कब साकार होगा मजदूर एकता का सपना !

सवाल दर सवाल , , चयन करें , 06-05-2018


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डॉ. राजू पाण्डेय

रायगढ़। मजदूर आंदोलन को विभक्त करने की रणनीति पुरानी है और कारगर भी। यह इतनी सफल है कि बहुत सारे मजदूरों को न केवल उनके अन्य साथी, अधिकारी- कर्मचारी या प्रबंधक समझ कर स्वयं से अलग कर देते हैं अपितु ये स्वयं भी खुद को सामान्य मजदूरों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं और इन्हें हीन दृष्टि से देखते हैं। दशकों पुराने श्रम कानूनों की श्रमिकों एवं उनके अधिकारों की परिभाषा में आज के ढेरों संस्थानों और उनमें कार्यरत श्रमिकों का समावेश नहीं हो पाता है। इन कानूनों में संशोधन कर श्रमिक की परिभाषा को व्यापक बनाने का कोई प्रयास होता नहीं दिखता। इन कानूनों की संकीर्णता और अपूर्णता के कारण बारम्बार न्यायालयों से श्रमिक और उनके अधिकारों के संबंध में दिशानिर्देश मांगा गया है किन्तु न्यायालयों के निर्णयों से श्रमिकों को कोई लाभ हुआ हो ऐसा नहीं लगता। 

विभिन्न न्यायालयीन निर्णयों के अनुसार यदि  व्यक्ति के कार्य में सृजनात्मक अथवा काल्पनिक मानसिक शक्ति की आवश्यकता है तो उसके कार्य को कुशल, अकुशल या क्लेरिकल नहीं माना जा सकता है। अतः ऐसा व्यक्ति श्रमिक की श्रेणी में नहीं आता। कुछ निर्णयों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रशासनिक अथवा प्रबंधकीय कार्य करने वाला व्यक्ति श्रमिक नहीं है। न्यायालय के कतिपय निर्णयों से यह भी परिलक्षित होता है कि प्रशिक्षु श्रमिक स्थायी श्रमिकों की भांति अधिकार नहीं रखता। यह भी देखा गया है कि ऐसे विवादों में श्रम न्यायालय द्वारा मजदूरों के पक्ष में दिए गए निर्णय उच्चतर न्यायालयों द्वारा पलटे गए हैं।

श्रम को सेवा की श्रेणी में रखकर मजदूरों को कर्मचारियों का दर्जा देना भी एक रणनीति रही है जिसके द्वारा श्रमिक आंदोलन की व्यापकता और उसकी एकजुटता को प्रभावित किया गया है। एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज और नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन द्वारा भी आंकड़ों के एकत्रीकरण के समय श्रमिक और कर्मचारी में अंतर करते हुए अनेक श्रमिकों को कर्मचारी की श्रेणी में रखा जाता है। इनकी परिभाषा के अनुसार प्रशासनिक कार्यालय, स्टोर-कीपिंग विभाग, जनकल्याण विभाग, सेल्स विभाग आदि में कार्यरत एवं कारखाने हेतु कच्चा माल अथवा स्थायी संसाधन की खरीददारी करने वाले और कारखाने की रक्षा एवं निगरानी करने वाले व्यक्ति कर्मचारियों की श्रेणी में आएंगे श्रमिकों की श्रेणी में नहीं।

जब श्रमिकों को कर्मचारियों का दर्जा दे दिया जाता है तो न केवल उनके अधिकारों में कटौती होती है वरन उन पर अनेक प्रकार की पाबंदियां भी लगाई जा सकती हैं। फैक्ट्री अधिनियम में बैंकिंग, आईटी एवं मीडिया जैसे क्षेत्र सम्मिलित नहीं होते अतः यहां कार्यरत व्यक्ति 12 घंटे तक कार्य करने के बाद भी ओवरटाइम आदि के लाभ से वंचित रहते हैं। बैंकिंग क्षेत्र में कार्यरत लोगों को अधिकारी का पदनाम देकर उन्हें श्रमिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। 

