सियासत को मुकुल की जुबान खुलने का बेसब्री से इंतजार

प. बंगाल , कोलकाता, मंगलवार , 10-10-2017


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हर्षिका

कोलकाता । तृणमूल कांग्रेस ने सांसद मुकुल राय को पार्टी से बर्खास्त कर दिया है या यूं कह लें कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ दरकते रिश्ते को उन्होंने तोड़ने का एक नाम दिया है।  बंगाल में यह पहला मौका है जब किसी पार्टी से किसी नेता की बर्खास्तगी या इस्तीफे से सियासत में इस कदर भूचाल आया है।  इसके बाद से तृणमूल कांग्रेस दहशत में है, भाजपा के अंदर बेताबी है और कांग्रेस एक त्रिकोण के बीच चक्कर काट रही है।  बंगाल में 1967 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रफुल्ल सेन  के साथ रिश्ते में दरार आने के बाद अजय मुखर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर बांग्ला कांग्रेस बनाया था।  इसके बाद वाम मोर्चे के समर्थन से बंगाल के मुख्यमंत्री भी बने थे।  माकपा में 1969 में विभाजन हुआ और चारु मजूमदार ने सीपीआई एमएल का गठन किया।  इसके बावजूद उस दौर की राजनीति में ऐसी सनसनाहट नहीं आई थी जैसी मुकुल राय की बर्खास्तगी या इस्तीफे के बाद आई है। 

  • दहशत में है तृणमूल कांग्रेस
  • मुंह खुलने पर बहुत कुछ खुलेगा

तृणमूल कांग्रेस दहशत में है।  राज्य सरकार के पंचायत मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के हेवीवेट नेता सुब्रत मुखर्जी कहते हैं कि देखें विजयादशमी के बाद मुकुल राय क्या बोलते हैं। दरअसल एक तरफ सारधा चिटफंड और दूसरी तरफ नारदा स्कैम है और इसके बीच में है तृणमूल कांग्रेस। इसके करीब एक दर्जन भारी भरकम नेता इन दोनों घोटालों में उलझे हुए हैं, कई जेल जा चुके हैं  और एक अभी भी जेल में है और कुछ जाने की तैयारी में हैं। इसीलिए यह कयास लगाया जा रहा है की मुकुल राय अपने बयान से इन नेताओं की दिक्कतों को बढ़ाने में कितना अवदान करेंगे। इसकी एक बानगी पेश है। जब  सारधा  घोटाले का खुलासा हुआ था उन दिनों एक सवाल उठा था कि सारधा को रेलवे में केटरिंग का ठेका किसने दिया था। मुकुल राय ने बड़ी बेबाकी से इसके जवाब में कहा था कि ठेका उनके कार्यकाल में नहीं बल्कि जब ममता बनर्जी रेल मंत्री थीं तब दिया गया था। हालांकि सारधा घोटाले में मुकुल राय सीबीआई के सामने पेश हो चुके हैं, लेकिन उन्होंने क्या बताया है इसकी जानकारी किसी को नहीं है।

मुकुल राय और ममता।

कई राज छुपे हैं मुकुल के जेहन में

इसके अलावा त्रिनेत्र से जुड़े घपले का भी खुलासा कर सकते हैं।  कहते हैं कि इसकी एक कंपनी ने तृणमूल कांग्रेस को पांच करोड़ रुपए दिए थे, जिसके निदेशक किराए के कमरे में रहते हैं।  मुकुल राय इस पर भी रोशनी डाल सकते हैं। चुनाव आयोग और ईडी इस मामले की जांच कर रहे हैं।  चुनाव आयोग ने विधायकों की संपत्ति में वृद्धि का आंकड़ा भी तलब किया है। तृणमूल कांग्रेस के विधायकों की सूची राजनीतिक गलियारे में विचर रही है।  एक विधायक की संपत्ति में 17 सौ फीसदी  का इजाफा हुआ है। मुकुल इस पर भी रोशनी डाल सकते हैं। इसके अलावा सारधा चिटफंड घोटाले से जुड़ी एक लापता डायरी का मुद्दा भी है। इसके बाबत भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने बंगाल के पुलिस के एक आला अफसर को जिम्मेदार ठहराया है।  मुकुल राय इस लापता डायरी पर भी रोशनी डाल सकते हैं। कहते हैं कि इस डायरी में इस बात का पूरा ब्यौरा है कि तृणमूल कांग्रेस के किस नेता को कब और कितनी रकम दी गई थी। कुल मिलाकर मुकुल राय जितनी रोशनी डालते जाएंगे तृणमूल कांग्रेस के लिए अंधेरा उतना ही घना होता जाएगा।

