कौन बना रहा है झारखंड को लूट का केंद्र?

सवाल दर सवाल , , सोमवार , 05-02-2018


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रामकुमार

राज्य सत्ता का चरित्र कैसा है? किस खास वर्ग के स्वार्थ में राजसत्ता संचालित हो रही है, इस राज्य की अर्थ-व्यवस्था का ढांचा व स्वरूप कैसा है? आम आदमी की मेहनत से राज्य में जो धन-संपदा पैदा हो रही है, उसका मुनाफे के रूप में धन कहां जा रहा है और उसका कितना हिस्सा आमजनों तक पहुंच रहा है? संभवतः इन सवालों का उत्तर किसी राजनीतिक दल के पास नहीं है! 


दरअसल किसी भी राजनीतिक दल के एजेंडे में जनता है ही नहीं। केवल सत्ता पर काबिज होने और उस पर बने रहने का खेल चल रहा है। त्रासदी यह है कि आदिवासियों को सामने करके पर्दे के पीछे से वही ताकतें खेल रहीं हैं, जो झारखंड में सामंती जड़े अनवरत मजबूत करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती रहीं हैं और कॉरपोरेट घरानों को यहां स्थापित करने की कोशिश में सक्रिय हैं।

 

झारखंडी समूह यहां कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उनके बीच उभरे नेतृत्व को जिस तरह से कॉरपोरेट घरानों और सामंतों ने समाहित कर लिया है उससे उनकी नेतृत्व क्षमता को ही अप्रसांगिक बनाने का राजनीतिक षड्यंत्र परवान चढ़ गया है।

आदिवासी समूह को कौन सी ताकत ने और क्यों भौतिकवाद व विलासता के गर्त में धकेला? इस सवाल पर विमर्श नहीं होता है। झारखंड को, संसाधनों की लूट का केंद्र कौन बना रहा है और क्या इसी कारण राज्य उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां से रोशनी की उम्मीद क्षीण होती दिखाई दे रही है। 


झारखंड बनाते समय यहां की संस्कृति और सामूहिक चेतना को ही षड्यंत्र के तहत कुंद किया जाता रहा। यहां के लोगों को हीन भावना का शिकार बनाने में लोग लगे रहे। और यह सब राजनीतिक संरक्षण में होता रहा। 

विकास की परिभाषा सामंती और पूंजीपति अपने मुताबिक गढ़ते रहे और झारखंडी सवालों को स्वर देने वालों को भटका हुआ समूह बता दिया गया। 


झारखंड में राजनीतिक समूहों को आमतौर पर क्षमताविहीन और बिकाऊ साबित किया जाता रहा। लेकिन आदिवासी समूह की संस्कृति, परंपरा और सामूहिक प्रवृत्ति को नष्ट किस समूह और किस मकसद से किया जाता रहा?


झारखंड में भले ही नेताओं ने अपने को बेचा हो या समझौता किया हो और भौतिकवादी दौड़ में शामिल हुए हों लेकिन तथ्य तो यह भी है कि जनता ने अपने संघर्षों को कभी नहीं छोड़ा।

इतिहास में झांके तो पाएंगे कि झारखंड आंदोलन के दौर में बड़े-छोटे नेताओं के बिक जाने के बावजूद झारखंड आंदोलन की धार कभी कमजोर नहीं पड़ी। 


झारखंड अलग होने के बाद से ही लगातार षड्यंत्र के तहत आदिवासी नेतृत्व क्षमताविहीन और अक्षम बताने की प्रक्रिया चलती रही। जबकि झारखंड में जिन मुख्यमंत्रियों के हाथों में अधिक समय तक सत्ता रही वे संघ गिरोह से संचालित रहे। मौका तो कांग्रेस को भी मिला लेकिन उसने भी जिसने कभी पंचशील की बात कही थी कि आदिवासी इलाकों में आदिवासी संस्कृति के मुताबिक विकास की परिभाषा पर काम किया जाएगा, उसे भुला दिया। उल्टे झारखंड की संसाधनों की लूट के  लिये कॉरपोरेट घरानों को खुला छोड़ दिया। इन दोनों ही राष्ट्रीय दलों की मूल-आर्थिक नीति में कोई फर्क नहीं दिखाई देता है।

