मजूदरों को दी जा सकती हैं सरकार उस पर काम कर रही है।

इस मौके पर आयोजित स्वास्थ्य शिविर।

इस योजना का लाभ उठाने के लिए किसी मजदूर को सबसे पहले उसके लिए अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इसके लिए शासन ने 30 रुपये की सदस्यता शुल्क रखा है। लेकिन अभी तक देश के दूसरे हिस्सों से सूबे में काम करने वाले 25 लाख मजदूरों में केवल तकरीबन 50 हजार ने ही अपना रजिस्ट्रेशन कराया है। इस योजना के तहत एरनाकुलम जिले में तैनात एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एक्जीक्यूटिव अफसर टीए सुलेमान ने बताया कि जिले में कुल 8200 प्रवासी मजदूर हैं जो सूबे में प्रवासी मजदूरों की सबसे ज्यादा संख्या है। उनका कहना था कि सभी ने सदस्यता हासिल कर ली है। इसमें तकरीबन 500 सदस्य अपनी सदस्यता का नियमित तौर पर नवीनीकरण करते हैं। जो बीच में मजदूरी छोड़कर जाने पर एकमुश्त रकम हासिल करने लिए जरूरी होता है। सुलेमान का कहना था कि इस सुरक्षा योजना के तहत ज्यादा से ज्यादा मजदूरों को ले आने के लिए सरकार ने अब पंफलेट और आवेदन पत्र को हिंदी में लाने का फैसला किया है।   

इसी कड़ी में शुक्रवार को एरनाकुलम जिले के मुवत्तपुजा में प्रवासी मजदूरों का एक सम्मेलन हुआ। स्थानीय म्यूनिसपल बाडी की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में हजारों की तादाद में प्रवासी मजदूरों ने हिस्सा लिया। म्यूनिसिपल कारपोरेशन के पदाधिकारी केवी जोश ने इस योजना पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ये योजना वैसे तो 1990 से शुरू करने का प्रयास किया जा रहा था। लेकिन बीच में इसमें ढेर सारी बाधाएं आयीं। जिसके चलते इसे पास होने में समय लग गया।

बीच में 1996 में एक बार फिर इस दिशा में प्रयास किया गया लेकिन वो भी नाकाम रहा। आखिर में 2010 में जब सूबे में वीएस अच्युतानंदन की सरकार बनी तब उसको जमीन पर उतारने में सफलता मिली। उसके बाद से इसमें न केवल कई तरह के सुधार किए गए बल्कि योजना को और विस्तार और गहराई दी गयी। इस योजना में एक बात और शामिल है कि अगर कोई मजदूर लगातार तीन सालों तक सूबे में काम कर लेता है तो बाद में वो 1000 रुपये प्रतिमाह पाने का हकदार हो जाता है। 

इस मौके पर असम से आए प्रवासी मजदूर इलियास खान ने बताया कि वह एरनाकुलम जिले में स्थित एक प्लाईवुड कंपनी में काम करते हैं और उन्हें वहां किसी तरह के भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता है।  180 मजदूरों वाली इस कंपनी में ज्यादातर मजदूर असम और ओडिशा से हैं। हालांकि वो पिछले छह महीनों से ही अभी केरल में हैं। लेकिन उन्हें इस स्कीम के बारे में जानकारी नहीं है।

ओडिशा से आए अमरेश भी जिनकी उम्र महज 19 साल है, एक प्लाइवुड कंपनी में काम करते हैं। उन्हें मजदूरी के तौर पर प्रति सप्ताह 3000 रुपये मिलते हैं साथ ही रहने की सुविधा हासिल है। लेकिन उन्हें भी इस योजना के बारे में जानकारी नहीं है। जिससे ये निष्कर्ष निकलता है कि अभी इस योजना का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार होना बाकी है। बाहर से आए ज्यादातर मजदूर प्लाईवुड, सिलाई, खेती, निर्माण और मछली पालन के क्षेत्र में काम करते हैं।

ये खुद अपने आप में विडंबना है कि जिस केरल के सबसे ज्यादा लोग प्रवासी हैं उसके यहां प्रवासी मजदूरों की तादाद उससे भी ज्यादा है। एक आंकड़े के मुताबिक यहां तकरीबन 25 लाख प्रवासी मजदूर हैं। जिनमें से ज्यादातर संख्या असम, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, यूपी और बिहार की है। 2014 के एक आंकड़े के मुताबिक इससे तकरीबन 17 हजार करोड़ रुपये सालाना सूबे से बाहर जाता है।  उसके साथ ही सूबे के तकरीबन 24 लाख लोग देश-दुनिया के दूसरे हिस्सों में प्रवासी का जीवन गुजार रहे हैं। इसमें देश के भीतर के साथ एक बड़ा हिस्सा मध्यपूर्ण और मलेशिया में है। तिरुअंतपुरम आधारित सेंटर फार डेवपलमेंट स्टडीज के एक आंकड़े के मुताबिक 2014 में गैर प्रवासी केरलियों के इस हिस्से ने सूबे की आय में 72 हजार करोड़ रुपये का योगदान दिया था।










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