एमआईएम नेता के आते ही उलेमाओं और मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने छोड़ा मंच

गुजरात , अहमदाबाद, सोमवार , 18-02-2019


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राम बरन आर कोरी

अहमदाबाद। शनिवार को अहमदाबाद के शाहपुर - मिर्ज़ापुर में "मुस्लिम महामंथन'' नाम से एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम किसी दल या संस्था का नहीं बल्कि एक बिल्डर द्वारा आयोजित किया गया था। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लेमीन पार्टी के विधायक वारिश पठान थे। मुसलमानों की वर्तमान समस्याओं पर चर्चा के लिए पठान के अलावा अक्षर धाम केस में निर्दोष बरी हुए मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम मंसूरी , जमीअत उलेमा ए हिन्द के मुफ़्ती असजद और प्रोफेसर निसार अंसारी , मिल्ली कौंसिल के प्रदेश प्रमुख मुफ़्ती रिज़वान तारापुरी , एडवोकेट  उवेश मालिक और शमशाद पठान , पूर्व विधायक साबिर काबली वाला कार्यक्रम में उपस्थित थे। सवा नव बजे मजलिस के विधायक वारिश पठान जैसे ही मंच पर आये सभी मुस्लिम उलेमा और बुद्धिजीवी एक एक कर मंच से उतर कर चालू कार्यक्रम से चले गए। जब वारिश पठान का भाषण समाप्त हुआ तो मंच पर केवल आयोजक ही थे।  अहमदाबाद के मुस्लिम बहुल शाहपुर-मिर्ज़ापुर में मजलिस के किसी नेता के साथ ऐसे व्यवहार से प्रश्न खड़ा होता है।

मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी और तेलंगाना असेंबली के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी पर आरोप लगता रहा है कि ओवैसी भाई गुजरात के मुसलमानों के नाम से राजनैतिक ध्रुवीकरण करते हैं। आप को बता दें सांसद एवं मजलिस प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी गुजरात में मुसलमानों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ खुलकर बीजेपी पर तीखा प्रहार करते हैं। ओवैसी ने कई बार अशांत धारा कानून , मुस्लिम इलाके में शहर के कचरों की डंपिंग, ज़किया जाफरी के लिए न्याय, फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मुसलमानों की हत्या जैसे ज्वलनशील  मुद्दों को संसद और मीडिया में उठाते रहे हैं ऐसे में मजलिस के किसी नेता की उपस्थिति में अहमदाबाद के उलेमा और मुस्लिम बुद्धजीवी मंच छोड़ चले जाएं तो ऐसी खबर छोटी नहीं हो सकती है। 

जनचौक संवाददाता ने वारिस पठान से टेलीफोन पर प्रतिक्रिया लेनी चाही तो पठान ने बात काटते हुए कहा कि "अभी मैं किसी काम में हूँ इस समय बात नहीं कर सकता।" कई बार फोन पर बात करने का प्रयत्न किया गया लेकिन अभी तक प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है।

मुख्य वक्ता वारिश पठान के संबोधन से पहले ही मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम स्टेज से उतरने के बाद एक एक मुस्लिम उलेमा मंच से चले गए। जनचौक संवाददाता ने इस घटना के बारे में मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम से बात की तो उन्होंने बताया कि "मैं राजनीति से दूर रहने वाला व्यक्ति हूं। मैं किसी राजनैतिक दल से नहीं जुड़ा हूं। मुझे बताया गया था कि दलित और मुस्लिम मुद्दों पर मंथन किया जायेगा। जबकि स्टेज पर दलित समाज का कोई व्यक्ति नहीं था। ऐसे में वर्तमान घटना और परिस्थिति के कारण मैं इस कार्यक्रम के पक्ष में भी नहीं था।"