  • सीबीआई से मिलेगी मुकुल को राहत
  • भाग मुकुल भाग के बाद अब भाग ममता भाग होगा !

दूसरी तरफ सीबीआई विजयादशमी के बाद नारदा मामले में चार्जशीट देने की तैयारी में है। इस स्कैम में कोलकाता नगर निगम के मेयर सहित तृणमूल कांग्रेस के एक दर्जन मंत्री, सांसद और विधायकों के नाम है। अब यह कयास लगाया जा रहा है कि मुकुल राय भाजपा में जा सकते हैं। यहां एक सवाल आड़े आ रहा है, 2014 के विधानसभा चुनाव के दौरान धर्मतल्ला में एक जनसभा में सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा था 'भाग मुकुल भाग' और फिर जनता से पूछा था 2016 में क्या होगा तो आवाज आई थी 'भाग ममता भाग'। अब भाजपा के लिए कठिन सवाल है कि उस मुकुल को कैसे गले लगा ले जिनका नाम सारधा चिटफंड घोटाले में आया था और नारदा स्कैम से भी जुड़ा हुआ है। इसके वीडियो फुटेज को भाजपा ने अपने दफ्तर से जारी किया था।  दूसरी तरफ यह भी सच है कि भाजपा के आला नेताओं से मुकुल राय के बहुत घनिष्ठ संबंध हैं।

शायद ही मिल पाए कहीं ठिकाना

अब रही कांग्रेस के त्रिकोण की बात तो इसमें एक तरफ तृणमूल कांग्रेस है और दूसरी तरफ माकपा  और  तीसरी तरफ भाजपा है। दिल्ली की राजनीति के मद्देनजर कांग्रेस मुकुल राय को अपने साथ नहीं जोड़ सकती है, दूसरी तरफ प्रकाश करात के तरकस के तीर से घायल बंगाल के माकपा नेता मुकुल राय और कांग्रेस की जोड़ी पर मंजूरी की मोहर नहीं लगा सकते हैं। दिल से भले ही तृणमूल कांग्रेस की तबाही मंजूर हो लेकिन सिद्धांत के मुखौटा का क्या करेंगे।  तो फिर अंतिम विकल्प क्या बचता है।  तृणमूल कांग्रेस में वापसी मुमकिन नहीं, कांग्रेस के करीब जा नहीं सकते और माकपा से जुड़ना नामुमकिन है। तो क्या मुकुल राय गुजरात के शंकर सिंह बघेला की तरह अपनी पार्टी लोकतांत्रिक तृणमूल कांग्रेस को मजबूत करके तृणमूल कांग्रेस की कब्र खोदेंगे। शायद यही मुकुल के लिए सबसे माकूल विकल्प है।  भाजपा के आला नेताओं के साथ घनिष्ठता के कारण सीबीआई से अभयदान मिलेगा, तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी से अपना हिसाब चुकता करने का मौका मिल जाएगा। लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी ने कहा था दीदी के दोनों हाथों में लड्डू होंगे अब यह बात दीगर  है कि ऐसा नहीं हुआ। अलबत्ता बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में  दादा यानि  मुकुल राय के दोनों हाथों में लड्डू होने की संभावना नजर जरूर आ रही है। 










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