फासीवाद और कारपोरेट परस्त सत्ता के खिलाफ जनसंगठनों का साझा मंच

झारखंड , , सोमवार , 25-02-2019


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विशद कुमार

रांची। झारखंड के लगभग डेढ़ दर्जन जनसंगठनों का रांची के लोयोला सभागार में एक मंच पर जुटान इस बात का संकेत है कि झारखंड में अब फासीवादी और कारपोरेट परस्त सत्ता के खिलाफ जन आंदोलन एक नया रूप अख्तियार तैयार होने जा रहा है। इस साझा मंच पर आए जनसंगठनों में 'कोयलकारो जनसंगठन', 'केंद्रीय जन-संघर्ष समिति लातेहार-गुमला', 'मुंडारी-खूंटकती-भूइंहर परिषद', 'आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच', 'भूमि बचाओ मंच कोलहान', 'बोकारो विस्थापित साझा मंच','विस्थापन विरोधी एकता मंच पूर्वी सिंघभूम','हाशा-भाषा जोगाओ संगठन गोड्डा', 'आदिवासी एकता मंच इचागढ़', 'मुंडा-मानकी संघ पश्चिमी सिंघभूम', 'गांव गणराज्य लोकसमिति कोलहान', 'यूनाइटेड मिली फोरम रांची','झारखंड जनतांत्रिक महासभा', 'युवा उलगुलान मंच', 'हटिया-विस्थापित जन-कल्याण समिति' के प्रतिनिधियों ने साफ कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव 2019 में फासीवादी,  कारपोरेट परस्त और आदिवासी विरोधी भाजपा को सत्ता से बेदखल किए बगैर झारखंडी जनता को उसका मूल अधिकार जल,जंगल व जमीन के संकट से छुटकारा नहीं मिल सकता।

जनप्रतिनिधियों ने कहा कि बिना जन आंदोलन के विपक्षी महागठबंधन लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा को शिकस्त नहीं दे सकता। इसके लिए जनसंगठनों की हिस्सेदारी जरूरी बन जाती है। क्योंकि पिछले 5 वर्षों में जन संगठनों ने ही भाजपा की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतर कर संघर्ष किया है। अत: भाजपा-आरएसएस की सरकार को शिकस्त देने के लिये, जन- आंदोलनों के बिना कोई भी विपक्षी महागठबंधन झारखंड के संदर्भ में पूरा नहीं होगा। इस साझा मंच के कार्यक्रम में ईचा-खरकाई बांध, नेतरहाट फील्ड फाइरिंग रेंज, पलामू व्याघ्र परियोजना, वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ कोरीडोर, मंडल डैम परियोजना एवं अडानी पावर प्लांट को अविलंब बंद करने का प्रस्ताव पारित किया गया। एक कमिटी का गठन किया गया, जिसमें सभी जनसंगठनों के 2—2 प्रतिनिधियों के नाम प्रस्तावित किए गए।

वहीं कार्यक्रम में उपस्थित आदिवासी मामलों के जानकार और मानवाधिकार की लड़ाई में अग्रिम भूमिका निभाने वाले स्टैन स्वामी केवल श्रोता के तौर पर देखे गए। जबकि मंच को संबोधित करते हुए दयामनी बारला ने कहा कि-

''सीएनटी एक्ट के होते हुये भी आज हमारे झारखंड में बड़े बड़े भवन बन गए हैं। झारखंड की जमीन के लिए बहुत से लोगों ने शहादत दी, लेकिन आज उनकी शहादत का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया। अभी हम अकेले अकेले लड़ रहे हैं, लेकिन अब जरूरत है मिलकर साथ लड़ने की। आज भाजपा सरकार ने उच्च शिक्षा में स्कॉलरशीप को 50 प्रतिशत कम कर दी, ताकि हम उच्च शिक्षा नहीं ले सके। आज सरकार ने गरीब जनता के बीच काम करने वाली 88 संस्थाओं का लाइसेंस रद्द कर दिया गया है। भाजपा की यह कारपोरेट परस्त सरकार आदिवासियों को तहस नहस करने की हर संभव कोशिश में लगी है। आज जो हो रहा है वह सचमुच 60 साल में भी नहीं हुआ, 60 साल में कभी गौरक्षा के नाम पर किसी की हत्या नहीं की गई थी। बारला ने कहा कि ''भाषण मंच पर देने से नहीं होगा, हमें धरातल पर काम करना होगा। केवल आदिवासी मूलवासी करते रहने से झारखंड आदिवासी राज्य नहीं बनेगा, इसके लिए हमें विधानसभा में बहुमत लाना होगा।''