वारिश पठान ने अपने संबोधन से पहले दो मिनेट का मौन कर पुलवामा में हुई घटना की निंदा की और शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी। पठान अपने भाषण में बीजेपी और कांग्रेस पर जमकर बरसे। पठान ने कहा कि "मुस्लमान अपनी हैबिट के अनुसार क्या खाना है तय करें किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है। AIMIM ही वाहिद पार्टी है जो मुसलमानों के हितों की रक्षा कर सकती है। कांग्रेस मुसलमानों का विकल्प नहीं हो सकती। " पठान ने ये संकेत भी दिए कि aimim जल्द ही गुजरात में संगठनात्मक कार्य आरंभ करेगी और 2020 म्युनिसिपल चुनाव में अपनी शक्ति दिखाएगी।

जमीअत उलेमा हिंद के राज्य इंचार्ज मुफ़्ती असजद क़ासमी ने बताया कि "मुझे किसी अन्य कार्यक्रम में जाना था इस लिए कार्यक्रम के बीच में ही जाना पड़ा। अन्य उलेमा किस कारण से मंच छोड़ चले गए मैं नहीं कह सकता।"

आल इंडिया मिल्ली कॉउंसिल के गुजरात चैप्टर के इंचार्ज मुफ़्ती  रिज़वान तारापुरी ने बताया कि " हमें आयोजकों के कार्यक्रम करने के तरीके से नाराज़गी है। नाम मंथन दिया गया। तरीका कांफ्रेंस जैसा था। कुछ लोग भाषण दिए और चले गए। वारिश पठान मुख्य अतिथि थे वह आये सीधे उन्हें माइक दे दिया गया। वह अपनी बात रखे चले गए। मंथन जैसा कुछ नहीं था। कुछ लोग 2002 के  दंगे पर आये। मौजूदा मुद्दों पर बात करने की कोई गुंजाईश नहीं बची।"  मंच छोड़कर जाने वालों में उलेमा के अलावा मुस्लिम बुद्धजीवी advocate उवेश मलिक भी थे। उवेश मलिक ने कहा कि "गलती व्यक्ति एक बार करता है बार बार नहीं। जो लोग मंच पर आये हैं अब पुनः ऐसे मंच पर आने की गलती नहीं करेंगे।"

वारिस पठान।

वारिश पठान से कोई मिल न सके इसलिए बाउंसर रखे गए थे। पठान से मिलने के लिए अहमदाबाद ही नहीं कच्छ - भुज, सूरत , बड़ोदा ,भरूच आदि जगहों से मिलने मजलिस समर्थक आये थे। परंतु अधिकतर को निराशा मिली। पठान के चाहने वालों में से एक मुनव्वर हुसैन हैं। हुसैन ने बताया कि " वारिश पठान से कोई मिल न सके इसलिये आयोजकों ने किराये पर बारह से तेरह बाउंसर रखे थे। जो पठान से किसी मजलिस समर्थक को नहीं मिलने दे रहे थे।" भरूच से आये हुज़ेफा पटेल ने कहा कि "हमलोग एक आशा से इस कार्यक्रम में आये थे परंतु निराशा मिली आयोजकों के कारण। गुजरात के मुस्लिम समाज में बड़ा असर रखने वाले मुफ़्ती रिज़वान तारापुरी भी मंच पर नहीं गए। हमें आशा थी इस कार्यक्रम के बाद मजलिस के आला नेता गुजरात को लेकर सकारात्मक निर्णय लेंगे।

परन्तु अब यह आशा टूट गई। " मंच छोड़कर उतरने के कारण को लेकर वक्ता खुलकर नहीं बोल रहे हैं। वारिश पठान के आने पर उलेमा और बुद्धि जीवियों द्वारा मंच से उतरने का कारण उपस्थित लोगों ने बताया। " इन लोगों को मजलिस या वारिश पठान से समस्या नहीं थी। बल्कि आयोजकों द्वारा पठान को बहुत देरी से मंच पर लाया गया था। जबकि पठान मुम्बई से सुबह ही आ गए थे। अहमदाबाद के मुस्लिम बुद्धजीवी पठान की उपस्थिति में अपना वक्तव्य देना चाहते थे। वारिश पठान मंच पर आये तो मौलाना महबूब रहमान क़ासमी का भाषण चल रहा था। चालू भाषण में माइक लेकर पठान के पक्ष में नारे लगाने लगे। आयोजकों की इस तुच्छ हरकत पर मुस्लिम उलेमा नाराज़ हो गए।

