महागठबंधन समर्थित भाकपा-माले प्रत्याशी राजू यादव का चुनाव-प्रचार : एक संक्षिप्त जायजा

बिहार , , शनिवार , 18-05-2019


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सुधीर सुमन

17 मई को 32-आरा संसदीय क्षेत्र के चुनाव के लिए प्रचार का अंतिम दिन था। 19 मई को यहां चुनाव है। पिछले विधानसभा में आरा में आकर बिहार के लिए करोड़ों का पैकेज देने की घोषणा करने वाले नरेंद्र मोदी इस बार आरा नहीं आए। भाजपा अपने प्रत्याशी को विकास का प्रतीक बताती रही और राजू यादव पर जातिवाद करने के आरोप लगाए। हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान ही भाकपा-माले का प्रचार कर रही प्रचार गाड़ी और उस पर सवार पासवान जाति के कार्यकर्ता योगेंद्र राम और तीन नौजवानों पर नवादा बेन में सामंती ताकतों ने हमला किया। एक नौजवान के पेट में चाकू घोंप दिया, जिसका अभी भी पीएमसीए में इलाज चल रहा है। एक अन्य गांव में प्रचार करने पर गोली मारने की धमकी दी गई।

सामंती-जातिवादी दमन-उत्पीड़न और भेदभाव का विरोध किए जाने तथा गरीब दलित-पिछड़े समुदायों के संवैधानिक अधिकारों के लिए आवाज उठाने को सवर्ण समुदाय के वर्चस्व की हिमायती राजनीति जातिवाद मानती है। अभी कुछ ही वर्ष पूर्व महादलित महिलाओं के साथ गैंगरेप करने वाले रणवीर सेना से जुड़े अपराधियों के खिलाफ भाकपा-माले और ऐपवा ने जबर्दस्त आंदोलन किया, तो भाजपा अपराधियों के समर्थन में खड़ी हो गई थी और भोजपुर बंद का आह्वान किया था। इस बार तो राजू यादव और उनके चुनाव प्रचार के दौरान भाकपा-माले, राजद-महागठबंधन के नेता तो संविधान, लोकतंत्र, आरक्षण और सामाजिक न्याय को ही केंद्रीय मुद्दा बना रहे थे, जाहिर है इसमें भाजपा को जातिवाद भला कैसे नजर नहीं आता! वैसे भी यह वही आरा लोकसभा है, जहां गरीबों ने सामंती-जातिवादी ताकतों से संघर्ष करते और शहादत देते हुए वोट देने के अधिकार को हासिल किया था। 

भाकपा-माले जातिगत असमानता, सामंती उत्पीड़न और हिंसा के विरोध के साथ-साथ सांप्रदायिकता विरोध को भी सामाजिक न्याय की लड़ाई का अनिवार्य हिस्सा मानती रही है। बथानीटोला जैसे नृशंस जनसंहार के पीछे भी सामंती-सांप्रदायिक घृणा ही काम कर रही थी, जिसे भाजपा का वैचारिक-आर्थिक संरक्षण हासिल था। कोबरा पोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन और अमीरदास आयोग की रिपोर्ट से भी यह जाहिर हुआ था। यह अलग बात है कि उस रिपोर्ट को नीतीश सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। बथानीटोला जनसंहार मानो गुजरात जनसंहार का रिहर्सल था। आरा विधानसभा और बाद में आरा लोकसभा से भाजपा की जीत के बाद सहार, पीरो, गड़हनी और आरा शहर में सांप्रदायिक उन्माद भड़काने और दंगा कराने की हरसंभव कोशिश की गई। हर बार भाकपा-माले इसके खिलाफ डटकर खड़ी हुई और भोजपुर जिले में सांप्रदायिक सौहार्द की रक्षा की। भाजपा के साथ सीधी टक्कर होने के कारण इस बार पूरी उम्मीद है कि गरीब, दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक मतदाताओं का अधिकतम वोट राजू यादव को ही मिलेगा।  

