आकाओं के राजनीतिक षड्यत्रों को पूरा करने का हथियार बन गयी है एनआईए

झारखंड , रांची, रविवार , 17-12-2017


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राम कुमार

झारखंड में एनआईए संविधान व कानून की धज्जियां उड़ाने के बाद रमेश सिंह मुंडा हत्याकांड में घुटने टेकती नजर आ रही है। एनआईए के एसपी सीवी सुब्बा रेडी ने शुक्रवार को अदालत से गुहार लगायी है कि “सबसे अच्छे संभावित साक्ष्य” के लिए पूर्व मंत्री राजा पीटर का लाई डिटेक्टर टेस्ट कराने की अनुमति दी जाए। मतलब साफ है कि एऩआईए के पास पूर्व मंत्री के खिलाफ अब तक कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। तब सवाल लाजमी है कि उन्हें किस आधार पर गिरफ्तार किया गया, रिमांड पर लिया गया और पिछले ढाई महीने से जेल में बंद रखा गया? 

गौरतलब है कि पिछली 8 अक्तूबर को पूर्व मंत्री राजा पीटर को एनआईए की टीम ने उपरोक्त हत्याकांड में साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया था। इस हत्याकांड में एनआईए की कार्यशैली, क्षमता और कानून का पालन करने के तौर-तरीके न केवल उसे बे-पर्दा करते हैं बल्कि उसमें राजनीतिक षड्यंत्र के संकेत भी मिलते हैं।

दर्जनों निर्दोष लोगों के खून बहाने वाले जिस नक्सली के कहने पर राजा पीटर को गिरफ्तार किया गया उस व्यक्ति का लाई डिटेक्टर टेस्ट क्यों नहीं होना चाहिये? ताकि इस बात की पुष्टि हो सके कि जो आरोप लगाया जा रहा है वह सच है या झूठ? लेकिन एनआईए ऐसी कोशिश नहीं कर रही है और कानून की अनदेखी व अपने अधिकार का दुरुपयोग कर रही है। राजा पीटर के खिलाफ सबूत जुटाने में असफल एऩआईए इस कदर बौखला गई है कि अब पूर्व मंत्री के परचितों, समर्थकों व उनके साथ रहने वाले लोगों को गैर कानूनी तरीके से बुलाने के बाद डरा-धमका कर उनके भीतर दहशत पैदा करने पर आमादा है। जिसे सीधी भाषा में गुंडागर्दी कहा जाता है। 

राजा पीटर की पत्नी आरती कुमारी से मिलने वालों पर भी एनआईए की पैनी नजर है। पूर्व मंत्री के समर्थकों में दहशत का माहौल है। लेकिन पूर्व मंत्री राजा पीटर के खिलाफ अदालत में सबूत पेश करना एऩआईए के लिए भारी चुनौती है। 

लाई डेटेक्टर टेस्ट के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई 2010 को कहा है कि निर्णय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों (अऩुच्छेद-20 (3) जिसके अंतर्गत किसी भी आरोपित व्यक्ति को खुद के खिलाफ गवाही देने या साक्ष्य देने के  लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है) और अनुच्छेद 21 ( जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के हनन के आधार पर और इसकी खामियों को दृष्टिगत रखते हुए इस प्रणाली पर सवाल उठाए थे। लेकिन इन लोगों को कानून व संविधान से कुछ नहीं लेना देना है। इन्हें अपने आकाओं के निर्देशों का पालन भर करना है। एनआईए, सीबीआई सहित देश की जांच एजेंसियों की दक्षता और कार्यकुशलता का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का सूत्रधार व कई संगीन मामले के आरोपी संजय चौधरी को ये दुबई से झारखंड लाने में पूरी तरह से विफल रही है। पिछले आठ वर्षों से झारखंड की संपत्ति लूटने के बाद दुबई में बैठकर वो भारत की एजेंसियों को ठेंगा दिखा रहा है।

आतंकवादियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से गठित एनआईए भटकता दिखायी दे रहा है। पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष निशांत अखिलेश कहते हैं कि सभी राजनीतिक दल पुलिस को पूर्णतः सरकार के अधीन रखना चाहते हैं। ताकि वे पुलिस और खुफिया एजेंसियों का उपयोग अपने हित व स्वार्थ के लिए कर सकें। सीबीआई समेत राज्य की पुलिस कैसे अपना रुख सरकार के बदलने पर बदलती है यह सर्वविदित है। सत्ता के इशारे पर चलने वाली एजेंसियों से आप कार्यकुशलता व निपुणता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। बहरहाल आदर्श किसी का कितना भी ऊंचा हो, अन्याय किसी पर कितना भी भयानक हो, निर्दोष लोगों के खून बहाने व अत्याचार करने की इजाजत किसी को भी नहीं है।

चाहे वह संगठित आपराधिक गिरोह हो, नक्सली हो या फिर पुलिस अथवा जांच एजेंसियां। यह मानवता के प्रति घोर अपराध है। यह समझते हुए कि सत्ता का चरित्र एक जैसा है। उसके लिए किसी ने कहा है कि “तुम चाहो तो सबूत मिटा सकते हो,गवाह तोड़ सकते हो, फर्जी गवाह जुगाड़ कर सकते हो, प्रशासन को पालतू बना सकते हो, मीडिया को खरीद सकते हो, न्याय के मंदिर को कलुषित कर सकते हो। पर जनता- जनार्दन अगर फैसला सुनाने का मन बना ले, तो तुम्हारी एक न चलेगी”।

(रामकुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)










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