झारखंड की चंद घटनाओं पर गौर करें तो स्थिति बिल्कुल साफ हो जायेगी:-

राज्य बनने के तीन महीने के बाद 2 फरवरी 2001 में कोयल-कारो आंदोलनकारियों पर तपकरा में झारखंडी पुलिस ने बेरहमी से फायरिंग की जिसमें आठ ग्रामीण मारे गए। इनमें सात आदिवासी और एक मुस्लिम ग्रामीण था। उस समय भाजपा की सरकार थी और राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी थे। जो आज सरकार के विरोध में मुखर हैं। जिस विपक्षी दल ने विधानसभा का बजट सत्र चलने नहीं दिया। उसे ध्यान होना चाहिये कि जब शिबु सोरेन मुख्यमंत्री थे तो उन्हीं के संसदीय क्षेत्र काठीकुंड में खेतिहर जमीन अधिग्रहण के खिलाफ पावर प्लांट लगने का विरोध कर रही भीड़ पर 6 दिसंबर 2008 में गोली चली जिसमें घटना स्थल पर ही लखीराम टुडू की मौत हो गई और दर्जन भर आदिवासी जख्मी हुए थे। उस समय सोरेन ने पुलिस फायिरंग को सही बताते हुए कहा था कि पुलिस ने अपने बचाव में गोली चलाई थी।

सत्ता के नशे में मद-मस्त रघुवर सरकार ने विकास की नई परिभाषा ही गढ़ दी। न आंदोलन और न ही सरकार का कोई विरोध फिर भी निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। आठ जून, 2015 को पलामू जिले के बाकोरिया गांव में नक्सलियों के नाम पर 12 निर्दोष ग्रामीणों की हत्या कर दी गयी। जिसकी गूंज इसी बजट सत्र में सुनायी दी। गोलीकांड पर पर्दा डालने वाले और मामले को रफा-दफा करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई करने से ही मुख्यमंत्री ने इंकार कर दिया। झारखंड के इतिहास में पहली बार आठ रोज पहले बजट सत्र समाप्त कर दिया गया। इतना भर नहीं पहली बार ऐसा हुआ कि बगैर बहस के बजट पास कर दिया गया। रघुवर दास रिकार्ड बनाने में तो लगे हुए हैं। लेकिन उन्हें जानना चाहिए कि इतिहास किसी को माफ नहीं करता है। 

ज़ुल्म की दास्तां एक नहीं कई हैं। 29 अगस्त 2016 को रामगढ़ जिले के गोला में आंदोलनकारी ग्रामीणों पर पुलिस फायरिंग की गयी। जिसमें दो लोग दशरथ नायक और फुतू महतो की मौत हो गयी। एक अक्टूबर को हजारीबाग जिले के बड़का गांव में हुई पुलिस फायरिंग में चार लोग मारे गये। इसी तरह से 22 अक्टूबर को खुटी के साइकों में पुलिस की गोली से अब्राहम मुंडू की मौत हो गई। 

गोड्रा जिले के मोतिया में अडाणी के खिलाफ आंदोलन कर रहे लोगों पर झूठे मुकदमें किये गये। यानी नियम-कानून की अनदेखी कर जमीन अधिग्रण कानून को तोड़-मरोड़कर खेतीहर जमीन किसानों से लेकर कॉरपोरेट घराने को दी जा रही है।

विडम्बना यह है कि सत्ता का चरित्र एक जैसा है, जो आया वह कॉरपोरेट परस्त हो गया। सभी राजनीतिक दल दागदार हो चुके हैं। कांग्रेस का इतिहास तो एकीकृत बिहार में आदिवासियों पर हुए जुल्म के दास्तां से भरा पड़ा है। 

बहरहाल राजनीतिक दलों के बीच सत्ता संघर्ष जारी है जिसमें जनता के सवाल गौण हो चुके हैं। पर्दे के पीछे की पड़ताल यह है कि लड़ाई जनता के लिए नहीं बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी  और कॉरपोरेट जगत में बंटवारे के लिए होती दिखायी दे रही है।

(रामकुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)






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