उद्योग की परिभाषा में भी अनेक पेंच हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1948 के अनुसार उसी इकाई को उद्योग का दर्जा मिल सकता था जिसमें विद्युत से चलने वाली इकाई के संदर्भ में 10 और विद्युत से न चलने वाली इकाई के संदर्भ में न्यूनतम 20 श्रमिक कार्यरत हों। इस कारण लाखों श्रमिक केवल इसलिए अपने अधिकारों से वंचित रह गए क्योंकि उनके मालिकों ने इस न्यूनतम संख्या के नियम का लाभ उठाया। औद्योगिक विवाद अधिनियम की परिधि में कृषि मजदूर और घरेलू मजदूर नहीं आते। इसके अंतर्गत चैरिटेबल संस्थाओं, खादी ग्रामोद्योग उपक्रमों तथा अस्पतालों एवं डिस्पेंसरियों में कार्यरत श्रमिक भी नहीं आते हैं। एम्प्लाइज स्टेट इंश्योरेंस अधिनियम में भी ठेका श्रमिकों या 10 से कम श्रमिकों वाले संस्थानों में कार्यरत श्रमिकों को सम्मिलित नहीं किया गया है। अतः ये इसके लाभों से वंचित हैं।

हाल के महीनों में मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित अनेक श्रम सुधार चर्चा में रहे- उद्योग का दर्जा पाने के लिए विद्युत परिचालित इकाई के लिए श्रमिकों की आवश्यक संख्या 20 और विद्युत से परिचालित न होने वाली इकाई के लिए 40 करना, अप्रेंटिसशिप एक्ट में संशोधन कर इसे लागू नहीं करने वाले नियोक्ताओं की गिरफ्तारी के प्रावधान को शिथिल कर पांच सौ रुपए जुर्माने तक सीमित करना, मजदूरों को बिना सरकारी अनुमति के कार्य से हटाने के अधिकार को सौ मजदूरों वाली इकाइयों से विस्तारित कर तीन सौ मजदूरों वाली इकाइयों को देना, ट्रेड यूनियनों की मान्यता के नियमों को कठोर बनाना, ट्रेड यूनियनों में बाहरी पदाधिकारियों पर रोक, लघु औद्योगिक संस्थान का दर्जा प्राप्त करने हेतु आवश्यक मजदूरों की संख्या को 19 से बढ़ाकर 40 करना, इन्हें रजिस्टर मेन्टेन करने और विवरणी फाइल करने के दायित्व से मुक्त कर अप्रत्यक्ष रूप से 16 मजदूर हितैषी श्रम कानूनों के पालन से छूट प्रदान करना, भोजनावकाश के साथ काम के घंटों को 8 से बढ़ाकर 12 घंटे तक करना, ओवरटाइम के घंटों को 50 घंटे प्रति तिमाही से बढ़ाकर 100 घंटे करना, सवैतनिक वार्षिक अवकाश की पात्रता को 240 दिनों से घटाकर 90 दिन करना, वेतन भुगतान अधिनियम में संशोधन कर उद्योगपतियों को अपने संस्थान की वेतन दरें खुद तय करने का अधिकार देना, महिलाओं के नाईट शिफ्ट में काम करने पर प्रतिबंध को समाप्त करना, फैक्ट्री मालिकों को इस आशय की स्वसत्यापित विवरणी भरने का अधिकार देना कि उनके उद्योग में सभी कानूनों का पालन किया जा रहा है, एम्प्लायर की परिभाषा को इस प्रकार परिवर्तित करना कि वह ठेका श्रमिकों के उत्तरदायित्व से मुक्त हो सके, श्रम रजिस्टरों की संख्या 56 से घटा कर 5 करना, समान वेतन के अधिकार को लैंगिक असमानता तक सीमित करना, फैक्ट्री अधिनियम का दायरा निर्धारित करने हेतु राज्य सरकारों को मजदूरों की संख्या तय करने का अधिकार देना आदि।

इनमें से अनेक श्रम सुधार चुनावी तकाजों और ट्रेड यूनियनों के विरोध के कारण लागू नहीं किए जा सके हैं और कई पिछले दरवाजे से लागू किए जा रहे हैं। सरकार ने इन श्रम सुधारों को आवश्यक बताते हुए इनके पक्ष में आकर्षक तर्क दिए - वर्षों पुराने श्रम कानूनों की अप्रासंगिकता का तर्क इनमें सर्वोपरि था। किंतु सरकार के श्रम सुधार मजदूरों के अधिकारों में कटौती करने वाले और मजदूरों को विभाजित करने वाले हैं। इनका मुख्य उद्देश्य कॉर्पोरेट निवेशकों की राह सरल करना है।

