मोदी के रेल बेचने का दिखने लगा असर! स्टेशन पर बाइक खड़ी करने का किराया हुआ 240 रुपये

मध्य प्रदेश , इंदौर, सोमवार , 05-02-2018


modi-rail-parking-habibganj-bhopal-station

गिरीश मालवीय

क्या आप यकीन कर सकते हैं कि रेलवे स्टेशन जैसी जगह पर दिन भर आपको अपनी बाइक खड़ी करने का किराया 240 रुपये चुकाना पड़ सकता है, और 24 घंटे तक कार खड़ी करने के अब 590 रुपए लग रहे हैं यह अब भोपाल हबीबगंज रेलवे स्टेशन की हकीकत है। आपको याद होगा कि पिछले साल भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन को निजी हाथों में सौंप दिया गया था। यह पहला रेलवे स्टेशन था।

 

इस स्टेशन को पब्लिक-प्राईवेट पार्टनरशिप के तहत विकसित किया जाना है। मध्य प्रदेश की कंपनी बंसल ग्रुप को इस रेलवे स्टेशन के संचालन का ठेका मिला है जिस हबीबगंज रेलवे स्टेशन को निजी क्षेत्र को सौंपा गया है, वह पहले से ही भारत के सबसे साफ सुथरे रेलवे स्टेशनों में शुमार था। यही बात है जो सार्वाधिक आपत्तिजनक है।

पहले भी लिखा जा चुका है कि इस तरह के स्टेशन को अधिग्रहीत करने वाले सबसे ज्यादा रेवेन्यू जनरेट करने वाले रेलवे स्टेशन को ही तरजीह देंगे, उन्हें सुदूर इलाकों के स्टेशन से कोई मतलब नहीं होगा, वह उसी को लेंगे जो नया बना हो और तगड़ा मुनाफा निकाल करके दे। इस निजी करण का विरोध सोशल मीडिया पर बहुत जोर-शोर से किया गया और इसके दुष्परिणाम के बारे में आगाह करती बहुत सी पोस्ट लिखी गयी थीं।

अब इस पीपीपी मॉडल की हकीकत सामने आने लगी है। भोपाल के डीआरएम ने जब पार्किंग चार्ज का अप्रूवल देने वाले इंडियन रेलवे स्टेशन डेवलपमेंट कारपोरेशन के अधिकारियों से बातचीत की तो पहले नए रेट तय करने वाली बंसल-हबीबगंज पाथ-वे प्राइवेट लि. के चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर ने चार्ज घटाने से साफ इंकार किया। 

उन्होंने कहा कि नेशनल अर्बन ट्रांसपोर्ट पॉलिसी-2006 के तहत यह चार्ज बढ़ाए हैं। इसमें पार्किंग के लिए उपयोग की जा रही जमीन का सालभर का किराया और उसकी कीमत का अनुपात देखकर चार्ज तय किया जाता है।

अभी चार्ज और बढ़ाया जाएगा कंपनी ने चार्ज भले ही बढ़ा दिया लेकिन वाहनों की सुरक्षा को लेकर उसने किसी भी तरह की जिम्मेदारी लेने से इंकार कर दिया है। मसलन पार्किंग में गाड़ी में कोई डेंट आ जाए, कोई सामान चोरी चला जाए या अन्य कोई नुकसान हो जाए तो वह ऐसे किसी नुकसान की जवाबदार नहीं होगी। यह सूचना भी पार्किंग में लगा दी है।

अब लोगों को स्पष्ट रूप से समझ मे आना चाहिए कि निजी उद्योगों की मूल भावना लाभ कमाना है, वह सिर्फ वहीं जाएंगे जहाँ लाभ होगा, उड़ान सेवाओं के निजीकरण कर दिए जाने का उदाहरण हमारे सामने है, वे सिर्फ उन्हीं रूट पर उड़ान भरते हैं जहां अधिक मुनाफा दिखता है, यह होता है निजीकरण करने का मतलब उन लोगों को ढूंढिये जो स्टेशन के निजीकरण का समर्थन कर रहे थे।

(गिरीश मालवीय आर्थिक मामलों के जानकार हैं। और आजकल इंदौर में रहते हैं।)










Leave your comment