नेतरहाट फील्ड फाइरिंग विरोधी जन-संघर्स समिति के जेरोम गेराल्ड कुजूर  ने कहा कि ''राजनीतिक दलों के भरोसे जल-जंगल-ज़मीन को नहीं बचाया जा सकता। हमारा जन-आंदोलन राजनीतिक दलों के महज वोट बैंक नहीं है, हमें हमारी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।''

झारखंड जनतांत्रिक महासभा के वीरेंद्र कुमार ने कहा कि ''आज जो राजनीतिक परिस्थितियां हैं जो पिछले 5 सालों में पैदा हुयी हैं, वह केंद्र और राज्य सरकार की देन है।'' उन्होंने विपक्ष के महागठबंधन को चेताया कि ''जन आंदोलनों को दरकिनार करके चुनाव जीतना संभव नहीं है। आज के दौर में जनता ही विपक्ष है और असली लड़ाई जनता लड़ रही है। जनांदोलनों को खुलकर चुनाव में दावेदारी ठोकने की जररूरत है ताकि विधान सभा और अन्य सदनों में जनता की बात रखी जा सके। इसलिए हमें चुनाव में अपनी दावेदारी पेश करनी होगी।''

कुमार चंद मार्डी ने कहा कि -

''जनांदोलनों की जमीन छोटनागपुर, कोलहान, संथालपरगना आदि खनिज सम्पदा से भरी हुई है। झारखंड को भाजपा सरकार ने जनता को अधिकार देने के लिए नहीं बल्कि एक प्रयोगशाला के रूप में उपयोग किया है। वर्तमान हालात के मद्दे नजर हमें यह भी सोचना होगा कि अगर गठबंधन सरकार आती है तो क्या ये हमारे अधिकार को लागू करेगी? टाटा झारखंड की जनता का काफी विस्थापन कर चुका है। लोग उषा मार्टिन जैसी कंपनी के विस्थापन के खिलाफ लड़ रहे हैं। अभी लोग विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। जो विस्थापित हो चुके हैं उनके पुनर्वास के लिए लड़ाई लड़नी होगी। आज क्या राजनीति दल अपने चुनावी घोषणा पत्र में इसे लागू करेंगे? हमें इन बातों का भी ध्यान रखना होगा। अगर इस बार फिर से ये तानाशाही सरकार सत्ता में आती है तो निश्चय ही हम अपने अधिकारों को खो देंगे।''

वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग ने कहा कि ''आपातकाल के दौरान भी लोग संशय में थे कि क्या इन्दिरा गांधी को हराया जा सकता है? लेकिन फिर भी इन्दिरा की हार हुई। वर्तमान सरकार आदिवासी, दलित एवं पिछड़ों के हित के खिलाफ काम कर रही। इस देश में ऐसा माहौल बनाया गया कि बहुत से मुसलमानों की गौरक्षा के नाम पर हत्या कर दी गई। हमारी सरकार जिस नीति में चल रही है वो सामान्य बात नहीं है, 13 वी रोस्टर वाली बात कोई सामान्य घटना नहीं है, हमें आज गंभीरता से हर बिन्दु पर पर सोचना होगा।''

रतन तिर्की ने कहा कि ''इतने जनसंगठनों का जुटान इस बात का संकेत है कि फासीवादी, करपोरेट परस्त और जनविरोधी भाजपा की सरकार को शिकस्त देने के लिए हम मन बना चुके हैं। जिसकी कामयाबी जनआंदोलनों से ही संभव है।''


 








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