विरोध के बावजूद सरकार 38 श्रम कानूनों में निवेशक मित्र संशोधन कर इन्हें 4 कोड में समाविष्ट करने के एजेंडे पर चालाकी और धैर्य के साथ कार्य कर रही है। देश के 12 सेंट्रल ट्रेड यूनियन आर्गेनाइजेशनस में से 10 स्पष्टतया राजनीतिक दलों से जुड़े हैं। वैसे भी भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन का अभ्युदय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हुआ और ट्रेड यूनियनों का प्रारंभिक नेतृत्व राजनेताओं ने ही किया था। राजनीतिक दल मोटे तौर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण के समर्थक हैं। वामदल चीन के जिस विकास मॉडल से प्रेरित होते हैं वह भी विदेशी निवेश का विरोधी नहीं है और वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था का लाभ उठाने पर आधारित है।

सरकार जान रही है कि ट्रेड यूनियनों की पहली प्रतिबद्धता अब राजनीतिक दलों के प्रति है न कि श्रमिकों के प्रति। इसलिए प्रारंभ में उनका संगठित और उग्र लगने वाला विरोध धीरे धीरे अपनी त्वरा खो देता है। जब ट्रेड यूनियनें मजदूर हितों का परित्याग कर पार्टी लाइन का अनुसरण करती नजर आती हैं तो मन में यह संदेह उठना स्वाभाविक है कि इनके द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन कहीं अपने जनाधार को बचाए रखने की रणनीति का एक भाग तो नहीं। 

वामपंथ की छवि मजदूरों के निर्विवाद समर्थक और हितचिंतक की है लेकिन पिछले वर्षों में अन्य दलों ने ट्रेड यूनियन आंदोलन में वामपंथ के एकछत्र आधिपत्य को चुनौती दी है और वे इसके प्रभाव को कम करने में सफल भी रहे हैं। वामपंथी ट्रेड यूनियनों की एकरस रणनीति और अर्थवाद (वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी तक सीमित हो जाना) ने भी इन्हें कमजोर किया। यह भी सत्य है कि वामदल नवीं से चैदहवीं लोकसभा में अच्छा संख्याबल और कई बार निर्णायक समर्थन रखते हुए भी कॉरपोरेटीकरण के रथ को रोक पाने में असफल रहे।

ट्रेड यूनियन नेताओं की लोकप्रियता और जनाधार में कमी आई है। एक अध्ययन यह बताता है कि जहां 1971 में 21 प्रतिशत सांसद ट्रेड यूनियन की पृष्ठभूमि से आते थे वहीं 1996 में यह संख्या 7.7 प्रतिशत और 2004 में 3.9 प्रतिशत रह गई। यदि राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में देखें तो चैदहवीं लोकसभा में 59 सांसदों के उच्चतम स्तर पर पहुंचे वाम दलों की लोकप्रियता अचानक घटी और पंद्रहवीं लोकसभा में यह संख्या 24 और 16 वीं लोकसभा में यह 12 रह गई। प्रादेशिक स्तर पर देखें तो वामपंथ के दो अभेद्य दुर्ग पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा वामपंथ ने 2011 और 2018 में गंवा दिए।

ऐसा नहीं है कि वामपंथ ने इस हमले के प्रतिकार के लिए अपनी रणनीति में परिवर्तन नहीं किया है। महाराष्ट्र और देश के अन्य भागों में चल रहे किसान आंदोलनों को नेतृत्व प्रदान करने में वाम ट्रेड यूनियनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह एक ऐसा कदम है जिससे ट्रेड यूनियन आंदोलन को नई जमीन मिलेगी। किन्तु देश के विभिन्न भागों में चल रहे किसान आंदोलनों को संगठित कर उनके क्षेत्रीय स्वरूप को एक राष्ट्रव्यापी किसान प्रतिरोध में परिवर्तित करने का कठिन कार्य अभी बाकी है। एक दूसरा अहम बदलाव जो वामपंथ ने अपनी रणनीति में किया-

