अपने अखाड़े में फिर लौटेंगे पहलवान

उत्तर प्रदेश , , बुधवार , 13-12-2017


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मनोज कुमार

 

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, समाजवादी पार्टी के संरक्षक और आजमगढ़ से सांसद मुलायम सिंह यादव अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं, लेकिन अगला चुनाव वो अपनी मौजूदा सीट से नहीं लड़ेंगे, उन्होंने 2019 का चुनाव मैनपुरी लोकसभा सीट से लड़ने का ऐलान किया है। मुलायम ने 2014 के लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ और मैनपुरी दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था लेकिन जीत दर्ज करने के बाद उन्होंने मैनपुरी की सीट छोड़ दी थी। पारिवारिक कलह के बाद समाजवादी पार्टी को टूटने से बचाने में अहम भूमिका निभाने वाले यादव परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने आजमगढ़ की जगह मैनपुरी से चुनाव लड़ने का फैसला किया है तो इसके अर्थ तलाशे जाने लगे हैं। मुलायम को ऐसा नेता माना जाता है जिनके फैसले सियासी नजरिए से हमेशा सही होते रहे हैं, ऐसे में आखिर क्या वजह रही कि मुलायम का आजमगढ़ से मोहभंग हो गया और वो 'घर वापसी' के लिए बाध्य हो गए हैं।

मुलायम सिंह यादव ने 2014 में आजमगढ़ की सीट ऐसे समय में जीती थी जब पूरे देश में ही बीजेपी की आंधी थी। मुलायम एक नहीं दो-दो सीटों पर जीते तो ये कुछ हद तक उनका अपना आभामंडल था और साथ में इन दोनों ही सीटों का सामाजिक समीकरण भी था। मुलायम ने आजमगढ़ में 58 फीसदी हुए मतदान में 35 फीसदी मत हासिल करके बीजेपी के बाहुबली रमाकांत यादव को हराया था।

रमाकांत यादव कभी उनकी ही पार्टी का हिस्सा हुआ करते थे। एक अनुमान के मुताबिक आजमगढ़ में यादव वोटों की संख्या लगभग 30 फीसदी है, मुस्लिमों की भी बहुत बड़ी संख्या है, लेकिन आजमगढ़ को अपनाने का फैसला सिर्फ इतना भर ही नहीं था कि ये सुरक्षित सीट थी। यह निर्णय सियासी ही था और उनकी मंशा पूर्वांचल में पार्टी का दायरा बढ़ाने की थी। 

मुलायम की सियासी सोच सही थी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। समय का पहिया कुछ ऐसा घूमता गया कि समाजवादी पार्टी के मजबूत गढ़ पूर्वांचल में बीजेपी ही मजबूत होती गई और समाजवादी पार्टी सिमटती गई ऊपर से पारिवारिक कलह ने पूरा बंटाधार कर दिया। पार्टी में दो धड़े बन गए, आजमगढ़ के मुलायम के करीबियों ने भी उन्हें झटका दिया, उनके खास पूर्व मंत्री दुर्गा यादव और बलराम यादव जैसों ने भी उनसे दूरी बनाते हुए अखिलेश यादव से नजदीकी बढ़ाई तो आजमगढ़ को लेकर मुलायम का मन खट्टा होने लगा।

वह 2017 के चुनाव में प्रचार के लिए भी आजमगढ़ नहीं गए। एक-एक कर अपनों ने साथ छोड़ा, अखिलेश मजबूत होते गए, लेकिन पार्टी में मुलायम कमजोर होते गए। परिवार के झगड़े में मुलायम ने अंतत: अखिलेश का ही साथ दिया, एक पिता से लोगों को उम्मीद भी यही थी, लेकिन पार्टी में अपनी स्थिति से मुलायम कहीं ना कहीं खिन्न भी थे।अब आज के हालात पर लौटें और यहां पर एक बात को गौर करें तो मुलायम ने मैनपुरी से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है तो इस वक्त में वो पहले से ज्यादा ऊर्जावान और पार्टी में भी ताकतवर दिखाई दे रहे हैं।

यह पार्टी में बड़े बदलाव का संकेत है। भले ही यह मूर्त रूप में ना दिखे लेकिन समाजवादी पार्टी में मुलायम मजबूत हुए हैं। पहले विधानसभा चुनाव और फिर निकाय चुनावों के नतीजे समाजवादी पार्टी के लिए अच्छे नहीं रहे हैं, इससे अखिलेश कमजोर हुए हैं। मुलायम की पूछ फिर से बढ़ी तो अब मुलायम के लिए भी बड़ा मौका है कि अपनी अहमियत को साबित करें। 

मैनपुरी से चुनाव लड़ने का ऐलान करके मुलायम ने असल में समाजवादी पार्टी की कमान फिर से संभालने की कोशिश शुरू की है और इसके तहत उन्होंने अपना गढ़ मजबूत करने की पहल की है। इटावा, मैनपुरी, एटा, कन्नौज, फर्रुखाबाद जैसे इलाके समाजवादी पार्टी के सबसे ज्यादा प्रभाव वाले परंपपारगत इलाके हैं। यहां पर एक बात ये भी साफ है कि यहां पर मुलायम-शिवपाल की ही अब भी ज्यादा चलती है, अखिलेश की नहीं।

मुलायम अब सबसे पहले इसी इलाके को फिर से संगठित करने और यहां पार्टी को फिर से मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं। मैनपुरी सीट का चयन इसी सिलसिले में है। मैनपुरी लोकसभा सीट में ही मुलायम का पैतृक गांव सैफई आता है। समाजवादी पार्टी यहां से कितनी मजबूत है इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि मुलायम के यह सीट छोड़ने के बाद भी लोग नाराज नहीं हुए, यहां उपचुनाव में मुलायम के भतीजे तेजप्रताप यादव चुने गए।

डैमेज कंट्रोल में जुटे मुलायम अब इसी कोशिश के तहत अक्सर अपने गढ़ यानी इटावा-मैनपुरी में दिखते हैं। वो मुखर होकर फैसले भी सुना रहे हैं। शिवपाल भी आक्रामक हैं, हालांकि उनकी ये आक्रामकता सीधे तौर पर अखिलेश विरोध की नहीं है, बल्कि अब वो अखिलेश के अधीन ही सही पार्टी में अधिकार चाहते हैं।

इटावा-मैनपुरी में शिवपाल ने जिन उम्मीदवारों को समर्थन दिया था, उन्होंने उन सबकी जीत का दावा किया था। सिर्फ मुलायम और शिवपाल ही नहीं अखिलेश यादव भी घर वापसी कर रहे हैं। उनके सामने भी अब पिता और चाचा को फ्री हैंड देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। वो खुद भी आजकल अक्सर इटावा के दौरे पर रहते हैं, छोटे से छोटे कार्यकर्ताओं के छोटे से से छोटे कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं। आखिर वो भी जानते हैं कि जड़ों से जुड़ना और किसी भी तरह से पार्टी की वापसी ज्यादा जरूरी है, ये जैसे भी हो अगर हुई तो चेहरा तो वही बनेंगे।










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