भाकपा-माले और महागठबंधन ने चुनाव प्रचार में भाजपा के विकास के चरित्र पर सवाल उठाया। आरा संसदीय इलाके में सोन नहरों के आधुनिकीकरण की मांग कई वर्षों से की जा रही है। हाल में कई लाख क्युसिक पानी सोन नहर में बह गया, लेकिन किसानों को वह पानी नहीं मिला। कदवन जलाशय परियोजना अगर पूरी हो गई होती तो उस पानी को संरक्षित किया जा सकता था, पर केंद्र और बिहार- दोनों जगह भाजपा गठबंधन की सरकार होने के बावजूद भोजपुर के किसानों की सिंचाई के सवाल की अनदेखी की गई है। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जब किसान धान का उत्पादन करते हैं, तो उन्हें उसकी वाजिब कीमत नहीं मिलती। सोन नहरों के आधुनिकीकरण, सिंचाई और धान की वाजिब कीमत पर सरकारी खरीद के लिए भाकपा-माले और अखिल भारतीय किसान महासभा हर साल संघर्ष करती है। आंदोलन के बाद ही किसानों के धान की सरकारी खरीद होती है। भाकपा-माले प्रत्याशी राजू यादव ने इन आंदोलनों का नेतृत्व किया है। 

आरा में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार और तमाम बुनियादी सुविधाओं की खस्ता हालत है। आरके सिंह तो अपने सांसद निधि का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं कर पाए, उस पर भी माले ने सवाल उठाया। आम जनता के सुख-दुख में वे नजर नहीं आए। जनांदोलनों के साथ तो खैर कभी खड़े ही नहीं हुए। छात्रों ने बीएड कोर्स में भारी फीस वृद्धि के खिलाफ आंदोलन किया, लेकिन सांसद होते हुए भी आरके सिंह ने आंदोलनकारी छात्रों से मिलना मुनासिब नहीं समझा। रोजगार के सवाल पर हुए आंदोलनों की चर्चा पूरे देश में रही, पर भाजपा सांसद आंदोलनकारी नौजवानों के प्रति संवेदित नहीं हुए, जबकि राजू यादव इन सारे आंदोलनों के साथ थे। 

नामांकन के साथ ही प्रचार का शानदार आगाज 

दरअसल 25 अप्रैल को 32-आरा संसदीय क्षेत्र के भाकपा-माले प्रत्याशी राजू यादव के नामांकन के दिन जो जनसभा हुई थी, उसने ही एक बड़ी जनगोलबंदी का संकेत दे दिया था। राजू यादव आरा से भाकपा-माले के उम्मीदवार होंगे, यह घोषणा 18 मार्च को भाकपा-माले ने अपने बूथ स्तरीय कार्यकर्ताओं की बैठक में कर दी थी। उसके बाद राजद-महागठबंधन ने उनका समर्थन किया। राजू यादव के नामांकन के अवसर पर भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव का.दीपंकर भट्टाचार्य, राजद के वरिष्ठ नेता जगतानंद सिंह, जो बगल के बक्सर संसदीय क्षेत्र से राजद के उम्मीदवार हैं, राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी, पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तान अवामी मोर्चा के प्रमुख जीतनराम मांझी, वीआईपी पार्टी के प्रमुख मुकेश साहनी, एनसीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी, आरा संसदीय क्षेत्र के सात विधानसभाओं में से छह के विधायक, सीपीआई-एम के राज्य सचिव अवधेश कुमार, सीपीआई के राज्य सचिव मंडल सदस्य विजय नारायण मिश्र, पूर्व विधान पार्षद प्रेम कुमार मणि, भाकपा-माले विधायक दल के नेता का. महबूब आलम, भाकपा-माले के पूर्व सांसद रामेश्वर प्रसाद, भाकपा-माले पोलित ब्यूरो सदस्य कविता कृष्णन समेत भाकपा-माले, राजद, कांग्रेस, रालोसपा, हम और वीआईपी के स्थानीय नेताओं ने भी संबोधित किया। उसके अगले ही दिन भाजपा प्रत्याशी आरके सिंह का नामांकन हुआ। उनकी नामांकन सभा में लोगों की उपस्थिति माले-राजद-महागठबंधन की सभा में मौजूद जनता के आधे से भी कम थी। 

