सोनभद्र के आदिवासियों को मिलेगा जनजाति का दर्जा,निर्वाचन आयोग ने शुरू की कार्यवाही

उत्तर प्रदेश , , रविवार , 03-12-2017


sonbhadra-mirzapur-adivashi-scst-electioncommission

जनचौक ब्यूरो

    

 

सोनभद्र। उत्तर प्रदेश में कोल आदिवासी जाति को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने, गोंड़, खरवार समेत आदिवासी का दर्जा पायी जातियों को पूरे प्रदेश में अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की लड़ाई पुरानी है। यह लड़ाई अब एक मुकाम तक पहुंच गयी है। आदिवासी समाज के लिए प्रदेश की एक लोकसभा सीट आरक्षित करने के सवाल पर स्वराज अभियान की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य अखिलेन्द्र प्रताप सिंह के मुख्य चुनाव आयुक्त, भारत निर्वाचन आयोग को भेजे पत्र को निर्वाचन आयोग ने संज्ञान में लिया है। निर्वाचन आयोग के अधिकारी प्रफुल्ल अवस्थी ने इस पत्र को आवश्यक कार्यवाही के लिए निदेशक, जन शिकायत, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को भेजा है।  

स्वराज अभियान के नेता  अखिलेन्द्र ने प्रधानमंत्री, मुख्य चुनाव आयुक्त, भारत निर्वाचन आयोग, अध्यक्ष अनुसूचित जनजाति आयोग और मुख्यमंत्री उ0 प्र0 को भेजे पत्र में बताया था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची में राष्ट्रीय स्तर पर संशोधन करने के लिए भारत सरकार द्वारा 1965 में बीएम लोकर की अध्यक्षता में समिति गठित की गयी थी।

इस समिति ने 25 अगस्त 1965 को दी अपनी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों की सूची को संशोधित करते हुए अगरिया, बैगा, भोटिया, भुइंया, भुइयार, बोक्सा, चेरो, गोंड (इसकी उप जनजाति धूरिया, नायक, ओझा, पठारी एवं राजगोंड), जौनसारी, खैरवार, कोल, पराहिया, राजी, सहरया, थारू और मिर्जापुर जिले के कैमूर क्षेत्र के दक्षिणी भाग की कोरवा और उरांव जाति को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की संस्तुति की थी। इस समिति की संस्तुतियों के आधार पर 1967 में भोटिया, बोक्सा, जौनसारी, राजी, थारू को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया और 8 जनवरी 2003 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) अधिनियम 2002 के द्वारा गोंड (इसकी पर्याय जातियां धूरिया, नायक, ओझा, पठारी एवं राजगोंड), खरवार, खैरवार, सहरया, पराहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, पटारी, चेरो, भुइया, भुनिया को प्रदेश के कुछ जनपदों में अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया। 

निर्वाचन आयोग

केन्द्र सरकार द्वारा लोकर समिति की संस्तुति में 1967 और 2003 में संशोधन करके कोल, कोरवा, उरांव, मझवार को संस्तुति सूची से हटाया गया और जिनको अनुसूचित जनजाति का दर्जा भी दिया गया उन्हें भी पूरे प्रदेश में यह दर्जा नहीं प्रदान किया गया। इन जातियों को सूची से क्यों हटाया गया और अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त जातियों को अन्य जिलों में अनुसूचित जनजाति का दर्जा क्यों नहीं दिया गया इसका कोई तर्कसंगत और वैध कारण भी नहीं बताया गया। स्पष्टतः यह कार्यवाही भेदभावपूर्ण है और संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार के विरूद्ध है। उत्तर प्रदेश में आदिवासियों की इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा न मिल पाने के कारण उन्हें लोकसभा में प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाना उचित नहीं है। सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव डेढ़ साल के भीतर सम्पन्न होना है। इसलिए पत्र में लोकर समिति 1965 की संस्तुति को लागू करने के लिए त्वरित कार्यवाही की मांग की गयी थी ताकि उत्तर प्रदेश के आदिवासियों को उनका विवेकसम्मत,वैधानिक, लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हो सके। 

 


 






Leave your comment