क़ासमी का अहमदाबाद के मुस्लिम समाज में व्यक्तित्व है  जनता भी पठान के आने के बाद ही कुर्सियों पर बैठी बाउंसर द्वारा मंच की घेराबंदी से भी लोगों को नाराज़गी हुई। बाबू भाई कपाड़िया ने बताया कि "पिछले वर्ष इन्हीं लोगों ने जिग्नेश मेवानी की उपस्थिति में दलित मुस्लिम एकता सम्मेलन का आयोजन किया था। लेकिन इस कार्यक्रम में दलित मुस्लिम एकता मंच के अधिकतर लोग नदारद थे। केवल एक व्यक्ति को आगे लाने की महत्वकांक्षा ने कार्यक्रम को फ्लॉप शो बना दिया। मुझे ऐसा लगता है वारिश पठान को गुमराह कर बुलाया गया क्योंकि एक वर्ष पूर्व हुए कार्यक्रम में यही बुद्धजीवी रात को एक बजे तक रुके हुए थे। "

दलित मुस्लिम एकता मंच के स्टेट कन्वेनर कौशर अली सैय्यद ने जनचौक को बताया कि "मैं साफ करना चाहता हूं कि इस कार्यक्रम का दलित मुस्लिम एकता मंच से कोई लेना देना नहीं है। लोकतंत्र में ऐसे कार्यक्रम करने का अधिकार हर किसी को है। कोई किसी भी विचारधारा को आगे बढ़ा सकता है। यदि समाज के लिए कोई आयोजन करना चाहता है वह स्वतंत्र है। रही राजनैतिक प्रतिक्रिया की तो गुजरात में एक भी विधानसभा ऐसी नहीं है जो अकेले मुस्लिम वोटों के बलबूते जीती जा सके। दलित आंदोलन के बाद मुस्लिमों के सबसे करीब दलित समाज के लोग ही आये हैं।

इसे और आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। गुजरात के मुस्लिम एक ख़राब दौर से गुज़र के अपने सियासी वजूद को फिर से पाने के प्रयत्न में हैं। हमें एमआईएम से कोई बैर नहीं है। गुजरात के युवाओं की सोच भी बदल रही है। लीडरशिप भी पैदा हो रही है। दलित और पाटीदार आंदोलन के बाद इन युवाओं में भी संघर्ष करने का जज़्बा जाग चुका है। जिग्नेश मेवानी , हार्दिक पटेल जैसे नेता मुसलमानों के साथ खुलकर खड़े दिखते हैं। कांग्रेस ने अपने राजनैतिक लाभ के लिए मुसलमानों में भय पैदा किया था अब मुस्लिम भयभीत नहीं हैं। वंजारा अमित का वह दौर अब लौटकर मुसलमानों को नहीं डरा सकता। मजलिस को भी चाहिए कि गुजरात में ऐसे नेताओं के साथ खड़ी हो जो यहाँ मुसलमानों के साथ खड़े हों न कि उनके साथ जो लतीफ़ और वहाब के दौर की वापसी चाहते हों। मुस्लिम पार्टी के नाम से sdpi और वेलफेयर पार्टी गुजरात में लांच हो चुकी है। जिन्हें कोई खास कामयाबी नहीं मिली है। यदि aimim के पास कोई फार्मूला है तो गुजरात के मुसलमानों को उसे बताना चाहिये। "

एमआईएम की हलचल से राजनैतिक माहौल का गर्म होना ही मजलिस की कामयाबी है। यदि मजलिस गुजरात में क़दम रखती है तो सबसे अधिक फर्क गुजरात कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं को पड़ेगा। क्योंकि एमआईएम सब से अधिक चुनौती इन्हीं के लिए बनेगी। मजलिस के नाम से नेता बनने की महत्त्वकांक्षा रखने से बेहतर है मुसलमानों के अधिकारों और समस्याओं को लेकर संघर्ष करके नेता बनें। मजलिस को लेकर अहमदाबाद में हलचल से कोई अनुमान लगाना केवल एक अनुमान ही होगा अंतिम निर्णय दारुस्सलाम हैदराबाद का हो होगा।

 








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