चिलचिलाती धूप और तेज हवाओं से टक्कर लेता जोश

मई की चिलचिलाती धूप और तेज हवाओं में दो-तीन दिन राजू यादव की जनसभाओं में शामिल होने के दौरान मुझे किसी दूसरे प्रत्याशी की प्रचार गाड़ी नजर नहीं आई। भीषण गर्मी के बावजूद गरीब-मेहनतकश जनता, स्त्रियां, वृद्ध, नौजवान और बच्चे राजू की चुनावी सभाओं में उत्साह और उम्मीद के साथ शामिल हुए। कई जगह प्रत्याशी का गाजे-बाजे के साथ स्वागत भी हुआ। 16 मई को माले की ओर से आरा शहर में जो रोड शो हुआ, उसमें माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, पोलित ब्यूरो सदस्य रामजी राय, माले राज्य सचिव कुणाल, विधान पार्षद राधाचरण सेठ, प्रत्याशी राजू यादव, सरोज चौबे, विजेद्र यादव, चंद्रदीप सिंह, रामेश्वर प्रसाद, विधायक अनवर आलम और सुदामा प्रसाद, नेत्र चिकित्सक सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा, अदीब रिजवी और का. कयामुद्दीन अंसारी के साथ माले और महागठबंधन के सैकड़ों कार्यकर्ता और समर्थक धूप में ही शहर की सड़कों से पैदल गुजरे और अंत में एक सभा की।

चुनाव प्रचार के अंतिम दिन तेजस्वी प्रसाद यादव की एक बड़ी जनसभा हुई। आरके सिंह का जोर विभिन्न जगहों में रोड शो पर अधिक रहा, जिसमें गाड़ियों की संख्या बेशक ज्यादा थीं। वे सत्तर साल के जुमले को दोहराते रहे कि जो विकास सत्तर सालों में नहीं हुआ, वह उन्होंने कर दिया है। एक अखबार के हवाले कहें तो उनकी अगर यहां से जीत हुई तो वे मोदी जी का हाथ मजबूत करेंगे। मुझे लगता है कि इससे उनको मिलने वाले कुछ वोट कम ही होंगे। आरके सिंह 2014 की मोदी लहर में आए थे, मोदी विरोधी लहर में उनकी आरा से विदाई की ज्यादा संभावना है। आरके सिंह के प्रचार में अमित शाह ने एक सभा की। नीतीश कुमार और मोदी भी दो-तीन सभाओं में आए। लेकिन राजू यादव की जनसभाओं की अपेक्षा उनकी जनसभाओं में लोगों की उपस्थिति प्रायः कम रही।

भाकपा-माले, राजद-महागठबंधन के नेता-कार्यकर्ता रहे लगातार सक्रिय 

भाकपा-माले के प्रत्याशी राजू यादव के प्रचार में माले के पोलित ब्यूरो सदस्य वरिष्ठ नेता स्वदेश भट्टाचार्य, राज्य सचिव कुणाल, माले के केंद्रीय कमेटी सदस्य और ऐपवा नेता सरोज चौबे, भाकपा-माले, दिल्ली के राज्य सचिव रवि राय, माले केंद्रीय कमेटी के सदस्य संतोष सहर और अभ्युदय, आइसा के राष्ट्रीय महासचिव संदीप सौरभ, जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष आशुतोष कुमार और पूर्व महासचिव चिंटू कुमारी, राजस्थान के युवा माले नेता सौरभ नरुका, बिहार राज्य कमेटी सदस्य वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता और नवीन कुमार पिछले एक-दो माह से लगातार जुटे रहे। इस दौरान मुहल्लों और गांवों में बूथ स्तरीय तैयारियों पर खास जोर दिया गया।  

माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, पूर्व सांसद रामेश्वर प्रसाद, वरिष्ठ माले नेता कृष्णदेव यादव ने कई चुनावी जनसभाएं कीं। आखिरी दौर में पोलित ब्यूरो सदस्य प्रभात कुमार और माले विधायक सत्यदेव राम भी आरा पहुंचे।  

