छत्तीसगढ़ में भू-राजस्व संहिता संशोधन विधेयक का भारी विरोध, जगह-जगह प्रदर्शन

बड़ी ख़बर , रायपुर/बस्तर, शनिवार , 23-12-2017


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तामेश्वर सिन्हा

रायपुर/बस्तर। छत्तीसगढ़ में भू-राजस्व संहिता संशोधन, 2017 विधेयक पारित होने के 24 घंटे के भीतर ही प्रदेश में इसका जगह-जगह विरोध होने लगा है। आदिवासी समाज ने इसे काला कानून बताते हुए तुरंत वापस लेने की मांग की है। इसके विरोध में आज जगह-जगह मुख्यमंत्री रमन सिंह का पुतला भी फूंका गया। 

 

आदिवासियों ने कहा- सरकार ने किया राजद्रोह! 

संविधान के उल्लंघन में दर्ज कराएंगे मुकदमा

“आदिवासियों की ज़मीन छीनने की कोशिश” 

 

विपक्ष के विरोध के बीच पास किया विधेयक

विधानसभा के शीतकालीन सत्र में 21 दिसम्बर को विपक्ष के भारी विरोध के बीच रमन सरकार की ओर से इस संशोधन विधेयक को पारित किया गया। राजस्व मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय ने संशोधन विधेयक पेश करते हुए कहा कि भू अर्जन की प्रक्रिया सरल होने से विकास में आ रही अड़चनें दूर होंगी। विधेयक के पक्ष में 43 और विपक्ष में 31 मत पड़े।

छत्तीसगढ़ में भू-राजस्व संहिता संशोधन, 2017 विधेयक के विरोध में प्रदर्शन।

 

मुख्यमंत्री का पुतला फूंका 

बस्तर संभाग के कांकेर, जगदलपुर, कोंडागांव,  दंतेवाड़ा जिलों के सर्व आदिवासी समाज ने इस संशोधन विधेयक का विरोध करते हुए आज प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का पुतला फूंका। समाज में आदिवासी मंत्रियों को लेकर भी काफी रोष है, कि उनके होते हुए इस तरह आदिवासी विरोधी कानून पारित किया गया।

 

‘काला कानून’

आदिवासी समाज ने इसे संविधान का उल्लंघन बताते हुए काला कानून कहा है। उनके मुताबिक यह संविधान के अनुच्छेदों के विपरीत राजद्रोह का अपराध है। यही नही संविधान का उल्लंघन व अनिष्ठा करने पर राज्य सरकार के आई.पी.सी 124 (क) धारा के तहत पूरे राज्य, संभाग व गांव-गाँव में मुकदमा दर्ज करने की बात कही है।

आदिवासी समाज के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि छत्तीसगढ़ सरकार का यह संशोधन भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(5),19(6), 244(1) 147, 275, 368,13(3) क के प्रावधानों पर सीधा प्रतिघात है। यह संशोधन संविधान की मूल भावना पर सीधा हमला है। 

आपको बता दें कि आदिवासियों की जमीन अहस्तांतरणीय राजस्व है। यह देश के रूलिंग लैंड रेवेन्यू रूल्स 1879, 1921, 1972 के आधार पर संचालित व नियंत्रित होती है। 

भारत सरकार अधिनियम 1935 के अनुच्छेद 91, 92 के तहत एक्सक्लूडेड व परसियली एक्सक्लूडेड एरिया की जमीन आदिवासी समुदाय की समुदायिक नैसर्गिक सम्पति है। यह क्षेत्र नॉन रेगुलेडेड क्षेत्र है।

समाज का कहना है कि अनुसूचित क्षेत्रों में न केंद्र सरकार, न राज्य सरकार, न ही गैर अनुसूचित व्यक्ति अथवा संस्था की एक इंच जमीन नहीं है तो वह कौन सी जमीन पर काला कानून थोपना चाहती है। 

अनुसूचित क्षेत्र में लोकसभा, विधानसभा कोई भी कानून सीधे लागू करने में अयोग्य है। विदित हो कि उच्चतम न्यायालय इसकी पुष्टि समता का फैसला 1997 में कर चुका है तथा पांचवी अनुसूची के पैरा 2 व 5 में प्रावधान है जो अनुच्छेद 368 से बंधित है।

'जन विरोधी निर्णय'

सामाजिक संगठन “छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन” के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं कि एक और जन विरोधी निर्णय लेते हुए आदिवासियों से जमीन छीनने का रास्ता सरकार ने साफ किया है जिससे वह आसानी से अपने चहेते कारपोरेट को जमीन उपलब्ध करवा सके। 

उनके मुताबिक छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता में संशोधन पूर्णतः आदिवासी विरोधी निर्णय है। यह संशोधन 2013 के केंद्रीय भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास कानून, तथा पांचवी अनुसूची और पेसा कानून के प्रावधानों के विपरीत है।  पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में बिना ग्रामसभा की सहमति के भूमि अधिग्रहण की प्राक्रिया संपादित नहीं की जा सकती, परन्तु इस संशोधित प्रावधान से जमीन लेने पर ग्रामसभा की अनुमति या सहमति की कोई जरूरत नहीं होगी। इसके साथ ही 2013 के कानून के मुख्य प्रावधान जिसमें सामाजिक समाघात अध्ययन और पुनर्वास के प्रावधान से भी बचा जा सकेगा। 

इस संशोधन से एक सवाल यह भी खड़ा होता हैं कि जब पहले ही कलेक्टर की अनुमति से आदिवासी की जमीन खरीदने का प्रावधान विद्यमान है तो इस संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ी? 

अलोक ने कहा कि आदिवासी किसान विरोधी निर्णय का पुरजोर तरीके से विरोध करते हुए इसे शीघ्र वापस लेने की मांग करते है। प्रावधान वापस नहीं लिए जाने के स्थिति में व्यापक जनांदोलन के साथ इसे न्यायालय में भी चुनौती दी जाएगी।










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Sudhir :: - 01-03-2018
BJP Govt. has preplan to weakened the tribals by taking away their land. They are only brain washing hindus brethren for their political gain. This land revenue amendment is just for their to amass their properties. Establishing factories are not a development if the govt. Doesn't take care of their subjects need.

Narsingh :: - 12-23-2017
आदिवासी विरोधी सरकार, bjp सरकार । संविधान के विरुद्ध कार्य करने वाली सरकार के खिलाफ , राजद्रोह का प्रकरण तो बनता ही है । "कठोर कदम समाज को उठानी ही होगी ।"