वह आर्थिक शोषण और जातीय पहचान को संयुक्त करने का है। जय भीम- लाल सलाम का नारा यह दर्शाता है कि सामाजिक शोषण और आर्थिक शोषण हमारे देश में अपरिहार्य रूप से अन्तर्सम्बन्धित हैं। किंतु जातिवादी अस्मिता का प्रवेश श्रमिक आंदोलन के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।“दुनिया के मजदूरो एक हो” की व्यापकता से जातिवाद की संकीर्णता में प्रवेश वामपंथ की मूल प्रवृत्ति के अनुकूल नहीं है।

यदि श्रमिक आंदोलन जातीय रूप से विभक्त हो जाए तो यह ऐसी क्षति होगी जिसकी भरपाई कर पाना असंभव होगा। जिन दलित मतदाताओं के समर्थन की आशा वामपंथ कर रहा है वे यदि फासीवादी शक्तियों द्वारा चलाए जा रहे सांस्कृतिक अभियानों से प्रभावित होकर उधर आकर्षित होते हैं( जैसा हुआ भी है) और आर्थिक मुद्दों को गौण मानकर जातीय आधार पर मतदान करना जारी रखते हैं तो यह वामपंथ की आशाओं पर पानी फेरने वाला होगा। 

ट्रेड यूनियन आंदोलन वैसे ही केवल उन 7 प्रतिशत मजदूरों का प्रतिनिधित्व करता है जो संगठित क्षेत्र में हैं। असंगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले शेष 93 प्रतिशत मजदूरों में उसे अभी अपनी पैठ बनानी है लेकिन इसके लिए आवश्यक इच्छा शक्ति का उसमें अभाव दिखता है। नब्बे के दशक में प्रारंभ हुए उदारीकरण के बाद से ठेका मजदूर विनिमयन एवं उन्मूलन अधिनियम की धारा 10 का मखौल उड़ाते हुए कॉरपोरेट्स द्वारा स्थायी प्रकृति के कार्यों हेतु भी ठेका मजदूरों का नियोजन किया जाता रहा। जब अपने मुनाफे के लिए कॉरपोरेट्स सारे श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ा रहे थे तब सरकार का मौन संरक्षण उन्हें प्राप्त था। इस कालावधि में ट्रेड यूनियन आंदोलन की भूमिका भी संदिग्ध रूप से शालीन रही। आंकड़े बताते हैं कि आज सार्वजनिक क्षेत्र में 50 प्रतिशत और निजी क्षेत्र में 70 प्रतिशत मजदूर ठेके पर काम करते हैं। कृषि मजदूरों की हालत इतनी दयनीय है कि ये सरकारी आंकड़ों में भी स्थान पाने को जूझ रहे हैं, सरकारी कानूनों और योजनाओं के लाभ प्राप्त करना तो बहुत दूर की बात है।

एक धारणा यह भी बनाई जा रही है कि श्रमिक वर्ग अब निर्धन नहीं रहा और अब वह आर्थिक-सामाजिक-शैक्षिक रूप से मध्यम वर्ग में प्रवेश की पात्रता अर्जित कर रहा है। यह धारणा कितनी सत्य है यदि इसकी पड़ताल न भी की जाए तब भी यह तो कहा ही जा सकता है कि निर्धन श्रमिक वर्ग इस धारणा का शिकार हो बतौर मतदाता अपने वर्गीय हितों की अनदेखी कर रहा है। श्रमिक और निर्धन परिवारों को सीधे लाभ प्रदान करने वाली योजनाएं उनकी दीर्घकालिक उन्नति में योगदान न देते हुए भी उन्हें तात्कालिक आनंद की इतनी खुराक देती रहती हैं कि उनका आक्रोश संगठित और संघनित नहीं हो पाता।जब तक मजदूरों में यह बिखराव बना रहेगा तब तक उनकी आवाज को दबाया और कुचला जाता रहेगा। इस बिखराव को बढ़ाने की सरकारों और पूंजीपतियों की कोशिशों को नाकामयाब करने की कोई सार्थक पहल भी होती नहीं दिखती।

 (सामयिक विषयों पर सार्थक टिप्पणी करने वाले राजू पांडे छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं। )








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