महागठबंधन की ओर से पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव, तेजप्रताप यादव, राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी की सभाएं हुईं। रालोसपा सुप्रीमो ने उपेंद्र कुशवाहा ने मोबाइल से एक जनसभा को संबोधित किया। भाकपा-माले, राजद-महागठबंधन के जिला, प्रखंड और पंचायत-गांव स्तर के नेता-कार्यकर्ता हर जगह प्रचार में सक्रिय रहे। जाहिर है मतदान के दिन भी उनकी सक्रियता रंग लाएगी, इसकी पूरी संभावना है।  

विधायकों में प्रतिस्पर्धा है कि कौन अपने क्षेत्र से राजू यादव को ज्यादा वोट दिलाएगा

इस संसदीय क्षेत्र के सात विधानसभाओं में से पांच पर राजद और एक पर माले का कब्जा है। विधायक सुदामा प्रसाद, अरुण कुमार यादव, अनवर आलम, राहुल तिवारी, रामबिशुन सिंह लोहिया, सरोज यादव- सभी लगातार अपने-अपने क्षेत्रों में राजू यादव के चुनाव प्रचार में लगे रहे। सारे विधायकों में एक प्रतिस्पर्धा-सी है कि कौन अपने क्षेत्र से कितना अधिक वोट राजू यादव को दिलाता है। इनके साथ पूर्व विधान पार्षद लालदास राय और वर्तमान विधान पार्षद राधाचरण सेठ भी लगातार राजू यादव के पक्ष में जनगोलबंदी के लिए लगातार प्रयासरत रहे। चुनाव अभियान समिति संयोजक के बतौर राजद के पूर्व विधायक विजेंद्र यादव जबर्दस्त रूप से सक्रिय रहे। खासकर राजद के जनाधार का एक भी वोट छूटे नहीं, अधिकाधिक वोट राजू यादव के पक्ष में पड़े, इसके लिए वे प्रयासरत दिखे। 

प्रचार गीतों के मामले में अभूतपूर्व 

इस बार के चुनाव में राजू यादव के पक्ष में स्वतःस्फूर्त तरीके से जितने प्रचार गीत बनाए गए, वह अभूतपूर्व है। गायकों के बीच होड़ सी लगी रही। भोजपुरी के लोकप्रिय पेशेवर गायकों से लेकर नए-नए गायकों ने पोपुलर धुनों पर गाने लिखे और उनको गाकर सोशल मीडिया के जरिए प्रचारित-प्रसारित किया। हिरावल ने भी प्रचार गीत बनाए। इनमें से कई गाने राजू यादव की प्रचार गाड़ियों पर भी बजते देखे गए। इसे भी इस युवा उम्मीदवार की लोकप्रियता की बानगी के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। दूसरी ओर साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों, चिकित्सकों, वकीलों अर्थात बुद्धिजीवियों ने भी उनके पक्ष में अपील जारी की। भाकपा-माले ने इस बार सोशल मीडिया का जमकर उपयोग किया। 

वर्गीय गोलबंदी और आंदोलनों के असर की संभावना

माले के प्रचार अभियान का सकारात्मक पहलू यह भी है कि इसने विभिन्न तबकों को अपने पक्ष में गोलबंद करने की कोशिश की है। आशाकर्मियों और रसोइया सेविकाओं, नियोजित शिक्षकों, छात्र-नौजवानों के साथ-साथ किसानों-मजदूरों और महिलाओं के सवालों पर माले ने जिन आंदोलनों को संगठित किया है या जिन्हें समर्थन दिया, उसके आधार पर भी एक वर्गीय गोलबंदी राजू यादव के पक्ष में होने की संभावना है। अल्पसंख्यकों, दलितों, व्यवसायियों और शहर के गरीब-मजदूर लोगों के साथ-साथ आम नागरिकों की सुरक्षा के सवाल पर माले की जो पहलकदमियां रही हैं, वे भी चुनाव में अपनी भूमिका निभाएंगी।

(लेखक संस्कृतकर्मी हैं और जनसंस्कृति मंच से जुड़े हैं।) 








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